भारतीय राजनीति में महिला प्रतिनिधित्व की दशा और दिशा | एम. आरिफ़ खान

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                                                      चलो एक कारनामा ऐसा भी ईज़ाद करते हैं,

                                                           लगाकर अदालत नैतिकता की,

                                                  एक मुक़दमा मर्दों की हुकूमत के खिलाफ़ लड़ते हैं,

                                                          तुमने किये है बहुत सवाल खड़े

                                                             औरतों की पोशाक पर,

                                                       कठघरे में रखकर मर्दों की नियत को

                                                           एक कामयाब जिरह करते हैं,

                                                          बराबरी, आज़ादी, हक़ और इंसाफ़

                                                             ये सब बेकार की बातें हैं,

                                                            चलो अब औरतों को आज़ाद

                                                            और मर्दों को गुलाम करते हैं

                                                        एक कारनामा ऐसा भी ईज़ाद करते हैं

                                                        एक कारनामा ऐसा भी ईज़ाद करते हैं

                                                              — एम. आरिफ़ खान (स्वरचित)

 

सारांश : भारतीय राजनीति में आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी महिलाओं की भागीदारी बहुत कम बनी हुई है। वास्तव में भारत की आधी आबादी का एक बहुत बड़ा भाग अभी भी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित है। आज ज़रूरत इस बात की है कि इन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ा जाए। भारत की राजनीति में वर्षों से पुरुषों का ही वर्चस्व रहा है, भारत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम होने के पीछे अब तक समाज में पितृसत्तात्मक ढाँचे का मौजूद होना है। लेकिन राजनीतिक दलों के भेदभावपूर्ण रवैये के बावजूद मतदाता के रूप में महिलाओं की भागीदारी नब्बे के दशक के अंत से उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है  ऐसे में यह अनिवार्य हो जाता है कि चुनावों के विभिन्न स्तर पर महिलाओं की भागीदारी का विश्लेषण किया जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि स्वंत्रता के छह दशक बाद भी इसमें असमानता क्यों है  और चुनाव में कितना प्रतिशत महिलाओं को टिकट दिया जाता है?  और आज भी क्यों महिलाएं समाज की मुख्य धारा से वंचित है? क्यों महिला आरक्षण बिल अभी पास नहीं हुआ है? यह शोध पत्र इन्हीं प्रश्नों को ध्यान में रखकर महिला राजनीति का विश्लेषण करता है और इन्हीं प्रश्नों के उत्तर की खोज करते हुए वर्तमान महिला स्थिति की भी जांच-पड़ताल करता है।

1952 में लोकसभा में 22 सीटों पर महिला काबिज़ थी परन्तु 2014 में हुए चुनाव के बाद लोकसभा में 62 महिलाएं ही पहुंच सकीं, यह वृद्धि 36% है लेकिन लैंगिक भेदभाव अब भी भारी मात्र में मौजूद है तथा लोकसभा में 10 में से 9 संसद पुरुष हैं। 1952 में लोकसभा में महिलाओं की संख्या 4.4% थी जो 2014 के लोकसभा में लगभग 11% है परन्तु यह अब भी वैश्विक औसत से 20% कम है। हालांकि भारत के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की सफ़लता का विश्लेषण करने वाले एक विशेषज्ञ के अनुसार यह पिछले तीन आम चुनावों से बेहतर रही है। 2014 के आम चुनावों में महिला की सफ़लता 9% रही है जो पुरुषों की 6% की तुलना में 3% ज़्यादा है।

 

मुख्य शब्द : राजनीति में महिला भागीदारी, महिला आरक्षण बिल, चुनावों में महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत

 

परिचय

देश की जनगणना सन् 2011 के अनुसार महिलाओं की शैक्षणिक स्थिति काफी चिन्ताजनक है। देश में पुरुष साक्षरता दर 82.14 प्रतिशत और महिला साक्षरता दर मात्र 65.46 प्रतिशत बनी हुई है। शैक्षणिक दृष्टि से महिला अब भी पिछड़ी हुई है और महिला शिक्षा के प्रसार की आज बहुत आवश्यकता है। पुरूष प्रधान भारतीय समाज में नारी की स्थिति दिल दहलाने वाली बनी हुई है। मनुस्मृति में महिला का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार नहीं किया गया – ‘बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में पुत्र के अधीन रखा गया है।’ हालांकि भारतीय संविधान ने नारी को पुरुष के समकक्ष माना है। सरकार की ओर से समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे- दहेज प्रथा का विरोध, भ्रूण हत्या पर प्रतिबन्ध, लिंग परीक्षण पर पाबन्दी के प्रयासों का भारतीय समाज में कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा, बल्कि ये कुरीतियाँ ज्यादा फैल रही हैं।[1] आज समाज में उनकी दयनीय स्थिति समाज में चली आ रही परम्पराओं का परिणाम है। महात्मा गांधी ने कहा था – ‘स्त्री तो पुरुष की सहचरी है, उसे पुरुष के समान ही मानसिक क्षमताएँ प्राप्त हैं। उसे पुरुष की गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार है और पुरुष के समान ही स्वतंत्र और स्वाधीनता का अधिकार प्राप्त है। पुरुष और स्त्री का दर्जा बराबर है, लेकिन एक जैसा नहीं है। वे एक अनुपम युगल हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। उनमें से प्रत्येक एक-दूसरे की सहायता करते हैं, इस प्रकार एक के बिना दूसरे के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। विभिन्न कुप्रथाओं व समस्याओं ने महिलाओं को दयनीय व हीन अवस्था में पहुंचा दिया है। पर्दा प्रथा के कारण महिला घर में बंदी बना दी गई। दहेज प्रथा ने पुत्री के जन्म को ही अभिशाप बना दिया। बाल विवाह ने विधवा समस्या व वेश्यावृत्ति को जन्म दिया। समाज में कुप्रथाओं के बढ़ने से महिला की स्थिति अधिक जटिल और संकट में घिर गई।[2]

दूसरे देशों की तुलना में भारतीय महिलायें कम से कम एक मामले में भाग्यशाली रहीं हैं और वह यह कि उन्हें आजादी के बाद ही पुरुषों की तरह मत देने और चुनाव में खड़े होने का अधिकार प्राप्त हो गया था। मतदाता के रूप में पुरुषों के समान सीमित अधिकार तो उन्हें 1935 में ही हासिल हो गए थे। दुनिया के दूसरे देशों की तरह, उन्हें इसके लिए लम्बा संघर्ष नहीं करना पड़ा। पश्चिमी देशों में मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट द्वारा 1792 में स्त्रियों के लिए मताधिकार की मांग सबसे पहले उठाई गयी थी। तब से इस अधिकार के लिए जो कठिन और व्यापक संघर्ष शुरू हुआ, उसे 20वीं शताब्दी में सफलता हासिल हो सकी। कई देशों में तो आज भी महिलायें इस अधिकार से वंचित हैं।[3]

 

भारतीय राजनीति में महिला भागीदारी

लोकसभा में 1952 में महिलायें 22 सीटों पर थी जो 2014 में 61 तक आ गई है। यह वृद्धि 36 प्रतिशत है लेकिन लैंगिक भेदभाव अब भी भारी मात्रा में मौजूद है और लोकसभा में 10 में से नौ सांसद पुरुष हैं। 1952 में लोकसभा में महिलाओं की संख्या 4.4 प्रतिशत थी जो 2014 में क़रीब 11 प्रतिशत है। लेकिन यह अब भी वैश्विक औसत 20 प्रतिशत से कम है। चुनावों में महिलाओं को टिकट न देने की नीति न सिर्फ़ राष्ट्रीय पार्टियों की है बल्कि क्षेत्रीय पार्टियां भी इसी राह पर चल रही हैं और इसका कारण बताया जाता है उनमें ‘जीतने की क्षमता’ कम होना, जो चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण है।[4] हालांकि भारत के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की सफलता का विश्लेषण करने वाले एक विशेषज्ञ के अनुसार यह पिछले तीन चुनावों में बेहतर रही है।

2014 के आम चुनावों में महिलाओं की सफलता 9 प्रतिशत रही है जो पुरुषों की 6 प्रतिशत की तुलना में तीन प्रतिशत ज़्यादा है। यह आंकड़ा राजनीतिक दलों के जिताऊ उम्मीदवार के आधार पर ज़्यादा टिकट देने के तर्क को ख़ारिज कर देता है और साथ ही महिला उम्मीदवार न मिलने की बात को निराधार साबित करता है। लोकसभा और निर्णय लेने वाली जगहों, जैसे कि मंत्रिमंडल में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व सीधे-सीधे राजनीतिक ढांचे से उनको सुनियोजित ढंग से बाहर रखने और मूलभूत लैंगिक भेदभाव को रेखांकित करता है।[5] हालांकि महिलाएं राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठीक-ठाक संख्या में राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करती हैं लेकिन इन राजनीतिक दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है। नब्बे के दशक में भारत में महिलाओं की चुनावों में भागीदारी में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी देखी गई। चुनाव प्रक्रिया में महिलाओं की भागदारी 1962 के 46.6 प्रतिशत से लगातार बढ़ी है और 2014 में यह 65.7 प्रतिशत हो गई है, हालांकि 2004 के आम चुनावों में 1999 की तुलना में थोड़ी गिरावट देखी गई थी। 1962 के चुनावों में पुरुष और महिला मतदाताओं के बीच अंतर 16.7 प्रतिशत से घटकर 2014 में 1.5 प्रतिशत हो गया है।[6]

       हालांकि भारत उन देशों में से एक है जिसने दशकों पहले ही अपनी बागडोर इंदिरा गांधी के हाथों सौंप दी थी लेकिन आज भी हर स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। सोनिया गांधी, ममता बनर्जी, मायावती जैसी नेता भारतीय राजनीति के शिखर पर हैं वहीं नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर, आंदोलन की नेता के रूप में उभरी हैं। देश के प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा व कांग्रेस ने पार्टी के संगठन में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पास कर रखा है लेकिन इस नियम का ईमानदारी से पालन नहीं हो पाता। भारत में महिलाओं का इतिहास काफी गतिशील रहा है। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी कुछ महिलाओं ने राजनीति, साहित्य, शिक्षा और धर्म के क्षेत्रों में सफलता हासिल की।

आधुनिक भारत में महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोक सभा अध्यक्ष, प्रतिपक्ष की नेता आदि जैसे शीर्ष पदों पर आसीन हुई हैं। इंदिरा गांधी जिन्होंने कुल मिलाकर पंद्रह वर्षों तक भारत के प्रधानमंत्री के रूप में सेवा की, दुनिया की सबसे लंबे समय तक सेवारत महिला प्रधानमंत्री हैं। सरोजिनी नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला और भारत के किसी राज्य की पहली महिला राज्यपाल थीं। भारत में महिला साक्षरता दर धीरे-धीरे बढ़ रही है लेकिन यह पुरुष साक्षरता दर से कम है। हालांकि ग्रामीण भारत में लड़कियों को आज भी लड़कों की तुलना में कम शिक्षित किया जाता है। भारत में अपर्याप्त स्कूली सुविधाएं भी महिलाओं की शिक्षा में रुकावट है। हालांकि भारत में महिलाएं अब सभी तरह की गतिविधियों जैसे कि शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला और संस्कृति, सेवा क्षेत्र, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आदि में हिस्सा ले रही हैं।[7] विभिन्न स्तर की राजनीतिक गतिविधियों में भी महिलाओं का प्रतिशत काफी बढ़ गया है। हालांकि महिलाओं को अभी भी निर्णयात्मक पदों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है।

महिलाओं के मुद्दों के प्रति राजनीतिक दलों की गंभीरता महिला आरक्षण बिल को पास करने में असफलता से ही स्पष्ट हो जाती है। पार्टियों को महिला मतदाताओं की याद सिर्फ चुनाव के दौरान ही आती है और उनके घोषणापत्रों में किए गए वादे शायद ही कभी पूरे होते हैं। किसी राजनीतिक दल की चुनावी सफलता में युवाओं के बजाए महिला मतदाता अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।[8] ऐसे में राजनीतिक दलों को टिकट बांटते समय महिला उम्मीदवारों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। महिला उम्मीदवारों को टिकट नहीं देने के बारे में राजनीतिक दल कहते हैं कि महिलाओं में जीतने की योग्यता कम होती है। परंतु राज्यसभा में तो विधान सभा सदस्य वोट डालते हैं फिर राजनीतिक दल महिलाओं को राज्यसभा चुनाव में क्यों नहीं खड़ा करते हैं?

महिलाओं के सशक्तीकरण तथा बराबरी की बात करने वाले दलों की असलियत टिकट वितरण के समय सामने आ जाती है। जिन्हें टिकट मिलता है, वे भी अधिकतर राजनीतिक परिवारों से आती हैं; उनके पीछे पिता या पति का हाथ होता है।[9] भारत के संसदीय लोकतंत्र में महिलाओं की स्थिति कितनी कमजोर है, इसका पता दुनियाभर की संसदों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन के अध्ययन से चलता है। रिपोर्ट के अनुसार यूरोप, अमेरिका और दुनिया के अन्य विकसित देशों की संसदों में महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या के मुकाबले हम कहीं नहीं ठहरते। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश और अफगानिस्तान भी हमसे कहीं आगे हैं। सब-सहारा के कुछ अति पिछड़े देशों की संसदों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी भारत से ज़्यादा है। विश्वभर की संसदों में महिलाओं की संख्या के आधार पर हुए सर्वे में भारत 103वें स्थान पर है, जबकि नेपाल 35वें, अफगानिस्तान 39वें, चीन 53वें, पाकिस्तान 64वें, इंग्लैंड 56वें, अमेरिका 72वें स्थान पर हैं। बांग्लादेश में हर पांच में से एक सांसद महिला है। यहां तक कि सीरिया, रवांडा, नाइजीरिया और सोमालिया आदि की संसदों में भी महिलाओं की हिस्सेदारी भारत से अधिक है।

फिलहाल भारतीय संसद के दोनों सदनों में 12 प्रतिशत महिलाएं (88) हैं। लोकसभा में 61 और राज्यसभा में 27 है। नेपाल की संसद में कुल 176 सीट हैं और वहां हर तीसरी सीट पर महिला सांसद विराजमान है। अफगानिस्तान के दोनों सदनों में कुल 28 प्रतिशत महिला (97) हैं, जबकि चीन में निचले सदन में कुल 699 सांसदों में से 24 प्रतिशत महिला है। पाकिस्तान में 84 महिलाएं सांसद हैं। इनमें से 21 प्रतिशत निचले और 17 प्रतिशत उच्च सदन में हैं। इंग्लैंड में हाउस ऑफ कॉमन्स और हाउस ऑफ लॉर्डस में यह आंकड़ा क्रमश: 23 और 24 प्रतिशत है। अमेरिका के निचले सदन में 20 प्रतिशत महिलाएं हैं, जबकि उच्च सदन में केवल 20 सांसद हैं। क्या कारण है कि स्वतंत्रता आंदोलन और आज़ादी के आरंभिक वर्षो में महिलाओं की जो महत्वपूर्ण भूमिका थी, बाद के वर्षो में उसमें प्रगति नहीं हुई? पिछले सौ-डेढ़ सौ साल का इतिहास खंगालने पर हिंदुस्तानी औरतों की बहादुरी के अनेक किस्से मिल जाते हैं। महात्मा गांधी के आह्वान पर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ हजारों महिलाएं कुरबानी देने घर से निकल आयी थीं लेकिन, आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी की बात खोखली ही नज़र आती है। हालांकि, देश के संविधान में पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन यथार्थ में वे हर मोर्चे पर गैर-बराबरी का दंश झेलती हैं।[10]

महिला आरक्षण बिल

आज़ादी के बाद पहली लोकसभा (1952) से लेकर अब तक संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढा तो है लेकिन अत्यंत धीमी गति से और यह आज भी बहुत कम है। 1952 में जहां संसद में 4.50 प्रतिशत महिलाएं थीं वहीं 2014 में यह प्रतिशत 12.15 प्रतिशत ही हो सका। 1993 में 73वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के बाद हुए 1996 के लोकसभा चुनाव में सभी प्रमुख पार्टियों ने संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को अपने चुनावी घोषणापत्रों में रखा। तत्कालीन यूनाइटेड फ्रंट की प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार ने सबसे पहले महिला आरक्षण बिल को 4 सितम्बर, 1996  को लोकसभा में पेश किया; इसे गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया, जिसने 9 दिसंबर, 1996 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी। हालांकि राजनीतिक अस्थिरता के चलते इसे 11वीं लोकसभा में दुबारा पेश नहीं किया जा सका। इसे पुनः पेश किया अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 12वीं लोकसभा में। भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इसे चार बार लोकसभा में पेश किया और हर बार हंगामे के बाद ‘सर्वसम्मति निर्मित’ करने के नाम पर इसे टाल दिया गया। कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने भी इसे दो बार संसद में पेश किया। मार्च 2010 में राज्यसभा ने इस बिल को पारित भी कर दिया लेकिन उसके बाद चार साल (15वीं लोकसभा के भंग होने तक) तक यह बिल लोकसभा में नहीं लाया जा सका। लोकसभा का कार्यकाल पूरा हो गया और बिल रद्द हों गया। जाहिर है इसके पीछे राजनीतिक दलों में राजनीतिक इच्छाशक्ति कमी ज़िम्मेदार है।[11]

महिला आरक्षण के सिलसिले में अब तक लोकसभा और विधानसभाओं में ही आरक्षण की बात की जाती है जबकि विधेयकों के पारित होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली राज्यसभा और विधानपरिषदों में महिला आरक्षण के लिए कोई पहल नहीं की जा रही है। डॉ. आम्बेडकर ने तो महिलाओं के अधिकार के लिए ‘हिन्दू कोड बिल’ पर संघर्ष करते हुए आज़ाद भारत के पहले मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया था। समानता के सिद्धांत में किन्तु–परन्तु के साथ आस्था के कारण ही शायद महिला आरक्षण बिल के मामले में महिला नेताओं और आन्दोलनकारियों ने पिछले 21 सालों में भी अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं की है और इन्हीं रास्तों से पुरुष–वर्चस्व अपने लिए मार्ग तलाश लेता है। यही कारण है कि राज्यसभा में महिला प्रतिनधित्व का विषय बिल में शामिल नहीं होता है।[12]

यह संतोषजनक है कि 16 वीं लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व, 15वीं लोकसभा के 10.86 प्रतिशत से बढकर 12.15 प्रतिशत हो गया है और पहली बार सरकार में 6 महिलायें महत्वपूर्ण मंत्रालय सम्भाल रहीं हैं फिर क्या कारण है कि नई सरकार के चार वर्ष बीत जाने के बाद भी इस बिल की सुध लेने वाला कोई नहीं है?

देश के प्रमुख राजनीतिक दल भाजपा व कांग्रेस ने पार्टी के संगठन में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव पास कर रखा है लेकिन इस नियम का ईमानदारी से पालन नहीं हो पाता। सतही तौर पर घोषणाएँ कर दी जाती हैं लेकिन यथार्थ के धरातल पर उन्हें लागू नहीं किया जाता। यह भी एक कड़वा सच है कि वे महिलाएं ही राज्य में मुख्यमंत्री बन पाई हैं, जिनकी पार्टी उनके खुद के संगठन या उनके दारोमदार पर चलती है।

लोकसभा में महिलाओं की उपस्थिति :-

भारत में लोकसभा के प्रथम चुनाव 1952 में हुए। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार लोकसभा कुल सदस्य संख्या 552 से अधिक नहीं होगी। वर्तमान में लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 545 हैं, जिसमें दो आंग्ल भारतीय मनोनीत होते हैं। लोकसभा में प्रथम निर्वाचन से आज तक के निर्वाचनों में महिला सांसदों के निर्वाचन की स्थिति निम्नानुसार रही हैं[13]

वर्ष    कुल सदस्य संख्या    महिला सदस्य संख्या  महिला सदस्यों का प्रतिशत

1952          499                                22                        4.4

1957          500                                27                        5.4

1962          503                                34                        6.8

1967          523                                31                        5.9

1971          521                                22                        4.2

1977          544                                19                        3.3

1980          544                                38                        5.2

1984          544                                44                        8.1

1989          517                                27                        5.2

1991          544                                39                        7.2

1996          543                                39                        7.2

1998          543                                43                        7.9

1999          545                                49                        8.65

2004          539                                44                        8.16

2009          545                                60                        11.0

2014          545                                65                        12.6

उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर समझा जा सकता है कि लोकसभा में महिलाओं की उपस्थिति कभी भी 12 प्रतिशत से अधिक नहीं रही है।

2017 में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में महिला भागीदारी

उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में कुल 4823 उम्मीदवार खड़े हुए लेकिन उनमें महिलाओं की संख्या 445 थी मतलब सिर्फ 9 प्रतिशत थी। उत्तर प्रदेश में सिर्फ 41 महिलाएं चुनी गयीं जो 403 सीटों की विधानसभा का 10 प्रतिशत है। और 2012 के विधासभा चुनाव में 36 महिलाओं को चुना गया था। ये सिर्फ उत्तर प्रदेश के पिछड़ेपन के कारण नहीं है बल्कि ऐसा पंजाब में भी है। पंजाब में 1145 में से सिर्फ 81 यानी 7 प्रतिशत महिला उम्मदीवार थीं। और पंजाब में सिर्फ 6 महिलायें ही चुनी गयीं जो 117 सीटों की विधानसभा का मात्र 5 प्रतिशत है। 2012 में 93 उम्मीदवारों में से 14 महिलाएं ही चुनी गयीं थी जो कुल उम्मीदवारों का सिर्फ 15 प्रतिशत था। इस वर्ष विधानसभा चुनाव में पिछले वर्ष की तुलना में 7.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यह मुद्दा शिक्षा का भी नहीं है, गोवा इन सब राज्यों से शिक्षित है वहां 251 में से सिर्फ 18 यानी 7 प्रतिशत महिलाएं चुनाव में उतरीं थीं और गोवा में मात्र 2 महिलाएं ही चुनी जा सकीं। अर्थात् 40 सीटों की विधानसभा में सिर्फ 5 प्रतिशत महिलाएं ही विधायक होंगी परन्तु 2012 में 10 उम्मीदवारों में से सिर्फ 1 महिला ही चुनी गई थी।[14] इससे ज़्यादा हैरानी की बात यह है कि राजनीतिक आन्दोलनों में महिलाओं की भागीदारी के लिए प्रसिद्ध उत्तराखंड में भी स्थिति भिन्न नहीं है; वहां 637 में से 56 यानी 9 प्रतिशत से कम उम्मीदवार थीं और सिर्फ 5 महिलाएं ही चुनी गईं, जो 70 सीटों की विधानसभा का मात्र 7.1 प्रतिशत है परन्तु 2012 में 63 उम्मीदवारों में से सिर्फ 5 महिलाएं ही चुनी गईं थी।[15]

इसी तरह मणिपुर की स्थिति भी भिन्न नहीं है। मणिपुर में महिलाओं की चलने वाली मणिपुरी समाज की स्थिति इस सन्दर्भ में सबसे बुरी थी। वहां की महिलाएं सम्पत्ति की मालिक है, बाजार चलाती हैं, आंदोलनरत रहीं हैं लेकिन चुनावी मैदान में 265 में से 11 यानी सिर्फ 4 प्रतिशत महिलाओं ने चुनाव लड़ा और इरोम शर्मिला 100 वोट तक प्राप्त करने में असफल रहीं, उन्हें मात्र 90 वोट मिले। और यहाँ सिर्फ 2 महिलाएं ही चुनी जा सकीं। 60 सीटों की विधानसभा में 3 प्रतिशत महिलाएं ही विधायक होंगी। न मायावती के नेतृत्व से उत्तर प्रदेश में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, न ही इरोम शर्मीला के चुनाव लड़ने से मणिपुर में कोई असर पड़ा। राजनीति में महिलाओं की अनुपस्थिति का मामला सिर्फ 5 राज्यों या उम्मीदवारी तक सीमित नहीं है बल्कि सभी राज्यों में उम्मीदवारों का अनुपात कमोबेश ऐसा ही है। उम्मीदवारों में महिलाओं की कमी अंततः चुने हुए सांसदों में भी दिखाई देती है। अतः महिला उम्मीदवार पुरुषों की तुलना में चुनावों में कुछ ज़्यादा सफल होती हैं इसलिए विधानसभा और लोकसभा में उनकी उपस्थिति दो सूत अधिक रहती है।[16]

वर्तमान समय में भारत में महिलाओं के राजनीतिक विकास में अनेक बाधायें हैं। महिलाओं में संकोच, महिलाओं की आर्थिक पराधीनता, महिलाओं में असुरक्षा का भय, राजनीतिक दलों में सत्ता प्राप्ति की प्रवृत्ति, खर्चीली चुनाव प्रणाली राजनीतिक विकास में बाधायें हैं। महिलाओं की बाधाओं को दूर कर उन्हें राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। किसी भी देश की वांछित प्रगति के लिए उस देश की महिलाओं की भागीदारी आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। अब इसका एकमात्र उपाय ‘महिला आरक्षण विधेयक’ है! संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला विधेयक लंबे समय से लटका पड़ा है। यदि यह कानून लागू हो जाये, तो लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या स्वत: 179 (33 प्रतिशत) हो जायेगी। इस विधेयक की राह में वर्षों से अनेक बाधाएं पैदा की जा रहीं हैं। गौरतलब है कि पिछले 63 वर्षों में हमारी संसद में महिला सांसदों की संख्या मात्र 61 बढ़ी है। यदि वृद्धि की रफ्तार यही रही, तो 179 के आंकड़े को छूने में लगभग 250 वर्ष लग जायेंगे और तब तक हम अन्य देशों से बहुत पिछड़ जायेंगे।

इस समय देश भर की विधानसभाओं में महिला विधयाकों की संख्या लगभग 9 प्रतिशत है और लोक सभा में 12 प्रतिशत महिला सांसद हैं तस्वीर में थोडा-सा सुधार हुआ है लेकिन कुल मिलाकर परिस्थिति में कोई खास परिवर्तन नही हुआ है। लेकिन 20 सालों से पंचायत और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण का जितना असर विधानसभाओं में दिखना चाहिए था उतना नहीं हुआ है। नीचे से महिला नेतृत्व तैयार हो रहा है। चुनाव में महिलाएं अब पुरुषों के बराबर ही वोट डाल रहीं हैं लेकिन सभी पार्टियों पर पुरुषों का वर्चस्व है वास्तविक समस्या यह है कि राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट देने के लिए तैयार नहीं हैं। वास्तव में महिलाओं की आवाज़ इन आंकड़ों में बहुत कमज़ोर है। महिला उम्मीदवारों, विधायकों और सांसदों में एक बड़ी संख्या उन बहू-बेटियों की है जो राजनीतिक घरानों से सम्बन्ध रखती हैं, जिनका कोई स्वतंत्र वजूद नहीं है। किसी न किसी मजबूरी के कारण वह घराना परिवार पुरुष के बजाय स्त्री को चुनाव में खड़ा करता है, परन्तु वह अपने पुरुषों के हिसाब से काम करती हैं। इन महिला प्रतिनिधियों का महिलाओं के मुद्दों या महिला आदोलनों से कोई वास्ता नहीं होता। वैसे भी महिला सांसदों और विधायकों को मंत्रिमंडल में सिर्फ नाम मात्र स्थान मिलता है। महिलाएं, महिला कल्याण और बाल कल्याण विभाग की मंत्री तो बन जाती है परन्तु गृह मंत्रालय वित्त मंत्रालय जैसे शक्तिशाली मंत्रालय उनकी पहुँच से बहर रहते हैं।

हमारी संसद और विधानसभा में महिलाओं की आवाज़ दबी रहने का असर सिर्फ महिलाओं पर ही नहीं, हमारे पूरे लोकतंत्र पर पड़ता है। ज्यादा महिलाओं के चुने जाने भर से हमारी संसद और विधानसभा एकदम शालीन हो जायें लेकिन उनकी उपस्थिति भर से कुछ असर अवश्य ही पड़ेगा। अगर सांसद और विधायक महिला हो तो आए दिन महिलाओं के खिलाफ हिंसा, यौन प्रताड़ना के मामलों में पुलिस और प्रशासन पर दबाव अवश्य पड़ता है। कम से कम सत्ता के गलियारों में स्थापित पुरुष मानसिकता का वर्चस्व घटेगा। जहाँ पर्याप्त संख्या में महिलाएं होंगी वहां राशन और पानी की कमी या शराब की बढ़ोतरी जैसे मुद्दों पर चर्चा अवश्य होगी और कुछ नहीं तो साधारण औरत में हिम्मत बढ़ेगी की वह सांसद, विधायक, अफसर के यहां अपनी बात पहुंचा सकें। परन्तु असली सवाल यह है कि संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या कैसे बढ़े। जाहिर है इसके लिए राजनीति का ढांचा बदलना होगा, नेताओं का संस्कार और पार्टियां की संस्कृति बदलनी होगी। परन्तु दुनिया भर का अनुभव का बताता है कि इतने भर से काम नहीं चलता। महिलाओं की उपस्थित बढ़ाने के लिए क़ानूनी मजबूरी का सहारा लेना पड़ता है।

हमारे भारतीय समाज में महिलाओं को देवी का रूप माना  जाता हैं[17] परन्तु यह हमारे समाज की विडंबना ही है कि महिलाओं का ही सबसे ज्यादा शोषण होता है। प्रत्येक वर्ष जब बोर्ड परीक्षा का परिणाम आता है तो सबसे ज्यादा  अच्छे अंकों से और सबसे अधिक उत्तीर्ण होने वाली छात्राएं ही होती हैं परन्तु उच्च शिक्षा तक आते-आते महिलाओं का प्रतिनिधित्व नाम मात्र का होता है जिससे स्पष्ट होता है कि महिलाओं को आगे नहीं बढ़ने दिया जाता और उनको समान अवसर प्राप्त नहीं है। वर्तमान में कुछ शीर्ष पदों पर हम महिलाओं को देख कर खुश हो जाते हैं कि महिलाओं का सशक्तिकरण हो रहा है परन्तु प्रश्न यह उठता है कि क्या यह महिलायें समाज के अधीनस्थ वर्ग से सम्बन्ध रखती हैं? क्या यह महिलायें सभी महिलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं? इसका उत्तर है नहीं! क्योंकि जो भी महिलायें शीर्ष पदों पर आसीन हैं वह पारिवारिक रूप से संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखती हैं जिनका साधारण जीवन से और ज़मीनी हकीकत से कोई सरोकार नहीं है। महिला जनसंख्या का बड़ा भाग अब भी समाज की मुख्य धारा से वंचित है यहाँ तक की कुछ महिलाओं को तो महिला सशक्तिकरण का अर्थ ही नहीं ही पता है।

दरअसल महिलायें वर्षों से जुर्म और शोषण का शिकार हो रही हैं जिस कारण महिलाओं ने इसे स्वीकार कर लिया है। समाज में जब किसी भी प्रथा, शोषण और अत्याचार को सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है तो उसे सामाजिक वैधता प्राप्त हो जाती है। इसी प्रकार जिस समाज में महिला रह रही हैं उन्हें यह ही नहीं पता की उनका शोषण हो रहा है और वह आज भी मानसिक रूप से गुलाम हैं। महिलाओं का सशक्तिकरण करने के लिए आवश्यकता इस बात है कि पहले महिलाओं को यह एहसास दिलाना होगा की उनका शोषण हो रहा है और वह आज भी मानसिक रूप से गुलाम हैं और उन्हें ही अपने सशक्तिकरण के लिए खुद संघर्ष करना है और समाज की मुख्य धारा में शामिल होना है। हमारे समाज में एक वाक्य बहुत ज्यादा प्रचलित है कि “कोई भी परिवर्तन होने में समय लगता है।” परन्तु परिवर्तन की शुरुआत तो कहीं से होनी ही चाहिए और इस परिवर्तन की पहल हमे खुद अपने घर से करनी होगी तभी समाज में परिवर्तन होगा और समाज के विकास में महिला भागीदारी बढ़ेगी तभी महिला सशक्तिकरण के साथ-साथ भारत का भी सशक्तिकरण होगा!

 

सन्दर्भ सूची :-

[1]चन्देल,डॉ. धर्मवीर, “भारतीय महिला की राजनीतिक स्थिति का अध्ययन” 2 May, 2012, http://journalistdharamveer.blogspot.com/2012/05/blog-post.html

[2]कुमार, राधा, स्त्री संघर्ष का इतिहास (नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, 2011) पृष्ठ, 202-238

[3]नारंग, ए. एस., भारतीय शासन एवं राजनीति (नई दिल्ली : गीतान्जली पब्लिशिंग हाउस,2009) पृष्ठ, 386

[4]मिश्रा, प्रशांत, भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी, http://m.dailyhunt.in/news/india/hindi/poorvanchal+media-epaper-pmedia/bharatiy+rajaniti+me+mahilao+ki+bhagidari-newsid-56223457

[5]चन्दन, संजीव, “महिला आरक्षण : मार्ग और मुशकिलें” स्त्रीकाल (स्त्री का समय और सच), http://www.streekaal.com/2016/01/blog-post_5.html?m=1

[6]वर्मा, सुषमा, “संसद में महिलाओं की भागीदारी” प्रभात खबर, 22 मार्च, 2015, http://www.prabhatkhabar.com/news/columns/story/361546.html

[7]जोशी, गोपा, भारत में स्त्री असमानता  (दिल्ली विश्वविद्यालय : हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशाल्य, 2011) पृष्ठ, 149-179

[8]यादव, राजेंद्र एवं अन्य (सं.), पितृसत्ता के नए रूप, स्त्री और भूमंडलीकरण (नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, 2009) पृष्ठ, 199

[9]Deshpande, Rajshveri, “How Gendred was Women’s participation in Election 2004?”, epw, Vol. 39. No. 51 (Dec. 18-24, 2004), page no. 5431-5436, http:// www.jstore.org/stable/4415927

[10]राय, प्रवीन, “क्यों महिलाएं निर्णायक भूमिका में नहीं ?” 31 मई, 2014, http://www.bbc.com/hindi/india/2014/05/140528_women_participation_india_election_rd

[11]यादव, योगेन्द्र, “संसद और विधानसभा में महिलाओं की संख्या कैसे बढ़े” नवोदय टाइम्स, नई दिल्ली , 9 मार्च, 2017

[12]कुमार, राधा, स्त्री संघर्ष का इतिहास (नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, 2011) पृष्ठ, 239

[13]चन्देल,डॉ. धर्मवीर,भारतीय महिला की राजनीतिक स्थिति का अध्ययन” 2 May, 2012, http://journalistdharamveer.blogspot.com/2012/05/blog-post.html

[14]sharda, Shailvee “40 Women win to create record” TOI, 13 march, 2017, http://m.timesofindia.com/elections/assembly-elections/uttar-pradesh/news/40-women-win-to-create-record/articleshow/57614972.cms

[15]यादव, योगेन्द्र, “संसद और विधानसभा में महिलाओं की संख्या कैसे बढ़े” नवोदय टाइम्स, नई दिल्ली , 9 मार्च, 2017

[16]Verma, Tarishi, “Assembly election Result 2017: How did Women Candidate of all states fare” Indian Express, New Delhi, 12 March, 2017, http://indianexpress.com/elections/assembly-election-results-2017-how-did-women-candidates-of-all-states-fare-4566702/

[17]यादव, राजेंद्र एवं अन्य (सं.), पितृसत्ता के नए रूप, स्त्री और भूमंडलीकरण (नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, 2009) पृष्ठ, 62

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