Wednesday, December 12, 2018

‘आरंभ’ : विश्वविद्यालय के प्रांगण से विश्वभर के हिंदी पाठकों तक

तमाम सवालों, उलझनों के साथ विचार की लम्बी प्रक्रिया से होते हुए आरंभ का पहला अंक 18 जुलाई 2014 को आया। यह अंक पहली...

जनता का नाटक: कथ्य और कला के मुद्दे | डॉ. प्रज्ञा

भरतमुनि ने ‘पंचम वेद’ की अवधारणा को ‘नाट्यशास्त्र’ के माध्यम से रखा था - एक ऐसा वेद जिसका दायरा और व्याप्ति पढ़े-लिखे अभिजन तक...

रचना और फिल्म का अंतर्संबंध (‘तीसरी कसम’ के संदर्भ में) | अभिषेक भारद्वाज

  “28 सितम्बर 1895 में लुमियर बन्धु अपनी उस नई मशीन को दुनिया के सामने लाये थे, जो चलती हुई तस्वीर दिखाती थी| ज़ाहिर था...

रंगकर्मी मलयश्री हाशमी से साक्षात्कार

(वर्तमान में ‘नुक्कड़ नाटक के बदलते परिप्रेक्ष्य’के संदर्भ मे रंगकर्मी मलयश्री हाशमी के साथ शोधार्थी मोनिका नांदल की बातचीत)  मोनिका: जनम का नाम लेते...

मुश्किल दौर है तो हौसला रख,पत्थरों पर भी घास उगा करती है….

(सागर सैनी जी जितने उम्दा कलाकार हैं, उतने ही बेहतरीन इंसान हैं। अभिनय के साथ-साथ लेखन के क्षेत्र में भी सागर जी अच्छी दखल...

एक नयी दुनिया के सपनों का नाम ‘प्रोस्तोर’ | वंदना गुप्ता     

‘प्रोस्तोर’ एक लघु उपन्यास एम. एम. चन्द्रा जी द्वारा लिखा डायमंड बुक्स से प्रकाशित है। आज बड़े-बड़े उपन्यास लिखे जाने के दौर में लघु...

धुंध | तनूजा दत्ता

सुबह की चाय लेकर मैं बालकनी में आई चारों तरफ धुंध ही धुंध, हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। बाहर बैठे-बैठे बहुत देर...

गुज़रे ज़माने | अर्विना गहलोत

~ "दादी! ओ दादी, जल्दी दरवाजा खोलो। " ~ "अरी बेसबरी, गठिया की मारी दादी को क्यों दौड़ा रही है?" ~ "बात ही कुछ ऐसी है…!" ~...

हिंदी दलित साहित्य का माइल स्टोन : डॉ.एन. सिंह और उनकी रचनाधर्मिता | डॉ...

दलित शब्द सुनते ही कई शब्द हमारे मन में तेजी से दौड़ लगाना शुरू कर देते है, जैसे- शुद्र, अन्त्यज, हरिजन, अस्पृश्य आदि। गांधीजी...

स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के आइने में स्वयं प्रकाश की कहानियाँ | बीरज पाण्डेय

शोध छात्र स्वयं प्रकाश यथार्थ के लेखक है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ हमें ‘स्पेस’ में ले जाकर कल्पना लोक की सैर नहीं कराती...

हाल ही की लोकप्रिय रचनाएँ

ध्रुवस्वामिनी में स्त्री-चिंतन |अनुराधा

भारत में पितृसत्तात्मक समाज है। इस पितृसत्तात्मक समाज में धर्म, वर्ग, जाति और वर्ण के आधार पर स्त्री को दोयम दर्जे का प्राणी माना...

आरंभ ई पत्रिका 14वां अंक (अनुक्रमणिका)

संपादकीय प्रसंग (संपादकीय) | शैलेंद्र कुमार सिंह  शोधालेख प्रसाद की दृष्टि में नारी का स्वरूप | डॉ॰ वसुन्धरा उपाध्याय गुलज़ार की कहानियों में भारत विभाजन की त्रासदी :...

प्रसाद की दृष्टि में नारी का स्वरूप | डॉ॰ वसुन्धरा उपाध्याय

जयंशकर प्रसाद आधुनिक हिन्दी साहित्य के अग्रण्य कलाकार हैं। उनकी सर्वतोन्मुखी कविता का उन्मेष कविता, कहानी, उपन्यास, निबन्ध, आलेाचना आदि सभी साहित्यिक रूपों में...

प्रसंग (संपादकीय) | शैलेंद्र कुमार सिंह

“निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले नज़र...

वर्तमान परिदृश्य में युवाओं की ग्रामीण विकास में सक्रिय भूमिका |  सिम्मी चौहान

‘युवा’ समाज का वह हिस्सा है, जिसके द्वारा किसी देश का भविष्य निर्मित होता है। उसकी उम्र के साथ-साथ उसकी आँखों में बड़े-बड़े सपनों...