Wednesday, December 12, 2018

अभिव्यक्ति के अधिकार का दमन क्यों? | सुबोध ठाकुर

भारत एक विविधतापूर्ण देश है जहाँ पर विभिन्न वर्ण, जाति, धर्म के लोग निवास करते हैं। भारतीय समाज की विशेषताओं पर दृष्टि डालें तो...

वर्तमान परिदृश्य में युवाओं की ग्रामीण विकास में सक्रिय भूमिका |  सिम्मी चौहान

‘युवा’ समाज का वह हिस्सा है, जिसके द्वारा किसी देश का भविष्य निर्मित होता है। उसकी उम्र के साथ-साथ उसकी आँखों में बड़े-बड़े सपनों...

भीष्म साहनी: मानवीय संवेदना के सशक्त हस्ताक्षर | आशीष कुमार

भीष्म साहनी(8 अगस्त,1915 से 11 जुलाई,2003) जिन्हें हिंदी साहित्य में प्रेमचन्द की परंपरा का अग्रणी लेखक माना गया है। उनका जन्म रावलपिंडी(उस समय के...

उत्त्तर आधुनिकता के दौर में भी असुरक्षित स्त्रियाँ | अमित कुमार झा

भारतीय समाज अपने सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया को अनवरत जारी रखते हुये आज एक उत्कृष्ट समाज की कल्पना करते हुये उत्तरआधुनिकता की बात करने लगा...

नींव के पत्थर | वेदप्रकाश लाम्बा

जब-जब सावन आया होगा तेरे नयनों से शरमाया होगा दे दे अपना कंत सखी सर्द हवाओं ने कहलाया होगा मंदिर से उठ गए जब देवता पत्थर से मन बहलाया...

भीतर का सन्नाटा | रंगनाथ द्विवेदी

एक कमरे में अब पति पत्नी कहां होते है? बिस्तर तो वही है, पर एैसा लगता है जैसे अब उसपर दो अज़नबी सोते हैं। टटोलना मुमकिन नहीं भीतर का...

डॉ. अन्जु की दो कविताएं

‘बेटी’ आज एक खेत में, श्रमरत मां-बेटी को देख लगा व्यर्थ है यह कहना कि बेटी बोझ है। बेटी तो नन्हें कन्धों पर उठा मेहनत का फावड़ा, और...

नीना छिब्बर की कविताएं

‘जीवन वासी’  कोई जलजला, भूकंप, तूफान, अंधड़ अकाल नहीं पड़ा, पर; जीवन के अंतिम पड़ाव पर नीली नसों वाले हाथों में पीली पड़ी हथेलियों से फिर से थाम ली बुहारी...

फूलों की खेती | चन्द्र मोहन किस्कु  

दुनिया में अब बढ़ गई  है हिंसा, लोग मिलते ही लड़ते हैं झगड़ते हैं और हत्या के लिए हथियार हाथ में लेते है। दुनिया में अब बढ़ रही है बम और हथियारों...

चेतना की दो कविताएं

‘औरत’ एक औरत की पीड़ा सुन कर झर-झर आँखों से आँसू गिरे, समझ तो कोई व्यक्ति सका नहीं, उँगलियाँ उठाने में सबसे आगे रहे औरत - औरत की दुश्मन...

हाल ही की लोकप्रिय रचनाएँ

ध्रुवस्वामिनी में स्त्री-चिंतन |अनुराधा

भारत में पितृसत्तात्मक समाज है। इस पितृसत्तात्मक समाज में धर्म, वर्ग, जाति और वर्ण के आधार पर स्त्री को दोयम दर्जे का प्राणी माना...

आरंभ ई पत्रिका 14वां अंक (अनुक्रमणिका)

संपादकीय प्रसंग (संपादकीय) | शैलेंद्र कुमार सिंह  शोधालेख प्रसाद की दृष्टि में नारी का स्वरूप | डॉ॰ वसुन्धरा उपाध्याय गुलज़ार की कहानियों में भारत विभाजन की त्रासदी :...

प्रसाद की दृष्टि में नारी का स्वरूप | डॉ॰ वसुन्धरा उपाध्याय

जयंशकर प्रसाद आधुनिक हिन्दी साहित्य के अग्रण्य कलाकार हैं। उनकी सर्वतोन्मुखी कविता का उन्मेष कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, आलेाचना आदि सभी साहित्यिक रूपों में...

प्रसंग (संपादकीय) | शैलेंद्र कुमार सिंह

“निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले नज़र...

वर्तमान परिदृश्य में युवाओं की ग्रामीण विकास में सक्रिय भूमिका |  सिम्मी चौहान

‘युवा’ समाज का वह हिस्सा है, जिसके द्वारा किसी देश का भविष्य निर्मित होता है। उसकी उम्र के साथ-साथ उसकी आँखों में बड़े-बड़े सपनों...