मंजिल अवधेश कुमार ‘अवध’

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सावन  के  अंधे  को सब कुछ, हरा- हरा ही लगता है।
राजमहल  में  रहने  वाला, खुद  में   सोता – जगता है ।।

जिसको जो परिवेश मिला है, कौन बुद्ध सा तोड़ेगा!
राजमहल के सुख साधन को, कुटिया के हित मोड़ेगा!!

राजमहल  में  कुटी  बनाना, या कुटिया  में  राजमहल?
ये कहने की बातें हैं बस, बढ़कर करता कौन पहल??

परिवर्तन  की  आस  लगाए, गुमसुम होकर जो बैठें ।
अपने नेताओं के पीछे, बाट जोहते जो ऐठें ।।

उनसे  कह  दो  आसमान  से, परिवर्तन  ना टपकेगा ।
अगर कभी कुछ मिला अचानक, नेता झटपट लपकेगा ।।

इसीलिए   अपने   हाथों  पर, सर्वाधिक  विश्वास करो ।
गैरों से उम्मीद छोड़कर, निज क्षमता पर आस करो ।।

माना कठिन डगर है लेकिन, बैठ समय को मत खोना ।
अब तो जागो सोने वालों, फिर अतीत पर मत रोना ।।

बिन कुर्बानी के बोलो कब कहाँ किसे कुछ हाथ लगा ?
स्वप्न देखकर सोने वालों का बोलो कब भाग्य जगा ??

तन्द्रा या जंजीर रूढ़ियों, को बनने मत दो बाधा ।
अर्जुन ने भी लक्ष्य विजय की, जब उसने शर को साधा ।।

उठो ‘अवध’ अब देर न करना, पहला कदम उठा के चल ।
मिल जाएगी प्यारी मंजिल, आज नहीं तो निश्चय कल ।।

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