अमृत रस धार : अंकिता भार्गव

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अस्पताल के प्रसुती कक्ष के बगल में स्थित वार्ड में बिस्तर पर मां की बगल में लेटा नवजात शिशु। गीली माटी के लोंदे सा अनगढ, सेमल रुई के फाहे सा नर्म। रंग ऐसा गुलाबी कि मानो दूध की मलाई में एक चुटकी लाल रंग घोल दिया हो किसी ने। नाजुक से कपोल और लाल-लाल अधर, हाथों-पैरों की नाजुक-नाजुक उंगलियां, काले-काले बाल।

   पहली नज़र में देखो तो बिल्कुल बाल कृष्ण की छवि को अपने भीतर समाए, बड़ी-बड़ी आंखे मटकाकर हैरानी से चारों ओर देख रहा था। शायद अपने आस-पास का माहौल को समझने का प्रयत्न कर रहा था। सब-कुछ अलग-अलग सा लग रहा था उसे। कुछ समझ नहीं आ रहा था कहां आ गया वह।

     अभी कुछ देर पहले वह जहां था वहां इतना प्रकाश न था और जगह भी ज़रा तंग सी थी। ज़रा क्या इतनी छोटी थी कि हाथ-पैर भी ढ़ंग से हिलते न थे। यहां तो खूब खुली जगह है। उसने हाथ-पैर फैला कर एक भरपूर अंगड़ाई ली।

उफ्फ कितना अधिक प्रकाश है यहां, आंखें ही चूंधिया गईं। बार- बार प्रयास करने पर भी वह अधिक देर तक अपनी आंखें खुली रखने में खुदको नाकाम पा रहा था। ना जाने क्यों पलकें खुद ही बंद हो रही थी। इसी प्रयास में बार-बार मिचमिचाने के कारण उसकी आंखें कुछ छोटी हो चली थी। मगर छोटी होती इन आंखों की किसे थी। वह तो बस इतना जानना चाहता था कि उसे यहां क्यों लाया गया  उसके है? जीवन में इतना बड़ा परिवर्तन! क्यों? वह पहले जहां था माना वहां थोड़ी असुविधा थी मगर वहां वह खुदको बेहद सुरक्षित महसूस करता था। उस सुरक्षा भाव का यहां नितांत अभाव है। क्यों? उसे समझ नहीं आ रहा था।

    अचानक उसे ध्यान आया मां कहां है? उसने किसी तरह अपनी आंखें खोलीं और अपनी मां को ढ़ूढ़ने के लिए हर तरफ नजर दौड़ाई, बगल में लेटी मां को देखकर उसे कुछ तसल्ली हुई। अपना नाज़ुक सा हाथ बढ़ाकर उसने मां को छुआ। उसके स्पर्श से, अर्धमुर्छित मां कुनमुनाई तो ज़रुर किन्तु दवा के असर के कारण उठ ना सकी।

    शिशु कुछ आश्चर्य से मां को देखता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि जो मां बस कुछ देर पहले तक उसकी धड़कनों को भी महसूस कर सकती थी अब वह उसके स्पर्श पर भी कोई प्रतिकृया व्यक्त क्यों नहीं कर रही है। ‘क्या मां ने मुझे त्याग दिया है?’

 मन में यह विचार आते ही घबरा गया नन्हा शिशु। उसका मन मानो चित्कार कर उठा। ‘हे ईश्वर ये क्या हो गया? मेरी मां से दूर कर मुझे मेरे किस अपराध का दंड दिया गया है। अब मैं क्या करुंगा’। डर गया वह, मां से दूर होने की सोच उसके कोमल मन पर कुछ इस कदर हावी हुई कि उसकी रुलाई फूट पड़ी।

शिशु का रुदन सुन कुछ साए उसके आस-पास मंडराने लगे। दादी उसे गोद में लेकर दुलारने लगी तो नानी उसकी बलैया ले रही थी। तभी किसी ने कहा,’ शायद बच्चा भूखा है, इसीलिए इतनी जोर से रो रहा है। AAAAAA’ यह सुनकर दादी उसे कटोरी-चम्मच से दूध पिलाने लगी।

  पेट भरने के बाद शिशु की सोच पर नींद हावी होने लगी। नींद से बोझिल होती पलकों के साथ वह दादी-नानी की गोद में भी अपनापन महसूस करने लगा।

   मां की बेहोशी टूट चुकी थी और वह अब खुदको काफी स्वस्थ महसूस कर रही थी। वह झूले में लेटे  शिशु को बहुत प्यार से निहार रही थी। अपने इस सृजन को देख कर वह निहाल हो गई। वह अपने बिस्तर से उठी और उसने नवजात को अपनी बांहों में उठा लिया और वापस अपने बिस्तर पर आकर बैठ गई।

    उसके मन में भावनाओं का ज्वार उठ रहा था। बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि इस दुनिया में सृजन का अधिकार या तो ईश्वर को प्राप्त हैं या फ़िर स्त्री जाती को, और शायद उनके के लिए इससे बड़ा गौरव और कुछ नहीं है। आज अपने शिशु को अपनी गोद में लेकर वह भी खुदको गौरवान्वित महसूस कर रही थी।

   बच्चा भी अपनी मां को टुकुर-टुकुर निहार रहा था। उसे इस तरह अपनी ओर ताकते देख मां को हंसी आ गई। ‘ऐसे क्या देख रहा है। मैं तेरी मां हूँ पहचाना मुझे। हम दोनों कितनी बातें किया करते थे, इतनी जल्दी भूल गया सब कुछ, बुद्धू कहीं का।’ प्यार भरा उलाहना देते हुए मां ने अपने लाड़ले के गाल कोमलता से सहला दिया।

    इस स्पर्ष को मानो पहचान गया बालक और होले से मुस्कुरा दिया। उसके अधरों पर खिली इस मासूम मुस्कान को देख कर मां तो निहाल ही हो गई। ‘मुस्कुराता है, अपनी मां को देख कर हंसता है बदमाश’ और वह भी हंस दी।

   मां अपने बच्चे को इतने नजदीक से देख कर जैसे बौरा ही गई। आज तक वह जिसे वह अपने अन्दर महसूस करती रही। जो अब तक केवल उसकी कल्पना में था, अब वह उसकी गोद में आ चुका था।

  कभी वह हंसने लगती तो कभी उसकी आंखों में आंसू भर आते। क्यों वह समझ नहीं पा रही थी। शायद खुशी के आंसू इन्हें ही कहते हैं। बच्चे तो उसने पहले भी कई देखे मगर कोई भी इतना प्यारा, इतना अपना कभी  कोई नहीं लगा।

     इस पल उसे वह कहावत याद हो आई, ‘दुनिया में एक ही बच्चा खुबसूरत है और वह हर मां की गोद में है।’ आज उसे इस कहावत का मतलब समझ में आ गया। सच उसका बच्चा दुनिया में सबसे प्यारा है।

  इस समय उसकी खुशी का कोई पारावार नहीं था। अपने इस आनन्द में मगन उसे अपने आसपास की दुनिया की जैसे कोई फिक्र ही नहीं थी। वह बावरी सी कभी बच्चे को सहलाने लगती तो कभी उसे चूमने लगती।

“देखो इसे बच्चे के प्यार में कैसे बावली हुई जा रही है। इसे इस तरह चूमने से, प्यार करने से क्या इसका पेट भर जाएगा। इसका पेट तो दूध से भरेगा, समझी। भूखा है ये इसे दूध पिलाओ।” बच्चे की दादी ने अपनी बहू को एक मीठी सी झिड़की दी फिर उसे बच्चे की उदरपूर्णा का तरीका समझाने लगी।

                        कुछ शर्माई, कुछ सकुचाई सी मां ने शिशु को अपने आंचल में समेट लिया। वह कुछ असमंजस में थी कि पता नहीं वह ठीक से बच्चे को दूध पिला सकेगी या नहीं। जाने शिशु को भी ठीक से दूध पीना आएगा या नहीं। जाने कितने ही सवाल उसके मन में घूम रहे थे।

कितना छोटा सा तो है, यह बेचारा कैसे समझेगा कि कैसे दूध पीते हैं। कहीं भूखा ही ना रह जाए। मांजी का इसे कटोरी-चम्मच से ही दूध पिला देना चाहिए। अभी वही ठीक रहेगा। किससे कहे मांजी तो कब की कक्ष से बाहर जा चुकीं थीं।

मां की सारी आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं। उसके भीतर समाई सारी ममता मानो दुग्ध का रूप लेकर शिशु  की उदरपूर्णा हेतु लालायित थी।

शिशु भी जैसे पहले से ही सब-कुछ जाना-समझा था। वह मां के आंचल में मुंह छुपा कर हौले-हौले दूध पीने लगा। दूध की एक-एक बूंद किसी अमृत-रस-धार की तरह न केवल उसकी क्षुधा को अपितु उसकी आत्मा को भी तृप्त कर रही थी। और साथ ही उसे यह तसल्ली भी प्रदान कर रही थी कि उसे उसकी मां से किसी ने दूर नहीं किया है। ना ही उसकी मां ने उसका त्याग किया है अपितु अब तो वह अपनी मां के और भी करीब आ गया है। अब वह अपनी मां को देख सकता है, उसे स्पर्श का सकता है, मां की बांहों में खेल भी सकता है।

   अपनी सारी आशंकाएं दूर होने के बाद शिशु के होठों पर एक मधुर मुस्कान आ गयी, मानो वह अपनी मां का हृदय की गहराइयों से धन्यवाद कर रहा हो, उसे इस दुनिया में लाने के लिए, इतना प्यार करने के लिए। और सबसे अधिक उस दुग्ध रूपी अमृत-रस-धार के लिए जो सिर्फ और सिर्फ उसी की उदरपूर्णा हेतु थी। जिस पर सिर्फ और सिर्फ उसी का हक था। मां की गोद ने शिशु के मन में एक असीम सुख और सुरक्षा का भाव पैदा कर दिया और वह मां के आंचल में मुंह छुपा कर चैन से सो गया।

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