बलात्कार सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा | जयति जैन ‘नूतन’

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दिन प्रतिदिन बलात्कर बढ़ते जाने का दोषी किसे ठहराया जाए? किस-किस को राजनीति करने से रोका जाए? कल तक डरते थे कि कलंक ना लग जाये बेटियों के चरित्र पर, आज लगता है कैसे भी हो बेटियाँ सुरक्षित रह जाएं!  तंत्र को दोष दें या समाज में बसे बहशियों को, इनपर रोक नहीं लग रही; भ्रष्ट तंत्र को ही कहा जाये! ऐसा बिल्कुल नहीं कि समाज गलत नहीं है, किसके मन में क्या है? कौन किसे समझए? चाचा, ताऊ, मामा और अब पिता
किस-किस से बेटी को छुपाया जाए, कोई बोल भी दे अब, कोई तो उपाय बताए।

कड़ी सजा का प्रवधान अब तक न हो सका, चार तो गुजर गए, पांच साल होने को आये। पहले भ्रूण में सुरक्षित नहीं थी बेटियां, जो जीवित हैं उन्हें कौन बचाये?
एक ओर आसमां छूने को तैयार हैं बेटियां, अपनों के साथ से उन्हें मंज़िल पर पहुँचाया जाए। बीच राह में टूटकर बिखर गई एक बेटी, आबरू लूटने वालों को कैसे रोका जाए? जनता आक्रोश जता रही है हर तरफ, नेता हैं कि आरोपी को हिन्दू-मुस्लिम किये जा रहे हैं! देश की सरकार ने क्या कदम उठाए पता नहीं, कुछ नहीं तो तुरन्त फांसी की सज़ा ही तय कर दी जाये।

मेरी भी बहनें हैं, तुम्हारे घर भी बेटियां हैं, चलो अब कुछ बदलाव की अलख जगाई जाये । खुद को बदलो देश बदलेगा सुनते रहे हैं हरदम, थोड़ा तुम बदल जाओ थोड़ा बदलाव स्वयं में लाया जाये। आज़ादी का महीना है चलो इस बार, देश की बेटियों को मनचलों के भय से आज़ाद करवाया जाये। समझ सको तो स्थिति की गंभीरता को समझो, कहीं खुद की बेटी का नंबर ना आ जाये!

जयति जैन “नूतन”
शक्तिनगर, भोपाल

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