Wednesday, December 12, 2018

अपने सच में झूठ की मिक्दार थोड़ी कम रही

अपने सच में झूठ की मिक्दार थोड़ी कम रही, कितनी कोशिश की, मगर, हर बार थोड़ी कम रही । कुछ अना भी बिकने को तैयार थोड़ी...

ज़ुबां ख़ामोश है डर बोलते हैं

ज़ुबां ख़ामोश है डर बोलते हैं अब इस बस्ती में ख़ंजर बोलते हैं, मेरी परवाज़ की सारी कहानी मेरे टूटे हुए पर बोलते हैं, सराये है जिसे नादां...

छायावाद का पुनर्मूल्यांकन और मुक्तिबोध

हिंदी-साहित्य के इतिहास में छायावाद की चर्चा शुरू से ही अपने चरम पर थी। इसके दो मुख्य कारण हो सकते हैं। पहला- छायावाद का...

कुच्ची का कानून

राजकमल पेपरबैक्स से प्रकाशित शिवमूर्ति जी द्वारा लिखित कहानी संग्रह ‘कुच्ची का कानून’ स्त्री विमर्श की मिसाल है। सच्चा स्त्री विमर्श यदि कहीं...

कब्र का अजाब

'नहीं, मदरसे में रूही नहीं जायेगी । 'पर क्यों अम्मी?' 'कहा ना अब वो नहीं जायेगी मदरसे में बस।।' 'तो क्या रूही आपा अपना कुरआन पूरा...

हाल ही की लोकप्रिय रचनाएँ

ध्रुवस्वामिनी में स्त्री-चिंतन |अनुराधा

भारत में पितृसत्तात्मक समाज है। इस पितृसत्तात्मक समाज में धर्म, वर्ग, जाति और वर्ण के आधार पर स्त्री को दोयम दर्जे का प्राणी माना...

आरंभ ई पत्रिका 14वां अंक (अनुक्रमणिका)

संपादकीय प्रसंग (संपादकीय) | शैलेंद्र कुमार सिंह  शोधालेख प्रसाद की दृष्टि में नारी का स्वरूप | डॉ॰ वसुन्धरा उपाध्याय गुलज़ार की कहानियों में भारत विभाजन की त्रासदी :...

प्रसाद की दृष्टि में नारी का स्वरूप | डॉ॰ वसुन्धरा उपाध्याय

जयंशकर प्रसाद आधुनिक हिन्दी साहित्य के अग्रण्य कलाकार हैं। उनकी सर्वतोन्मुखी कविता का उन्मेष कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, आलेाचना आदि सभी साहित्यिक रूपों में...

प्रसंग (संपादकीय) | शैलेंद्र कुमार सिंह

“निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले नज़र...

वर्तमान परिदृश्य में युवाओं की ग्रामीण विकास में सक्रिय भूमिका |  सिम्मी चौहान

‘युवा’ समाज का वह हिस्सा है, जिसके द्वारा किसी देश का भविष्य निर्मित होता है। उसकी उम्र के साथ-साथ उसकी आँखों में बड़े-बड़े सपनों...