कुच्ची का कानून

0
245

राजकमल पेपरबैक्स से प्रकाशित शिवमूर्ति जी द्वारा लिखित कहानी संग्रह ‘कुच्ची का कानून’ स्त्री विमर्श की मिसाल है। सच्चा स्त्री विमर्श यदि कहीं है तो यहीं है। आज आवाजें तो बहुत उठाई जाती हैं और अक्सर लिखा भी बहुत जाता है, लेकिन उसे इस तरह कलमबद्ध करने का साहसपूर्ण कार्य लेखक ने किया है। जहाँ एक स्त्री कुच्ची सारे गाँव से , पूरी पंचायत से न केवल लोहा लेती है बल्कि अपने हक़ में फैसला भी करवा लेती है। एक ऐसी औरत जिसका पति शादी के दो सालों में ही मर जाता है या मार दिया जाता है; इस पर भी संदेह रहता है, वो औरत कितनी असहाय होती है; वो भी सुदूर गाँव में जहाँ बिजली, पानी , सड़क, स्कूल की भी कोई व्यवस्था नहीं तो वहां तक कहाँ स्त्री विमर्श की आवाज़ पहुंची होगी जो आज शहरीकरण का मुख्य हिस्सा है। शायद स्त्री विमर्श की आवाज़ इन्हीं गावों से ही उठा करती है और शहरों तक पहुँचती है। एक सातवीं पढ़ी औरत जिसका पति मर गया हो और चचेरा जेठ घर, जमीन हथियाने के साथ उस पर भी कुदृष्टि रखता हो यहाँ तक कि उसके सास ससुर को भी मार डालने की फिराक में हो यदि वो पति के मरने के दो साल बाद गर्भवती हो जाए तो क्या उसका जीना आसान हो सकता है? क्योंकि विधवा से यही उम्मीद की जाती है या तो पति की याद में उम्र गुजारे या फिर कोई उस पर चादर डाल दे या फिर उसका शोषण हो तो सभी खुश रहते हैं लेकिन यदि वो ऐसा कदम उठा ले जो समाज की दृष्टि में लोक अपमान का बायस बने तो वो उन्हें बर्दाश्त नहीं होता, जिसके लिए वो किसी भी हद तक जा सकते हैं आखिर उनकी नाक का सवाल जो होता है। कुल्टा, डायन, चरित्रहीन जैसे विशेषणों से नवाज़ा जाता है उन्हें, क्योंकि उन्होंने उनकी बनायी लक्ष्मण रेखा को लांघा होता है जिसका नतीजा उसकी असमय मौत या फिर बहिष्कार से होता है लेकिन यहाँ लेखक ने ऐसा कुछ नहीं किया बल्कि एक सशक्त स्त्री विमर्श को पेश किया। कैसे कुच्ची गर्भवती होती है, किसका बीज है और कौन उसका हकदार जैसे असली मुद्दों को उठाते हैं जहाँ इतना शुक्र था कि पंचायत में उसे भी कहने का हक़ दिया। उसकी बात भी सुनी गयी और जब वो प्रश्न उठाती है तो किसी के पास जवाब नहीं होते।

कुच्ची का कानून

कैसे चचेरा जेठ बनवारी सारे गाँव को उसके खिलाफ करने की जुगत करता है और कैसे वो अपने पक्ष को मजबूत करती है? इसके लिए जरूरत नहीं किताबें पढ़ने की, इंसान को पढ़ने की नज़र की जरूरत होती है। मानो लेखक कुच्ची की बुद्धि का यहीं लोहा मनवाता है, जब वो अपने पक्ष में कुछ लोगों को करने में सफल होती है। प्रश्न उठता है उसने ये कदम क्यों उठाया? तो जवाब में वो अपने जीने के सहारे को हथियार बनाती है लेकिन पंचों द्वारा प्रतिप्रश्न करने पर कि वो दूसरा ब्याह भी कर सकती थी तो उसका भी जवाब उसके पास होता है क्योंकि वो जान गयी थी यदि वो एक बार यहाँ से चली गयी और दूसरा ब्याह कर लिया तो बजरंगी उसके सास ससुर को कब मार डालेगा जमीन के लालच में किसी को पता भी नहीं चलेगा और सिर्फ बजरंगी की बदनीयती और अत्याचारों से उन्हें बचाने के लिए वो कभी शादी न करने का फैसला लेती है और इस तरह गर्भवती होती है जिसमे किसका बीज है, जानने की किसी को आवश्यकता ही नहीं; क्योंकि गर्भ पर माँ का हक़ होता है, जैसा मुद्दा उठाना अपने आप में एक सम्पूर्ण स्त्री विमर्श है। बार-बार अलग-अलग तरह से उसे घेरा जाता है, कभी पुराणों के नाम पर, तो कभी कानून के नाम पर लेकिन उसके जवाब सबको लाजवाब कर देते हैं कि पांच पांडव हों, हनुमान, सीता या कर्ण उनका जन्म भी तो हुआ न और लिखा भी पुराणों में है तो अब कैसे संभव नहीं? वहीँ दूसरी तरफ कहती है ‘कुंती माई डर गयीं, अंजनी माई डर गयीं, सीता माई डर गयीं, लेकिन बालकिसन की माई नहीं डरने वाली; मेरा बालकिसन पैदा होकर रहेगा!’
दूसरी तरफ जायदाद में हिस्सा नहीं मिलेगा पर उसका तर्क भी सबको लाजवाब कर देता है कि दूसरे का गोद लो तो हिस्सा मिलेगा लेकिन अपनी कोख से पैदा करे तो नहीं जिसमे आधा खून उसका होगा और आधा दूसरे का लेकिन गोद वाले में तो उसके खून की एक बूँद भी नहीं होगी तो दोनों में से उसका सगा कौन? प्रश्न झकझोरने को काफी है। क़ानून पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है कि एक स्त्री जिसकी ब्याहता है यदि उसका पति मर जाए तो गोद के बच्चे पर हक़ और किसी और से गर्भवती होकर अपनी कोख से पैदा करे तो नहीं, ये कैसे कानून हैं? क्या इन्हें नहीं बदलना चाहिए? मानो कुच्ची कानून को भी चुनौती दे रही है। मानो लेखक कहना चाहता हो एक स्त्री चाहे तो सारे संसार को, इस संसार को बनाने वाले को भी चुनौती दे सकती है। खासतौर से तब जब वो माँ होती है, तब वो अपने हक़ के लिए लड़ने से जरा भी नहीं कतराती और न उसे कतराना चाहिए। उनमे कुच्ची जैसा साहस का बीज बचपन से ही बोया जाना चाहिए फिर दुनिया की कोई ताकत नहीं जो उसे उसका हक़ पाने से रोक सके या उसे सम्मानित दृष्टि से न देखे।

कुच्ची का कानून

शायद लेखक द्वारा लिखित इस बानगी को पढ़ कुछ पुरुष सत्ता नाराज हो जाए ये सोच कैसे एक पुरुष ने सभी पुरुषों की सत्ता को चुनौती देते हुए वो गहरे राज खोल दिए और उनका आसान डांवाडोल होता उन्हें दिखे लेकिन ये लेखक का साहस है जो वो पुरुष होकर पुरुष मानसिकता का कितनी खूबी से वर्णन करते हैं क्योंकि यदि एक स्त्री ने यदि यही लिखा होता तो या तो उसके खिलाफ फतवा जारी हो जाता या फिर उसके लेखन को हाथों हाथ ले लिया जाता, वाहवाही के ढोल बजते क्योंकि कहीं न कहीं वहां भी यही सोच कायम होती है। यदि स्त्री ने लिखा तो होगी ऐसी वैसी और हम उसे लपक सकते हैं लेकिन यहाँ पुरुष कह रहा है तो हजम होना ये भी आसान नहीं लेकिन लेखक ने ऐसा कर अपने साहस का ही परिचय दिया है। वहीँ गाँव की औरतें बेशक आपस में हँसी मज़ाक में कितनी बड़ी बातें कर और कह जाती हैं इसकी भी बानगी देखने को यहाँ इसी संवाद में मिलती है :
गांव की औरतों के बीच बस एक ही चर्चा- यह गर्भ वह लायी कहां से?
– मुझे तो लगता है, घर में ही खेला हुआ है। अपने बुढ़ऊ को जगाया होगा। एक बूढ़ी अनुमान लगाती है।
– बुढ़ऊ में अब क्या बचा होगा अइया? साठ पार कर गये हैं। एक बहू की शंका।
– साठ माने कुछ नहीं। बूढ़ी का प्रतिवाद- किसी दिन अपने बुढ़ऊ को आजमा कर देख तो पता चल जायेगा। मर्द -बर्द और घोड़े कभी बूढे़ नहीं होते। खोराकी मिलती रहे तो चाहे आखिरी दिन तक जोतो। हमारे मिठ्ठू के बप्पा को देख रही हो। हनुमान के बाप से साल दो साल बडे़ ही ठहरेंगे। लेकिन जहां महीना बीस दिन गुजरा कि लगते हैं कांखने कराहने। क्या, तो कमर चिलक गयी है। क्या, तो नार उखड़ गया है। क्या, तो कपार दुख रहा है। दोपहर से ही छछन्द फैलाना शुरू करते हैं। घर की बहुएं जान जाती हैं कि अम्मा के लिए बुलौवा आ गया।..
साथ ही यहाँ बूढ़े और बुड्ढी की परिभाषा भी दी गयी जो अपने आप इस संवाद की सब परतें खोल देती है :
आम धारणा के अनुसार ‘बुढऊ’ मतलब सत्तर अस्सी वर्ष का आदमी लेकिन वहां ऐसा नहीं था क्योंकि बेटे का गौना होते ही बहू से बातचीत में अपने पति को ‘बुढऊ’ और पत्नी को बुड्ढी कहने का रिवाज़ है फिर चाहे सास और बहू साथ साथ बच्चा पैदा करती हों क्योंकि छोटी उम्र में शादी होना और फिर छोटी उम्र में ही बच्चे पैदा हो जाते थे तो उनकी भी शादी जल्दी हो जाती थी ऐसे में ज्यादा उम्र का अंतर नहीं रहता था तो देखा जाए तो मुश्किल से ४०-५० वर्ष के आस पास ही होती होगी उम्र ऐसे में कैसे संभव है उस उम्र से ही संन्यास धारण कर लेना। शरीर की जरूरत तो होती है और उसे वो पूरी करते हैं लेकिन यहाँ बात है औरतों के संवाद की तो ऐसी चुहल अक्सर जब चार औरतें साथ बैठें तो करती ही हैं।
इसमें ऐसी कोई बात नहीं जिस पर ये कहा जाए कि लेखक ने कुछ अनुचित कहा बल्कि स्त्री विमर्श लेखक की कलम पर साथ साथ चलता रहा मानो कहना चाह रहा हो स्त्रियाँ जो दबी ढकी रहती हैं या दबा कर रखी जाती हैं वो भी समय आने पर चाहे सामने कुछ न कहें लेकिन आपस में जरूर चर्चा कर अपने मन की भड़ास निकाल लेती हैं लेकिन यहाँ कुच्ची के साहस ने ही मानो उनमे भी साहस भर दिया तभी सभी औरतें पंचायत में न केवल उपस्थित होती हैं बल्कि कुच्ची के पक्ष में भी खड़ी होती दिखती हैं जो एक सकारात्मक पहल है। जैसा कि होना चाहिए वर्ना कहाँ होता है ऐसा, अक्सर चुप रह जाती हैं औरतें, क्योंकि उन्हें नहीं दी जाती बोलने की इजाजत या फिर गाँव के फैसलों में, मगर यहाँ औरतों की भी भागीदारी है क्योंकि एक सत्य ये भी है कि कोई भी पुरुष ऐसा नहीं होता जो दूध का धुला हो। बस जरूरत है उसकी कमजोर नस को पकड़ने की और गाँव जैसी छोटी जगहों में कुछ भी उन्नीस इक्कीस पुरुष करे या स्त्री छुपी नहीं रहतीं लेकिन पुरुष कुछ ऐसा वैसा करता है तो उसके विरुद्ध कोई जल्दी से बोलने तक का साहस नहीं कर पाता, तो उसके खिलाफ पंचायत तो क्या बिठाई जाए लेकिन यदि स्त्री कुछ ऐसा वैसा कर दे तो वो ही दोषी ठहरा दी जाती है। ऐसा ही यहाँ होता है सबको सबकी कमियां पता हैं लेकिन कभी सामने कहा नहीं लेकिन जब कुच्ची का केस पंचायत में आता है और लक्षमण और बलई जैसे पञ्च अपना रौब गांठने लगते हैं, तब उन्ही औरतों को मौका मिल जाता है और खोल देती हैं उनके चरित्र के फटे धागों को जो उन्हें शर्मिंदा करने को काफी होता है वहीँ ऐसी पंचायत जहाँ होती हैं कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो चस्का लेने आते हैं, तो वो भी उन पर छींटाकशी करने से बाज नहीं आते और व्यंग्यात्मक लहजे में उनकी जो रुसवाई करते हैं वो काफी होती है, उनकी छीछालेदार करने को। हर पहलू को लेखक साथ साथ लेकर चले। कोई पहलू नज़रंदाज़ नहीं किया। यहाँ तक कि जब इस पंचायत की खबर दूर दूर तक पहुँचती है तो महिला आयोग आदि महिला अधिकारों के पैरोकार भी वहां उपस्थित हो जाते हैं क्योंकि ये उनके लिए आश्चर्य का विषय है कि एक सातवीं क्लास तक पढ़ी औरत अपनी कोख के लिए कैसे सारे समाज का मुकाबला कर रही है? उसे जरूरत नहीं किसी कानून की सहायता की या किसी स्त्री पैरोकार की? वो खुदमुख्तार है। अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़ सकती है ये देखना सबके लिए आश्चर्यजनक है।
क्या इससे बढ़कर कहीं कहा या लिखा गया होगा स्त्री विमर्श के बारे में, शायद नहीं! एक कहानी अपने साथ हर किरदार के झूठ सच साथ लिए चलती है तो दूसरी तरफ एक स्त्री की जीवटता का उदाहरण बनी है। साथ साथ स्त्रियों की दुर्दशा के बारे में अस्पताल में सास की भर्ती के समय भी एक सच सामने आता है जब अवैध गर्भ, पति द्वारा पिटाई, दहेज़ प्रताड़ना, तो कभी बेटी पैदा करने के कारण कितनी ही स्त्रियाँ काल कवलित होती हैं; इस पर भी लेखक की कलम कहने से नहीं चूकी मानो कहना चाहती हो हर स्त्री यदि कुच्ची जैसी हो तो देश में असमय मौत की शिकार न हों स्त्रियाँ बस जरूरत है तो कुच्ची जैसे साहस की। कुच्ची द्वारा कहीं भी अपशब्दों का प्रयोग नहीं होता बल्कि बहुत ही शालीनता और इज्जत के साथ वो पंचायत के सवालों का जवाब देती है फिर चाहे कुछ लोग उसे भला बुरा कहते रहे लेकिन उसने अपनी शालीनता नहीं छोड़ी, ये उसके चरित्र की उज्ज्वलता का प्रमाण पत्र है।
वहीँ उससे गर्भधारण के कारण जब पूछे जाते हैं तो उनमे से दूसरा कारण वो बताती है और बताती क्या मानो ईश्वर को ही कटघरे में खड़ा कर देती है ये कहकर कि ब्रह्मा ने स्त्री को कोख देकर अपनी बला उसके सर डाल दी इसलिए वो अपनी कोख के ऋण से उऋण होना चाहती थी और तीसरा कारण अपनी कोख से बाँझ का ठप्पा हटाना चाहती थी। साथ ही प्रतिप्रश्न करना उसके दिमाग और सोच को दाद देता है जब पूछती है – बड़ा कलंक क्या है? कोख का बाँझ रह जाना या कोख में हराम की औलाद पालना?
कुच्ची के प्रश्न न केवल हैरान करते हैं बल्कि सबकी बोलती भी बंद करते हैं क्योंकि वो जो कहती है उसमे ऐसा कुछ नहीं जो पहले न हुआ हो या उसने कुछ अनोखा किया हो। साथ ही हर प्रश्न मानो सारे समाज के माथे पर प्रश्नचिन्ह लगाता है कि ये कैसे नियम कायदे बनाए गए हैं, जिसमे हमेशा औरत को ही घाटे में रखा गया या जो भी गलत है उसके लिए वो ही जिम्मेदार है और पुरुष पाक साफ़। समाज के नियमों को चुनौती देती एक पुरजोर कहानी है कुच्ची का कानून।

जिस भाषा शैली का लेखक ने प्रयोग किया है वो रोचक है जो कथानक को कहीं भटकने नहीं देती और न ही कहीं उबाऊ बनाती बल्कि पठनीयता ऐसी कि पढने वाला एक बार में उसे पढ़े बिना उठ नहीं सकता। वहीँ पाठक के दिलो दिमाग को मथती है, उसे विचलित करती है और साथ में कुच्ची को सराहती है। स्त्री विमर्श की एक सशक्त कहानी के रूप में हमेशा याद की जाएगी। एक शानदार कहानी के लिए लेखक बधाई के पात्र हैं बल्कि पढ़ते हुए लगता है इस पर तो कोई फिल्म या सीरियल आदि बनने चाहिए ताकि समाज में जागृति आये। बस कुछ देशज शब्दों के अर्थ पता न होने के कारण थोड़ी असुविधा महसूस होती है क्योंकि उनके अर्थ सही रूप में ग्रहण नहीं हो पाए लेकिन कहानी ने क्या कहना चाहा वो पूरी तरह पाठक तक पहुँच गया यही कहानी की सफलता है।

वंदना गुप्ता
डी-19 राणा प्रताप रोड
आदर्श नगर
दिल्ली – 110033
मोबाइल : 9868077896

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here