बलात्कार | कैलाश चन्द्र ‘माही’

0
116

खुलेपन में पली बढ़ी वो, घरवालों ने पाली थी
खुला रखती गात सदा जो, रूपरंग की काली थी,

न थे कपड़े छोटे उनके, न लटकन वाली बाली थी
न थे कपड़े कसे हुए और न होठों पर लाली थी,

नखरें जो न करती थीं, वो मन की मतवाली थी
रहती थी वो मस्त सदा, जो फिक्र कभी न करती थी,

तुनक-तुनक कर चलती थी वो, फैशन से जो डरती थी
ढक कर तन को बालों से वो, अपनी लाज बचाती थी,

अपनी लाज बचाती थी वो, अपनी लाज गँवा बैठी
हवस के गद्दारों  से वो, अपनी जान गँवा बैठी,

अपनी जान गँवा बैठी, यह समय चाल की चकरी थी
न थी कोई नखराली छोरी वो, ब्यांवतार एक बकरी थी!!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here