‘आरंभ’ : विश्वविद्यालय के प्रांगण से विश्वभर के हिंदी पाठकों तक

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तमाम सवालों, उलझनों के साथ विचार की लम्बी प्रक्रिया से होते हुए आरंभ का पहला अंक 18 जुलाई 2014 को आया। यह अंक पहली सीढ़ी के समान था, जिससे होते हुए अंतहीन फ़लक की तरफ़ जाना था। इसलिए गहरे अर्थों वाले विविधता युक्त चंद लेखों के साथ मजबूत इरादों को लेकर अंतहीन रास्ते पर निकल पड़े और कारवाँ बनता गया; हालाँकि यह अंक कुछ अव्यवस्थित और त्रुटियुक्त रहा। सम्पादकीय रणनीति के तहत प्रयोग करते हुए स्थायी संपादक न रखकर चक्रीय व्यवस्था के तहत संपादक रखने और अतिथि संपादकों को भी रखने का निर्णय लिया गया। इसे हमारी कमजोरी कहें या प्रयोग या विषय के अनुसार सम्पादक चुनने की आज़ादी या फिर विविध अनुभवों के संसार में जाने की प्रक्रिया, लेकिन ‘आरंभ’ का आरंभ इसी निर्णय के साथ हुआ और सकारात्मक विचारों के साथ निर्विवाद आगे बढ़ता रहा। आज ‘आरंभ’ के विश्वभर में 10  लाख पाठक हो चुके हैं|

पत्रिका के पहले अंक का संपादक कौन हो? इसके लिए हाँ-नहीं, इसे-उसे की कश्मकश जारी रही क्योंकि पहले अंक का दबाव रहना स्वभाविक था। दूसरा दबाव नई पहल की ज़िम्मेदारी संभालने की थी। खैर इस कश्मकश से होते हुए संपादक ‘शैलेन्द्र कुमार सिंह’ ने पहले अंक का संपादकीय कार्यभार संभाला। इस अंक के लेखों में पत्रिका की प्रधान सलाहकार व पथ प्रदर्शक व किरोड़ीमल महाविद्यालय की वरिष्ठ प्राध्यापिका (सेवा नि.)‘डॉ. किरण नंदा’ जी का लेख ‘काशी या बनारस’ बनारस के ऐतिहासिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक व आधुनिक सन्दर्भों का उल्लेख करता गहन चिंतन प्रकट करता है। वहीँ अध्यापन के साथ साथ पिछले एक दशक से साहित्य सृजन में सक्रिय ‘डॉ. प्रज्ञा’ जी का लेख ‘मुंहबोले नाना’ रिश्तों की नई परिभाषा गढ़ता है, जो इनकी नई पुस्तक ‘आईने के सामने’ में संकलित है। इस अंक का विशेष आकर्षण दूरदर्शन के प्रसिद्ध एंकर श्री ‘अशोक श्रीवास्तव’ जी से हिंदी भाषा में रोजगार की विभिन्न संभावनाओं पर बातचीत, साथ ही पत्रकारिता के क्षेत्र में रोजगार की संभावनाओं पैर उनके विचार रहे। इसके अतिरिक्त कुछ कविताएँ व लेख रहे, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी (व तदर्थ प्राध्यापक) ‘हेमंत रमण रवि’ की कविता ‘सांप से बड़े नेता जी’ केंद्रीय आकर्षण रही।

पहले अंक की कमियों को दूर करते हुए दूसरे अंक को अपेक्षाकृत अधिक व्यवस्थित रूप में लाया गया, फिर भी कुछ त्रुटियाँ रह ही गईं। दूसरा अंक विविध विषयों को लेकर पाठकों के समक्ष आया फिर भी हमारा प्रयास ‘सूचना प्रौद्योगिकी और साहित्य’ के सन्दर्भ में सोशल मीडिया के महत्व को रेखांकित करना रहा। इसके संपादन का कार्यभार पत्रिका के तत्कालीन संपादक सदस्य अनुराग सिंह जी ने संभाला, जिन्होंने अपने सम्पादकीय लेख में सूचना प्रौद्योगिकी के महत्व को रेखांकित किया। इस अंक के कुछ प्रमुख लेखों में युवा पत्रकार शुभम गुप्ता का लेख ‘भारत-ऑस्ट्रेलिया सम्बन्ध: नए ऊचाईंयों की ओर’ अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के महत्व पर प्रकाश डालता है। वहीँ दूसरी तरफ़ पत्रिका के संस्थापक व प्रधान संपादक(तत्कालीन) विकास कुमार जी का लेख ‘हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री’ पत्रिका की विविधता को मजबूती प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त विमर्शात्मक लेख, शोध-प्रपत्र, कविताएँ आदि इस अंक को मजबूत आधार प्रदान करते हैं।

तीसरा अंक मार्च महीने को ध्यान में रखते हुए ‘स्त्री-विशेषांक’ रखा गया और संपादन की जिम्मेदारी पत्रिका की संस्थापक व संपादक(वर्तमान प्रधान संपादक) मनीषा तँवर जी ने ली। इन्होनें सम्पादकीय लेख में स्त्री को ‘व्यक्ति’ के रूप में पहचान दिलाने की वकालत की। प्रमुख लेखों में डॉ. प्रज्ञा की ‘फ्रेम’ कहानी, ओ.एन.जी.सी में ‘राजभाषा अधिकारी’ के पद पर कार्यरत जय प्रकाश पाण्डेय का शोध पत्र ‘भारतीय साहित्य और संस्कृति में नारी’, रवि कुमार गौड़ का लेख ‘आदिवासी स्त्री अस्मिता’ (जो कि आदिवासी समुदाय की नारी को केंद्र में लाने की वकालत करता है) प्रमुख आकर्षण रहे। अंक की विविधता बनाए रखने के उद्देश्य से पूर्व भारतीय प्रशासनिक अधिकारी’ डॉ. विकास दिव्यकीर्ति द्वारा ‘बदलापुर’ फिल्म की समीक्षा को विशेष महत्व दिया गया। इस अंक में प्रकाशित दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी (व तदर्थ प्राध्यापक) प्रभांशु ओझा की कविता ‘प्रियतम’ स्त्री-पुरुष संबंधों में स्त्री के महत्व को रेखांकित करती है। पाठक समुदाय ने इस अंक को विशेष महत्व दिया।

पत्रिका का चौथा अंक भी विविध रखा गया लेकिन ‘हिंदी साहित्य और सोशल मीडिया’ को औपचारिक विषय बनाया गया। संपादन का कार्यभार संपादक सदस्य अभिषेक यादव जी ने संभाला। इस अंक का विशेष आकर्षण रामलाल आनंद कॉलेज के प्राध्यापक डॉ. राकेश जी द्वारा प्रसिद्ध इतावली लेखक श्री इतालो काल्किनो की कहानी ‘तीन कुत्ते’ का अनुवाद रहा। इसके अतिरिक्त मॉरिशस के हिन्दी साहित्यकार व मॉरिशस नागरी प्रचारिणी सभा के सदस्य श्री राज हीरामन की कविता ‘परिंदे के कटे पंख’ और दौलत राम कॉलेज की प्राध्यापिका इन्दु सोनी जी का लेख ‘वैदिक काल विषयक अवधारणा’ भी शामिल किया गया। साहित्य और सोशल मीडिया को लेकर कई लेख प्रकाशित किये गए जैसे – ‘साहित्य से ऑनलाइन साहित्य’ , ‘बदलते संबंध और सोशल मीडिया’, ‘हिंदी का ई- साहित्य’, ‘ज्ञान का अतिरिक्त साधन :ऑनलाइन जगत’ आदि।

पांचवां अंक सामान्य रखा गया कोई औपचारिक विषय भी नहीं रखा गया। इस अंक का संपादन विकास जी ने किया। इस अंक में जावेद अख्तर के गजलों की समीक्षा प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री एम.एम. चंद्रा द्वारा ‘दुनिया दुनिया न रहे गजल हो जाए’ प्रकाशित हुई। वहीँ इस अंक में शामिल डॉ. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय सागर, मध्यप्रदेश के प्राध्यापक श्री सुरजीत सिंह वरवाल का संस्मरण ‘प्रेम या पाप’ सामाजिक संबंधों पर विचार प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही कविता, कहानी, समीक्षा, शोध-पत्र व अनुवाद आदि प्रकाशित हुए। इस अंक तक आते-आते पत्रिका अपने व्यवस्थित रूप को लगभग प्राप्त कर चुकी थी।

छठा अंक समय की जरुरत को देखते हुए ‘अभिव्यक्ति के अधिकार की ओर’ विशेषांक निकाला गया। इस अंक का संपादन उत्तर-प्रदेश सरकार के प्रशासनिक अधिकारी व दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी दीपक जायसवाल जी ने किया। इस अंक का विशेष आकर्षण अभिव्यक्ति का अधिकार व समस्याओं पर केन्द्रित दिल्ली विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के प्राध्यापक डॉ. आशुतोष कुमार का साक्षात्कार रहा। वहीं राजकीय महाविद्यालय, अल्मोड़ा, उतराखंड के प्राध्यापक डॉ. प्रकाश चंद्र भट्ट का लेख ‘अभिव्यक्ति का प्रश्न और आलोचना का विवेक’ अभिव्यक्ति के विशेष साहित्यिक संदर्भों को उल्लिखित करता है। इस अंक का स्वागत पाठक समुदाय व सर्जक समुदाय द्वारा व्यापक तौर पर किया गया। विषय से सम्बन्धित लेख, कहानी, कविता, अनुवाद, समीक्षा, शोध-पत्र आदि मिले जिनके प्रकाशन से यह अंक अत्यधिक समृद्ध रहा।

सातवाँ अंक नवीन गद्य विधाओं रेखाचित्र, संस्मरण, यात्रावृतांत आदि को समर्पित किया गया। इनके अतिरिक्त लघुकथा, गद्यगीत, एवं साक्षात्कार को भी शामिल किया गया।  इस अंक के संपादन की जिम्मेदारी पुनः मनीषा तँवर जी ने ली। प्रमुख लेखों में किरोड़ीमल महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) की वरिष्ठ प्राध्यापिका डॉ. विद्या सिन्हा जी का यात्रावृतांत ‘बिहार के लोकगायकों के बीच छः दिन’(भाग-1) लोक जीवन व लोक संस्कृति के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत करता है। वहीं डॉ. किरण नंदा जी का यात्रावृतांत ‘ह्वार्ड स्कवायर की एक शाम’ विदेश की जीवन अनुभूतियों की दास्ताँ बयाँ करता है। जिसमें पश्चिम की शिक्षा, मानसिकता, संस्कृति व समाज के साथ आर्थिक जीवन का विशिष्ट अनुभव झलकता है। वहीं सीमा भारती जी का यात्रावृतांत ‘उस रहस्यमयी गुफा की ओर’ एवं श्री संजय श्रीवास्तव का ‘लढोर जाएंगे तो कुछ अलग पाएंगे’ यात्रा के विशिष्ट अनुभवों को व्यक्त करते हैं। मोनिका नांदल जी द्वारा ‘रंगकर्मी मलयश्री हाशमी’ से साक्षात्कार, साक्षात्कार विधा के साथ रंगमंच की विविध संभावनाओं को प्रकट करता है। डॉ. प्रज्ञा जी के द्वारा प्रस्तुत कथाकार अरुण प्रकाश की स्मृति-चित्र ‘एक स्थगित जिंदगी’ सुंदर संमरण है। जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज की प्राध्यापिका डॉ. सुधा उपाध्याय द्वारा  प्रदीप मिश्र की कविता संग्रह ‘उम्मीद’ की समीक्षा प्रकाशित की गई। युवा लेखिका आरिफा एविस जी का लेख ‘पुरुषवादी मानसिकता का बर्बर रूप’ प्रासंगिक चिंतन प्रस्तुत करता है। इसके अतिरिक्त बहुत से रेखाचित्र, संस्मरण, व यात्रावृतांत प्रकाशित किए गए।

आठवां अंक पुनः विशेषांक रखने की रणनीति के तहत ‘अस्मितामूलक साहित्य एवं वर्तमान समाज’ विषय निर्धारित किया गया। इस अंक के संपादन का कार्यभार संपादक सदस्य रवि कृष्ण कटियार को सौंपा गया। इस अंक का विशेष आकर्षण कोलकाता प्रेसिडेंसी कॉलेज के प्राध्यापक डॉ. सत्यदेव जी द्वारा सुविख्यात महिला नाटककार मीराकांत से स्त्री विमर्श पर विशेष साक्षात्कार रहा। वहीँ दूसरी तरफ़ वर्तमान में अस्मितामूलक विमर्श की स्थिति, संभावनाओं व समस्याओं पर जे.एन.यू के वरिष्ठ प्रोफेसर रामचंद्र जी के साथ आरंभकर्ताओं की बातचीत इस अंक को मजबूती प्रदान करता है। आदिवासी अस्मिता विमर्श पर रामलाल आनंद कॉलेज के प्राध्यापक डॉ. राकेश जी का लेख इस विमर्श के विविध आयामों को प्रकट करता है। वहीँ अस्मिता विमर्श से जुडी कविताएँ समाज में स्वस्थ मानसिकता के विकास पर बल देने के साथ वंचित समुदाय के सशक्तिकरण पर भी बल देती हैं। इसमें प्रकाशित शोभा मैठानी की ‘वेदना’ एवं  उमा सिंह (भूतपूर्व प्रधानाचार्य) की ‘अतीत जीता है’‘नारी का उद्घोष’, सीमा झा की कठपुतलियाँ एवं डॉ. ऋतु जी की ‘मनुष्य’ प्रमुख कविताएं हैं। वर्तमान समतामूलक समाज के लिए भारतीय मीडिया की भूमिका पर विनीत शर्मा का विचारात्मक लेख ‘समतामूलक समाज और भारतीय मीडिया’ पाठकों का ध्यान खींचता है। वहीं दूसरी तरफ़ व्यंग्यकार एम.एम.चंद्रा का लेख ‘जलती दुनिया: जिम्मेदार कौन’ मानव अस्तित्तव व जलवायु परिवर्तन  के सन्दर्भ में विमर्श प्रस्तुत करता है। आरिफा एविस का लेख ‘मजदूरों की संघर्ष गाथा’ मजदूरों को विमर्श के केंद्र में लाते हुए उनके राजनितिक उपेक्षित होने के कारणों पर प्रकाश डालता है। इसके अतिरिक्त शोध पत्रों के साथ कई विचारात्मक लेख इस अंक को अत्यधिक समृद्ध करते हैं, साथ ही ‘आरंभ’ पत्रिका के इस सफ़र को एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं।

9वाँ अंक एक बार फिर से विशेषांक रखा गया। इस बार विशेषांक का विषय ‘प्रवासी हिंदी साहित्य’ रखा गया और इस अंक के संपादन की जिम्मेदारी प्रभांशु ओझा को सौंपी गई। इस अंक में शामिल लेखों की बात करें तो; पत्रिका की वरिष्ठ सलाहकार डॉ किरण नन्दा का लेख यादों के झरोखे से शरद आलोक’ ” नार्वे के प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल की हिन्दी भाषा व साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। वहीं दूसरी तरफ प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी, कलकत्ता की प्राध्यापिका मुन्नी गुप्ता द्वारा न्यूयॉर्क के कोलम्बिया यूनिवर्सिटी में हिन्दी की प्राध्यापिका और साहित्यकार प्रो. सुषम बेदी  का लिया गया साक्षात्कार स्त्री विमर्श के विभिन्न आयामों को दर्शाता है, साथ ही न्यूयॉर्क में प्रवासी साहित्य की संभावनाओं को भी दर्शाता है। दूसरी तरफ दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ राकेश कुमार का लेख स्मृतियों की संधिरेखा की कविताएं’ प्रसिद्ध प्रवासी महिला साहित्यकार सुधा ओम ढींगरा के कविता संसार के विमर्श पर प्रकाश डालता है, विशेषतः उनकी कविता संग्रह ‘सरकती परछाइयाँ पर। शा. महाविद्यालय कुंडम, जबलपुर की प्राध्यापिका डॉ मधुमती नामदेव का लेख ‘प्रवासी दिव्या माथुर का कथा साहित्य में योगदान’ लंदन में हिन्दी कथा साहित्य के साथ दिव्य माथुर के कथा संसार को स्पष्ट करता है। वहीं शैलेंद्र सिंह का लेख प्रयोग का धुरंधर साहित्यकार” मॉरीशस के प्रसिद्ध साहित्यकार रामदेव धुरंधर द्वारा सृजित एक नयी गद्यविधा गद्यक्षणिका पर प्रकाश डालता है।

10वाँ अंक सामान्य रखा गया और इस अंक के संपादन की जिम्मेदारी पत्रिका की संपादक सदस्य ‘ललिता जोशी’ को सौंपी गई। हमने देखा है कि जब-जब पत्रिका को गैर-विशेषांक के तौर पर प्रकाशित करतें हैं तो इस अंक में मौलिकता व रचनात्मकता के नए-नए आयाम झलकते हैं। इस अंक में कहानी, कविता, लेख, लघुकथा, साक्षात्कार विशेष उत्सुकता के साथ रचनाकारों द्वारा भेजे गए। इस अंक का विशेष आकर्षण रहा, केन्द्रीय सरकार कर्मचारी कल्याण परिषद् के संयुक्त सचिव श्री अजय कुमार से प्रभांशु ओझा की बातचीत, जो स्वास्थ्य सम्बन्धी विभिन्न मुद्दों को मौलिक अधिकार के परिपेक्ष्य में प्रस्तुत करता है। वहीँ दूसरी तरफ़ वरिष्ठ कलाकार, फिल्म अभिनेता सागर सैनी से डॉ. सुमन की बातचीत एक कलाकार के जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागार करता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रतिष्ठित रचनाकारों के साथ नए रचनाकारों की रचनाओं को भी जगह दी गई।

11वाँ अंक भी सामान्य रखा गया। इस अंक का संपादन पत्रिका के वरिष्ठ संपादक सदस्य और कलकत्ता प्रेसिड़ेंसी कॉलेज के प्राध्यापक डॉ. सत्यदेव जी ने किया। इस अंक का विशेष आकर्षण डॉ. किरण नंदा, डॉ. विद्या सिन्हा, डॉ. प्रज्ञा, डॉ. गोपाल निर्दोष, प्रसिद्ध व्यंग्यकार एम.एम. चन्द्रा और डॉ. रूपा सिंह आदि प्रतिष्ठित लोगों की विभन्न रचनाएँ रहीं जिन्हें पाठकों द्वारा सहर्ष स्वीकारा और सराहा गया। इसके अतिरिक्त साहित्यिक व गैर साहित्यिक लेख भी इस अंक को मजबूती प्रदान करते हैं।

12वाँ अंक कहानी विशेषांक के तौर पर निकाला गया और इस अंक के संपादन की जिम्मेदारी शैलेन्द्र कुमार सिंह को सौंपी गई। इस अंक के विशेष आकर्षण में यूक्रेन से राकेश शंकर भारती की कहानी ‘हैरानियत’ और मॉरीशस के सुप्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी की चार लघुकथाएँ रहीं। इसके अतिरिक्त हिंदी के युवा साहित्यकार डॉ. प्रज्ञा, भगवंत अनमोल, वंदना गुप्ता, आदि कि कहानियाँ भी प्रकाशित हुईं। इसके अतिरिक्त ‘आरंभ युवा महिला कथाकार प्रतियोगिता’ की विजेताओं की कहानियाँ भी इस अंक में प्रकाशित की गईं। इसके अतिरिक्त हिंदी के सुप्रसिद्ध गज़लकार श्री राजेश रेड्डी जी की दो गज़लें प्रकाशित की गईं, तो वहीँ डॉ. राकेश कुमार का लेख ‘इक्कसवीं सदी का भाषाई साम्राज्यवाद और हिंदी’ एक ज्वलंत मुद्दे को उजागर कर इस अंक को मजबूती प्रदान करता है।

13वां अंक बाल साहित्य विशेषांक के तौर पर निकाला गया और इस अंक की जिम्मेदारी पत्रिका की प्रधान संपादक मनीषा तंवर ने ली, चुकिं वह बच्चों के लिए कार्य करने वाले एक स्वयं सेवी संस्था से जुड़ी हैं और कई वर्षों से उन बच्चों को प्राथमिक और मौलिक शिक्षा प्रदान कर रही हैं, तो  ऐसे में बच्चों की मानसिकता को उनसे बेहतर और कोई नहीं समझ सकता था। आरंभ ने इस अंक में अपनी हमेशा की तरह कुछ नया करने की सोची और इस अंक में बच्चों की रचनाओं  को भी शामिल किया। खास बात यह रही कि इस अंक में देश के विभिन्न शहरों के  बच्चों ने अपनी नन्हीं सोच से ओतप्रोत रचनाएं भेजीं; सुहानी यादव (कक्षा-पांच), अनिकेत नेगी (कक्षा-आठ), अर्जुन चौधरी (कक्षा-छ), आपर्णा चंद्रा (कक्षा-आठ), सौम्या सिंह (कक्षा-नौ) अन्य कई बच्चों की रचनाएं  शामिल की गईं। इसी के साथ अन्य लोगों ने भी इस अंक में अपनी रूचि दिखाई और अपनी अप्रितम रचनाएं आरंभ को भेजी।

14वां अंक आते-आते आरंभ ने पाठकों और रचनाकारों के बीच एक खास जगह बना ली थी।  लेकिन उसके बाद आरंभ कुछ तकनीकी परेशानियों से गुजरा और करीब 6 माह तक कोई भी अंक नहीं निकाल पाया। आरंभ के पाठकों और रचनाकारों का ही विश्वास हमारे लिए मील का पत्त्थर साबित हुआ। आपने एक बार फिर से आरंभ को खड़ा किया और इस बार आरंभ के लिए उनके रचनाकार भी खड़े थे उन सभी ने हमारा साथ दिया और आरंभ का यह अंक बहुतायत रचनाओं के साथ प्रकाशित हुआ। जिसमें करीब 10 शोध पत्र शामिल थे, जो पूरे देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों ने भेजे थे। इस अंक का संपादन शैलेंद्र कुमार सिंह ने किया।

आंरभ का सफर एक पत्रिका के रूप में तो रहा ही है, साथ ही आरंभ ने हमेशा यही चाहा है कि वह युवा रचनाकारों के एक सही और सुव्यवस्थित मंच प्रदान करे। आज के समय में नवोदित रचनाकारों से भी अपनी रचनाओं को प्रकशित करवाने के लिए अनुभव की अपेक्षा की जाती है तो ऐसे में उन्हें निराशा ही हाथ लगती है। आरंभ का मूल उद्देश्य ही यही है कि युवा रचनाकारों को क्यों न ऐसा मंच दिया जाए, जहां वे बिना किसी कठिनाई के अपनी रचनाओं को सुधी पाठकों तक पहुंचा सकें। आरंभ के इस सफ़र में पाठकों का योगदान सरहनीय रहा है।

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