प्रसाद की दृष्टि में नारी का स्वरूप | डॉ॰ वसुन्धरा उपाध्याय

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जयंशकर प्रसाद आधुनिक हिन्दी साहित्य के अग्रण्य कलाकार हैं। उनकी सर्वतोन्मुखी कविता का उन्मेष कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, आलेाचना आदि सभी साहित्यिक रूपों में हुआ है और उससे हमारे साहित्य की चेतना अधिक सप्राण एवं सबल हो उठी है। वस्तुतः उनके द्वारा रचित ग्रन्थ रत्न हमारे साहित्य के लिए चिरन्तन गौरव के प्रतीक हैं। प्रसाद जी के सम्पूर्ण साहित्य का सर्वांगीण अनुशीलन करने से स्पष्ट होता है कि यद्धपि इतिहास, दर्शन एवं पुरातत्व दर्शन एवं मनोविज्ञान उसके अध्ययन के प्रिय विषय रहे हैं तथापि उनका भावुक कवि हृदय प्रायः नारी प्रेम और सौन्दर्य जैसे सरस एवं मेाहक विषयों में अधिक रमा है। उनके काव्य की मूल चेतना सौन्दर्य और प्रेम ही है। इस सौन्दर्य और प्रेम की सृष्टि करने वाले अनेक प्रेमीयुग्म हैं जो इस भाव की सात्विकता को अपने उदात्त आचरण द्वारा इस कोटि तक पहुँचा देते हैं और सहृदय पाठकों को उससे अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है। अपने साहित्य के पात्रों में प्रसाद जी का संवेदनशील हृदय नारी पात्रों के प्रति विशेष सहानुभूति पूर्ण रहा है। वह अपने नारी स्वातन्त्रय के सबसे बड़े समर्थक थे। उनका नारी विद्रोह मनोवैज्ञानिक और काव्यात्मक है, सामाजिक नहीं। उनके लिए प्रेम के आदान प्रदान की स्वतंत्रता ही सब प्रकार की स्वाधीनता का प्रतीक है।

नारी और प्रेम को सर्वाधिक प्रधानता देने के कारण वह नारी जीवन की सबसे बड़ी समस्या प्रेम करने की स्वतंत्रता का समाधान यत्र तत्र अपनी रचनाओं में करते हैं। वस्तुतः उनके लिये नारी के प्रेम स्वातंत्रय की समस्या नारी के सर्व स्वांतन्य का प्रतीक बन गयी है। इसका कारण है कि प्रसाद जी नारी को ’’स्नेहमयी रमणी’’ के रूप में देखते हैं। इसी दृष्टिकोण से अपने प्रेम के इस धरातल पर स्वच्छन्द प्रणय विवाह आदि के सम्बन्ध में अपनी रचनाओं में विचार किया है। प्रणय और परिणय के सम्बन्ध में प्रसाद जी ने अत्यन्त गंभीरता पूर्वक विचार किया है। इस विचार और विश्लेषण के परिणाम स्वरूप आप प्रणय को अधिक महत्व देते हैं। आपके सभी साहित्यिक अंगों में अनेक प्रेम गाथाऐं मिलती हैं, कितने ही प्रेमी युग्म सामने आते हैं। जिनमें प्रथम प्रणय के सूक्ष्म मानसिक अन्तदर्द्ध और उससे उत्पन्न विचित्र मनोदशाओं का चित्रण है।

हिन्दी साहित्य के छायावादी युग के कवियों में महाकवि जयशंकर प्रसाद का स्थान सर्वोपरि है। आधुनिक हिन्दी साहित्य की विकासमुखी प्रगति एवं मौलिक चिन्तन के प्रसाद अग्रदूत माने जाते हैं। उनकी प्रतिभा सवर्तोन्मुख है। जयशंकर प्रसाद छायावादी काव्यधारा के प्रवर्तक एवं शीर्षस्थ कवि है। अनेक गुणों के साथ-साथ सौन्दर्य निरूपण भी उनके काव्य की प्रमुख विशेषताएं हैं।

जयशंकर प्रसाद के पात्र भावुक, संवेदनशील, प्रेमी और रसिक है।[1] इनके काव्य की नारी अनेकानेक गुणों से सराबोर है। प्रसाद की कहानियों में उनके नारी चरित्रों ने अपनी अविस्मरणीय भूमिका निभाई है। वस्तुतः प्रसाद रोमैंटिक कलाकार थे। कल्पना, प्रेम, वीरता, विद्रोह स्वच्छंद आदर्शवाद उनमें नैसर्गिक रूप में घुले मिले हैं। उतने अन्यत्र नहीं।[2] यही कारण है कि प्रसाद के नारी चरित्र भी उनके इन्हीं गुणों को आत्मसात की हुई हैं।

कवि संदेशवाहक होता है। वह युगों तक अपनी भावनाओं के द्वारा जीवित रहता है और उसकी कृतियों से साहित्य को प्रेरणा तथा विश्व को नवजीवन प्राप्त होता है। कवि के मन और मस्तिष्क में संसार को देखेने के अनन्तर एक विचित्र प्रतिक्रिया होती है। जिसे वह अपनी रचना में प्रकाशित करता है। जो कवि जीवन को जितनी अधिक दृढ़ता से पकड़ता है। उसकी कृति उतनी अधिक जीवन दायिनी होती है। एक सीमिति क्षेत्र में कार्य करने वाला रचनाकार समाज के एक विशेष वर्ग का ही मनोरंजन कर सकता है। महान कवियों का चिन्तन व्यापक होता है और वे जीवन की चिन्तनशील समस्याओं को लेकर चलते हैं। उनकी विचारधारा संकेतरूप में आगे बढ़ती है और वे इंगित मात्र से अपने उद्देश्य की व्यंजना कर देते हैं। काव्य में प्रवाहित कवि की विचारधारा उसका संदेश होती है। कालिदास की सूक्तियां प्रसिद्ध हैं किन्तु इनमें कवि किसी प्रवचन का सहारा नहीं लेता। काव्य की विचारधार सदा भावना को साथ लेकर चलती है।[3]

प्रसाद का साहित्य एक सामाजिक चेतना से अनुप्राणित है। वे युग देश समाज और मानव की जिन समस्याओं को उठाते हैं उनका समाधान भी प्रस्तुत करते हैं। इसमें संदेह नहीं कि विषय की विस्तृत विवेचना के लिए इन्होंने उपन्यास, नाटक, कहानी, निबन्ध आदि में गद्य के माध्यम से विचार किया किन्तु काव्य में भी उसका आभास प्राप्त होता है। प्रसाद की सामाजिक विचारधारा का अधिक स्पष्ट स्वरूप उनके साहित्य में मिलता है। समाज का नग्न स्वरूप उन्होंने इन उपन्यासों में अंकित किया है और धार्मिक आडम्बर, सामाजिक विषमता आदि को सामने रखा। नाटकों में प्रसाद का दृष्टिकोण ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक अधिक है। इतिहास को वे राष्ट्र की खोई हुयी चेतना लौटा लाना चाहते थे। उनका विश्वास था कि इतिहास का पुनर्जागरण राष्ट्रीय उत्थान के लिए आवश्यक है।

परम्परा, सभ्यता एवं संस्कृति हिन्दी साहित्य के छायावादी युग के कवियों में महाकवि जयशंकर प्रसाद का स्थान सर्वोपरि है। आधुनिक साहित्य की विकासोन्मुखी प्रगति एवं मौलिक चिन्तन के प्रसाद अग्रदूत माने जाते हैं उनकी प्रतिभा सर्वतोन्मुखी थी। उनके व्यक्तित्व के अनुरूप उनका साहित्य भी अत्यन्त व्यापक एवं गम्भीर है। उन्होंने कविता नाटक, कहानियाँ, उपन्यास, निबन्ध आदि सभी साहित्यिक अंगों पर समान रूप से लिखा है। मौलिकता प्रसाद की प्रमुख विशेषता है। उपनिषद, बौद्ध दर्शन, मध्ययुगीन इतिहास आदि उनके प्रिय विषय रहे हैं। उनकी कृतियों में इन विषयों की स्पष्ट छाप परिलक्षित होती है। यों तो प्रसाद ने अपने सभी पात्रों में सप्राणता एवं सबल व्यैक्तिकता की स्थापना की है किन्तु नारी चित्रांकन में उन्हें सर्वाधिक सफलता मिली है। उनकी नारी में नारीत्व के सभी गुणों से विभूषित है। वह भावुक भी है, प्रेम करना भी जानती है और प्रेम के लिए सर्वस्व वलिदान करना भी जानती है। उसका प्रेम विषय वासनाओं तक सीमित नहीं रहता है। वह मोहवश कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होती किन्तु त्याग और वलिदान की ऊॅंची से ऊॅंची सीढ़ी पर मानव का पथ प्रदर्शक बनती है। प्रसाद की नारी मध्ययुगीन भारतीय नारी की भांति केवल पुरूष की भोग्या मात्र नहीं, वरन उसकी जीवन संगिनी बनकर उसके जीवन पथ को आलोकित करती है। प्रसाद के नाटकों, कविताओं, उपन्यासों और कहानियों में नारी के इसी संसुज्जवल रूप का अंकन है। वह श्रद्धा, त्याग और सहिष्णुता की देवी है। समर्पण की सजीव मूर्ति है और निराशा एवं असफलता के भीषण अधंकार में दीपशिखा का काम करती है। ऐसे आदर्शोन्मुख उज्जवल नारी पात्रों के साथ प्रसाद ने दुर्बलताओं के शिकार बनकर विलासिता, ईर्ष्या, अहंकार, स्वार्थपरता आदि पाशविक वृत्तियों की पराकोटि को प्राप्त होने वाली नारियाँ भी सर्जित की हैं। विश्वनियंता की यह विचित्र सृष्टि अनेक विविधताओं से ओतप्रोत है। जहाँ सुन्दरता है वहाँ कुरूपता भी है, जहाँ दिव्य ज्योति जगमगाती है। वहाँ अंधकार का उपद्रव भी कम नहीं रहता। प्रसाद इस सनातन सत्य से परिचित थे। अतः उन्होंने अपनी पात्र-सृष्टि में भले बुरे दोनेां का समावेश किया है। मानवीयता के अन्तकरण की देा परस्पर विरोधी सद एवं असद प्रवृत्तियों के आधार पर प्रसाद के नारी पात्रों का वर्गीकरण इस प्रकार हो सकता है-

क)- उनके नारी पात्रों का एक वर्ग वह है जो जीवन के सुख दुखों की धूप छांह से अविचलित, निश्चित आदर्श पथ पर अग्रसर होता रहता है। दुख की कठिन दुपहरी उसे झुलसा नहीं पाती वैभव और विलास की रंगरेलिया उसे आदर्श भ्रष्ट नहीं बना पाती। इस वर्ग के पात्र आदर्श चरित्रों की कोटि में रखे जा सकते हैं। वे सतोगुणी पात्र हैं, उच्चाकांक्षी हैं।
ख)- दूसरा वर्ग उन नारी पात्रों का है। जो अपने संस्कारों और परिस्थितियों के कारण प्रारम्भ में सद प्रवृत्तियों का घोर विरोध करती हैं किन्तु अन्त में जीवन के घात पृतिधातों को सहते-सहते उनमें सत्य प्रकट होता है। उज्जवल पात्रों का निष्कलंक चरित्र उन्हें सद्गुणी प्रवृत्तियों की ओर आकर्षित करता है। उनमें सात्विकता का जागरण होता है और वे आदर्शोन्मुखी मार्ग का अवलम्बन ग्रहण करती हैं।
)- प्रसाद के नारी पात्रों का तीसरा वर्ग वह है, जो आरंभ से अंत तक छल प्रतिहिंसा करता है, द्वेष ,घृणा, पाखंड, नीचता आदि का आचरण करते हुए ही इस संसार से विदा होता है।

आदर्श नारी का उत्तम उदाहरण ‘स्कन्दगुप्त’ नाटक की देवसेना है। देवसेना प्रसाद की अमर कल्पना है। उसका जीवन, त्याग, उदारता, सहिष्णुता एवं प्रेम से परिपूर्ण है। संगीत उसके जीवन का अभिन्न अंग है। देवसेना के कंठ में बैठकर प्रसाद संगीत के द्वारा इस पृथ्वी पर स्वर्ग की अवतारण करने की कल्पना करते हैं और स्पष्ट घोषित करते हैं, “जहाँ हमारी कल्पना आदर्श का नीड़ बनाकर विश्राम करती है वही स्वर्ग है। वह इस पृथ्वी पर ही है।’’ देवसेना स्कन्दगुप्त से प्रेम करती है, पर उसका यह प्रेम समर्पण के सरोवर में नील कमल सा प्रतीत होता है। उसे बासना की दुर्गन्ध दूषित नहीं करने पायी है। वह विजया के लिये अपनी इच्छा का त्यागकर प्रेम के उच्चतम आदर्श को स्थापित करती है। ‘चन्द्रगुप्त’ नाटक की मालविका भी इसी श्रेणी की नारी है। उसका चन्द्रगुप्त के प्रति प्रेम सात्विकता लिए हुए है। उसके प्रेम का परिणति वासनापूर्ति में नहीं है। आत्मविसर्जन, त्याग और समर्पण में होती है। वह चन्द्रगुप्त के शब्दों में “स्वर्गीय कुसुम है जो हॅंसता हुआ आता है और अपना मकरंगद गिराकर मुरझा जाता है।” ‘अजातशत्रु’ की मल्लिका आलोकपूर्ण नक्षत्रलोक से कोमल कुसुम के रूप में अवतीर्ण हुई ही लगती है। वह अपने चरित्र से यह घोषित करती है कि करूणा उपकार, संवेदना और पवित्रता मानव हृदय के लिए ही बने हैं। इसी प्रकार ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक की कोमा में नारी के प्रेम का चरम उत्कृष्ट रूप अंकित हुआ है। वह शकराज से प्रेम करती है जो अतीव निर्दयी, विलासी, प्रमादी और स्वार्थी है। उसकी प्रेम सम्बन्धी उक्ति इतनी मार्मिक है। प्रेम जब सामने से आते हुए तीव्र आलोक की तरह आंखों में प्रकाश पुंज उड़ेल देता है तब सामने की ओर वस्तुएं अस्पष्ट हो जाती हैं। प्रसाद की अमर महाकाव्य की नायिका श्रद्धा भी इसी कोटि की नारी है। वह अटूट श्रद्धा अगाध विश्वास, अपूर्व त्याग और असाधारण सहनशीलता की मूर्ति है। वह शाश्वत नारी हृदय की भावनाओं की प्रतीक है। वह समर्पण की देवी है। तभी तो

मनु से वह कहती है-
‘समपर्ण लो सेवा का सार
–        –      –
दया माया ममता लो आज
मधुरिमा लो, अगाध विश्वास
हमारा हृदय रत्न निधि, स्वच्छ
तुम्हारे लिए खुला है पास।’

भारतीय नारी के प्रेम में लेनदेन का सौदा नहीं, व्यापारिक मनोवृत्ति नहीं,उसमें तो देना ही देना है। लेने का भाव ही नहीं उठता। ‘कामायनी’ में श्रद्धा इसी भाव को प्रकट करती है-
‘इस अर्पण में कुछ और नहीं
केवल उत्कर्ष छलकता है
मैं देदें और न फिर कुछ लूँ
इतना ही सरल झलकता है।’

प्रसाद की दृष्टि में नारी का स्वरूप आदर्शमय, स्वार्थहीन और समर्पण युक्त रहा है। उनके विचार में नारी में उच्च गुणों की प्रधानता है। उसमें आत्मसमर्पण और आत्मत्याग की भावना प्रबल है। वह कहते हैं-

‘नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास रजत न नग पगतल में,
पीयूष स्रोत सी बहा करो
जीवन के सुंदर समतल में’

प्रसाद की निश्चित धारणा है पुरूष तो लोलुप और स्वार्थी है। परन्तु नारी त्यागमयी मंगलमूर्ति है। ‘अजातशत्रु’ के तृतीय अंक में प्रसाद ने नारी जीवन का आदर्श अंकित किया है- “कठोरता का उदाहरण है पुरूष और कोमलता का विश्लेषण है स्त्री जाति। पुरूष करता है तो स्त्री करूणा है। इसीलिए प्रकृति ने उसे इतना सुन्दर और मनमोहक आवरण दिया है।”

प्रसाद नर-नारी की समानता के पक्षपाती रहे हैं। वह सदा पुरूष को अपराधी बताते हैं। वह पुरूष को सम्बोधित कर ‘कामायनी’ में कहते हैं-
‘तुम भूल गये पुरूषत्व मोह में
कुछ सत्ता है नारी की।
समरसता है सम्बन्ध बनी
अधिकार और अधिकारी।’[4]

प्रसाद चूँकि रस में लोकमंगल की भावना के समर्थक हैं इसीलिए रस के सृष्टिकर्ता उनके नारी पात्रों में विश्व कल्याण और लोकमंगल की भावना अन्र्तनिहित है। प्रसाद की आदर्श नारी श्रद्धा जो सेवा, त्याग, ममता और विश्वमंगल की साक्षात प्रतिमूर्तिक है। पशुबलि और मृगया परायण मनु को अपने कर्म के प्रति सजग करती हुई कहती है-

‘ये प्राणी जो बचे हुये हैं।
इस अचला धरती के।
उनके कुछ अधिकार नहीं
क्या वे अब ही है फीके
मनु! क्या यही तुम्हारी होगी,
उज्जवल नव मानवता
जिसमें सब कुछ ले लेना ही
हंत! बची क्या शवता।’

श्रद्धा की इस लोकमंगलकारी भावना का उत्कर्ष इस सीमा तक हुआ है कि स्वयं मनु भी उसे सर्वमंगला माहेश्वरी के रूप में देखने लगे –
‘बोले! रमणी तुम नहीं आह,
जिसके मन में ही भरी चाह,
तुम देवी आह कितनी उदार,
यह मातृभूति है निर्विकार
हे सर्वमंगले तुम महती
सबका दुख अपने पर सहती
कल्याणमयी वाणी कहती
तुम क्षमा निलव में ही रहती।
में भूला हॅू तुमको निहार
नारी सा ही वह लघु विचार।’

प्रसाद की नारी का वास्तविक एवं सत्य स्वरूप ‘कामायनी’ की नायिका श्रद्धा के रूप में ही है। प्रसाद का नारी विषयक दृष्टिकोण पूर्णता एवं विशदता को प्राप्त हुआ है। एक आदर्श भारतीय नारी के विषय में कवि के अन्तमर्न में जो एक सूक्ष्म मधुर भावना थी और उसके प्रति जो एक विशेष प्रकार की उदात्त कल्पना थी। वह श्रद्धा के रूप में मूर्तिमान हो उठी है। अतः हम कह सकते हैं कि प्रसाद की नारी भावना की प्रतीक श्रद्धा है। जिसका चित्रण आपने एक सर्वांगीण नारी के रूप में किया है।[5]

प्रेम के अतिरिक्त प्रसाद की नारियों में राष्ट्रीयता, देशप्रेम और विश्ववन्धुत्व की भावना भी कम मात्रा में, नहीं मिलती। अलका राष्ट्रप्रेम की सजीव मूर्ति है। भटार्क की माँ कमला देशानुराग से ओतप्रेात है। ‘कामायनी’ की श्रद्धा तो विश्ववन्धुत्व का ज्वलंत उदाहरण है ही। देवसेना विश्वात्मा की आदर्श उपासिका है। उसमें सर्वभूमिहित कामना बड़ी तीव्र है। ध्रुवस्वामिनी प्रसाद के नाटकीय नारी पात्रों में स्वाभिमान की सबसे अधिक तेजस्वी तारिका है। नारी पात्रों में तितली और तारा की सृष्टि अद्वितीय है। यह दोनों पात्र त्याग और बलिदान का उच्चतम आदर्श उपस्थित करते हैं। जिस प्रकार शरत बाबू और प्रेमचन्द की नारियां पुरूषों के कल्याण और उद्धार का कारण बनती है। उसी प्रसाद के साहित्य की नारियाँ पुरूषों के जीवन में दीपशिखा बनती है।[6]

प्रसाद को नारी का ममतामय, त्यागमय, संवेदनशील और मधुरिमा मंडित रूप ही स्वीकार है। किन्तु इस ममतामयी नारी के अतिरिक्त प्रसाद जी ने अपने साहित्य में ही नारी-पात्रों की सृष्टि भी की है। जो मानवगत दुबर्लताओं से अभिसप्त होकर मिथ्याभिमान, स्वार्थ परायणयता, ईर्ष्या आदि अनुदात्त वृतियों की पराकोटि को प्राप्त करती हैं। —–‘कामायनी’ में इड़ा का रूप वैज्ञानिक युग की अधिकार लिप्सा, बाह्य आकर्षण से युक्त दपोन्मुत नारी का स्वरूप अंकित किया है। ‘कामायनी; में ईड़ा व्यक्तित्ववादी नारी के उस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती है जो पाश्चात्य सभ्यता में पोषित होकर वैभव विलास कामना और अधिकार भावना को अपना सर्वस्व समझती है और जो हृदय की विश्वासमयी, रागात्मिका वृतित्यों को भी ऐश्वर्य और अधिकार की तुला पर तौलती है। वह एक ऐसी नारी का प्रतिरूप है। जो स्वार्थ परायण एवं बौद्धिकता को प्रधानता देकर अपने रूप के मोहक आकर्षण का जाल विछाकर पुरूष को अपनी ओर आकर्षित करती है और जो हृदय की सरस एवं स्निग्ध विभूतियों से विहीन जीवन की अखण्डता एवं शाश्वत सुख शान्ति में वर्ग विभाजन की सृष्टि करती है और अभेद एवं अभिन्नता के स्थान पर भेद की सृष्टि करने में सुख और आनन्द का अनुभव करती है। कवि के अपने शब्दों में ऐसी नारी का कृतित्व निम्न रूप से दृष्टव्य है –

‘यह अभिनव मानव प्रज्ञा सृष्टि
दृयता में लगी निरन्तर ही वर्णों की करती रहे सृष्टि
—–
कोलाहल कलह अनन्त चले एकता नहर हो बढ़े भेद।
अभिलषित वस्तु तो दूर रहे हा मिले अनिच्छित दुखद खेड़ा।’ इत्यादि।

‘कामायनी’ के अंतिम चरण में इड़ा का श्रद्धा के उदात्त ममत्वपूर्ण एवं संवेदनशील चरित्र से प्रभावित होना और उसके हृदय का भावनामय एवं अनुराग रंजित हो उदात्त की अनुदात्त पर ज्वलन्त विजय है। वास्तव में युग-युग में नारी के मंगल रूप की ही अभ्यर्थना करता आया है और उससे पलायन कर उसे पश्चाताप की अग्नि में जलना पड़ा है। आहत मनु के शब्दों से प्रसाद ने नारी के आदर्श रूप का अभिनंदन किया है। यही वास्तव में प्रसाद की नारी का सत्य स्वरूप है –

‘तुम अजस्त्र वर्षा सुहाग की
और स्नेह की मधु रजनी।
चित अतृप्ति जीवन यदि था तो
तुम उसमें संतोष बनी।
कितना है उपकार तुम्हारा।
आश्रित मेरा प्रणय हुआ।
कितना आभारी हॅू इतना
संवेदनमय हृदय हुआ।
किन्तु अधम में समझ न पाया
उस मगल की छाया को
और आज भी पकड़ रहा हॅू
हर्ष शोक की छाया को।’

अन्तिम पक्तियों में ग्लानि है। प्रत्युत सारी मानव संस्कृति की ग्लानि है। जो नारी के मंगल रूप का तिरस्कार कर उससे पलायन करती है और हिसांत्मक कर्मो में प्रवृत्त हो जाती है। प्रसाद जी की नारी भावना की प्रतीक यह श्रद्धा है। उसकेा नारी, संस्कृति का प्रतीक मानकार कवि यह कह उठा है-

‘नारी ममता का बल
वह शक्तिमती छाय शीतल।’[7]

प्रसाद ने अपनी साहित्य सृष्टि में नारी जीवन के विविध रूपों को अंकित किया है। उनके सत्पात्रों में त्याग, औदार्य, समर्पण और प्रेम की व्यापकता है। असत् पात्रों में स्वार्थपरता, कामुकता और पांखड है। इस विविधता और विचित्रता में भी नारी का शाश्वत रूप प्रसाद प्रकट कर सके हैं- वह है नारी का मंगलकारी रूप। वह कल्याण है शुभकर्ती है शांति दायिनी और प्रेम पयोनिधि है। उसका सम्मान जगन्नियता का सम्मान है। उसे सूखी बनाना ह्योर, घर, परिवार, समाज और विश्व को सुखी बनाना है। वह मानव जीवन के लिए प्रकाश स्तम्भ है। यही है प्रसाद का हमारे युग को नवीन संदेश।[8]

संदर्भ ग्रन्थ सूची –

  1. कहानीकार प्रसाद, अवतार शर्मा, के॰एल॰पचौरी प्रकाशन, गाजियाबाद, सं॰ 1993 पृ॰-26
  2. वही, पृ॰-26
  3. ज्ीम ेजनकल व िइवमजतल इल ीण्ू हंततवक चंहम 37
  4. युग प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद, पृ॰ 49-50
  5. प्रसाद की साहित्य साधना, डॉ॰ शम्मुनाथ पाण्डेय, प्रतापचन्द्र जायसवाल, पृ॰ 64-65
  6. युग प्रवर्तक पृ0-50
  7. प्रसाद की साहित्य साधना- डा शम्भुनाथ पाण्डेय, प्रतापचन्द जायसवाल, पृ-66-67
  8. युग प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद पृ॰- 5

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