देवदासी: धर्म के धुरी में स्त्री | अमित कुमार झा

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मानव समाज आज  विकास की अनवरत  यात्रा को  जारी रखते  हुए आदिम अवस्था से  उत्तराधुनिक अवस्था में आ पहुँचा है। इस उत्तर आधुनिक अवस्था में आधुनिकता से भी बेहतर अवस्था की कल्पना की गयी है, जहाँ  विज्ञानवाद, तर्कवाद  का बोलबाला  रहेगा।  फिर भी आज इस उत्तराधुनिकता  के दौर में  भारतीय  जनसमुदाय  के बीच धर्म आज भी लोगों को अंधकार में धकेलने का कारगर कारण बना हुआ है। धर्म के नाम पर आज भी अत्याधिक शोषण  समाज में स्त्री का ही हुआ है। देवदासी प्रथा भी एक ऐसी ही प्रथा है जो भारत में सैकड़ों वर्षों से स्त्री का शोषण कर रहा है। भारत जैसे सांस्कृतिक सम्बृद्ध समाज में महिलाओं को पूज्या एवं आदरणीय माना है, उन्हें सम्मना की नज़र से देखा गया है। परन्तु उसी समाज में स्त्री को एक वास्तु मानकर मंदिरों में अर्पित भी किया गया है।

देवदासियों के विभिन्न नाम  –  भारत में सांस्कृतिक एवं  भौगोलिक  विविधताओं  के कारण देवदासी को कई नामों से जाना जाता है; जैसे तावतासी, तेवारतियार, पतियालर, तलिकिसरी पेंडुकल, तेवनार मकल, कोट्टिकल , अतिकलमार, मणिककटर, काणिकैयार [[1]],  एम्परुमनतियार  और कोयिल पिनक्कल  में कई नामों  से दर्शाया  गया था। [[2]] तमिलनाडु  में  तेविडीची, नंगौरमार [[3]] कुदिकारी, मुरिक्कारी , कुट्टाची , कुथिची  और  अटककारी।[[4]]  कर्णाटक में  सुलेर या सुले , पोटी। केरल में बसवी  और  जोगती। आंध्र  प्रदेश  में  सनिस  और भोगम।[[5] ] असम में कुरमपस  और  कुदिपस। कोंकणी में भाविन और कलावंत।[[6]]

देवदासी  यानि सर्वेंट ऑफ़ गॉड।[[7]] देवदासी  बनने का  मतलब  होता था,  भगवान या देव  की शरण  में चले जाना। उन्हें  भगवान की पत्नी  समझा जाता  था। इसके बाद वे किसी  जीवित  इंसान  से शादी  नहीं कर सकती  थी।

देवदासी  प्रथा  एक उत्सव –   देवदासी  प्रथा  का मुख्य  केंद्र  कर्णाटक  राज्य  के सौंदती  बेलगांव  कस्बे  में  एक  पहाड़ी  पर स्थित यलम्मा  देवी  का मंदिर  है।  प्रति वर्ष  माघ  माह की पूर्णिमा  को इस  मंदिर में विराट  मेला लगता है इस  मेले में प्रति वर्ष ४-५ हजार  अबोध  बालिकाओं  को देवी को समर्पित कर देवदासी  बनाया जाता है।  ध्यान देने वाली  बात यह  कि  अपनी पुत्रियों  को देवी  यलम्मा  कि चरणों  में समर्पित कर देवदासी  बनाने का मुख्य कारण  मनौती (मंन्नत )  का पूरा हो जाना होता है। मन्नत  पूरा  हो जाने पर  कन्या  को माता -पिता  को देवदासी  बना देते  थे। [[8]]

देवदासी  प्रथा का  इतिहास – देवदासी  शब्द  प्रथम  प्रयोग  कौटिल्य  के अर्थशास्त्र  में मिलता है। डॉ  अल्तेकर ने देवदासी  प्रथा का  प्रारंभ  तीसरी  ई  शती  में माना है। कालिदास  ने मेघदूत  में  उज्जैन  कि महा काल  मंदिर  में देवदासियों  का उल्लेख  किया है। मत्स्य पुराण एवं  विष्णु पुराणों  में  भी  देवदासियों का उल्लेख  मिलता है। जब इस  प्रथा का चलन बहुत बढ़  गया तब अभिलेखों  में  इसका वर्णन  किया  जाने लगा। वर्मलाट के बसंतगढ़  अभिलेख (६२४ ईस्वी )  में श्रीमाता  मंदिर की देवदासी  का  उल्लेख  है। मंदिरों  में एक से अधिक  देवदासियां  भी रखी जाती थीं, इनकी  संख्या  कभी – कभी सौ  के उपर भी हो जाया करती थी। जिसका परिणाम  विजय सेन  की देवपारा  प्रशस्ति  है।   ह्वेनसांग  ने  मुल्तान  के सूर्य  मंदिर के देवदासियों  का वर्णन  किया है। राजस्थान  के हर्षनाथ  मंदिर  में  अनेक देवदासियां थीं। सौराष्ट्र  के सोमनाथ  मंदिर  में ५०० देवदासियां थीं।  जो अपने नृत्य  द्वारा   देवताओं  को प्रसन्न  करने  के लिये सदैव  तत्पर  रहती  थीं।[[9]]  नृत्य का सम्बन्ध  धर्म  से जुड़ा था  उसे  देवताओं  को प्रसन्न  करने का  साधन  माना जाता था। इसलिये  मंदिरों  में देवदासी  रखने की प्रथा थी।  मुग़लकाल में  जब राजाओं  ने  यह  महसूस  किया कि इतनी संख्यां  में  देवदासियों  का  पालन – पोषण  करना उसके  वश में नहीं है, तो  देवदासियां  सार्वजनिक  संम्पति  बन गईं।

प्रसिद्ध इतिहासकार विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े के महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास’, देवराज चानना की पुस्तक ‘स्लेवरी इन एंशियंट इंडिया’, एस.एन. सिन्हा और एन.के. बसु की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ प्रॉस्टीट्यूशन इन इंडिया’, एफ.ए. मार्गलीन की पुस्तक ‘वाइव्ज़ ऑफ द किंग गॉड, रिचुअल्स ऑफ देवदासी’, मोतीचंद्रा की ‘स्टडीज इन द कल्ट ऑफ मदर गॉडेस इन एंशियंट इंडिया’, बी.डी. सात्सोकर की ‘हिस्ट्री ऑफ देवदासी सिस्टम’ में यह कुप्रथा विस्तृत रूप से वर्णित है। जेम्स जे. फ्रेजर के ग्रंथ ‘द गोल्डन बो’ में भी इस प्रथा का विस्तृत ऐतिहासिक विश्लेषण मिलता है। प्रोफेसर यदुनाथ सरकार ने भी अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ औरंगजेब’ के दूसरे भाग में देवदासी प्रथा पर विश्लेषण प्रस्तुत किया है।

देवदासियों के प्रकार  देवदासियों  का मुख्य  कार्य था  मंदिर की साफ – सफाई  उसका रख रखाव  दीप  प्रज्वलन, पवित्र  ढंग से रहते हुये  मंदिर  के सभी  आवश्यक  कार्यों  का निष्पादन  करना। प्राचीन  हिन्दू  वैदिक  शास्त्रों   के  अनुसार  इन्हें  ७ वर्ग  में विभाजित  किया गया है –

  1. दत्ता – जो मंदिर में भक्ति हेतु  स्वतः  अर्पित  हो जाती थी। इन्हें  देवी का दर्जा  दिया जाता था और इन्हे  मंदिर  के  सभी   मुख्य  कर्म करने  की अनुमति  होती  थी।
  2. विक्रीता – जो  खुद को सेवा  के लिए  मंदिर  प्रशासन  को बेच  देती थीं, इन्हे सेवा  के लिए  लाया  जाता था अत इनका  काम  साफ – सफाई  आदि का होता था। ये पूजनीय  नहीं होती थीं। ये बस मंदिर की श्रमिक  होती थीं।
  3. भृत्या – जो खुद  के परिवार  के भरण – पोषण  के मंदिर  में  दासी का कार्य  करती थीं। इनका  नृत्य  आदि  करके अपना पालन  – पोषण  करना होता है।
  4. भक्ता- जो सेवा भाव में पारिवारिक  जिम्मेदारियों  का निर्वहन  करते हुए भी मंदिर में देवदासी  का कार्य  करती  थीं। ये मंदिर की समस्त  कार्यों  को करने  लिए  होती थीं।
  5. हृता- जिनका दूसरे राज्यों  से हरण  करके  मंदिर  को दान  कर  दिया  जाता  था। इनको  मंदिर  प्रशासन  अपनी  सुविधा  अनुसार  कर्म कराता था। इनकी गणना  तो देवदासियों  में होती  थी  वास्तव  में ये  गुलाम  थीं।
  6. अलंकार – राजा और प्रभावशाली  लोग  जिन  कन्याओं  को इसके  योग्य समझते  थे, उसे मंदिर  प्रशासन  को देवदासी  बनाकर  देते थे। उन  राजाओं  और  प्रभावशाली  व्यक्तियों  का मंदिर  को दिया  गया उपहार  होती  थीं।
  7. नागरी – ये मुख्यतया विधवाओं, वेश्याओं और दोषी होते  थे  जो  बस मंदिर  के शरण  में आ जाते  थे।

मुख्यत: दत्ता , भक्ता और अलंकार ही मंदिर की देवदासियाँ होती थीं, जबकि नागरी, हृता, बिक्रीता  और भृत्या  अपने  स्वार्थ  के लिए  मंदिर  से जुड़ती थीं और जहाँ  मुख्य  देवदासियों  को समाज  एवं  मंदिर  में आने  वाले  दर्शनार्थी  श्रध्दा  और भक्ति  की दृष्टि  से देखते थे  वही  अन्य  चारों  को हेय  की दृष्टि  से देखा  जाता था।

देवदासियों  की समस्याऐं देवदासी  प्रथा  जब अपने  प्रारम्भिक  दौर में था उस समय  देवदासी   ऊंची  जाती  की पढ़ी लिखी  विदुषी   महिला  होती थीं। जो वास्तविक  रूप से अपना जीवन  ईश्वर  की सेवा में समर्पित  करती थीं। मंदिरों में पुजारी  भी उसे  श्रद्धा  की दृष्टि  से देखते थे। समाज  भी उन्हें  यथोचित  सम्मान  देता था। परन्तु बीतते  समय के साथ  यह प्रथा  भी  अपने वीभत्स  रूप को धारण  कर  धीरे -धीरे  कुप्रथा  बनती गई। देवदासियाँ  नृत्य  और संगीत में विशेषज्ञ  होती  थीं। जिस कारण मंदिर  के पुजारियों  ने देवदासियों  के नृत्य और संगीत  की सेवा  मंदिर  के अलावा व्यक्तिगत  स्तर पर लेने लगे। नृत्य और संगीत  के सेवा के अलावा  मंदिर  के पुजारियों के द्वारा इन देवदासियों  से शारीरिक  संबंध  भी बनाने लगे।

फ्रेंकोइस बर्नियर (१६२०-१६८८) एक फ़्रांसिसी चिकित्सक  एवं  यात्री थे। मुगल भारत की यात्रा का उनका विवरण, उस समय के इतिहास के बारे में जानने का महत्वपूर्ण स्त्रोत माना जाता है। वे शाहजहां के सबसे बड़े पुत्र शहजादा दाराशिकोह के व्यक्तिगत चिकित्सक थे और दाराशिकोह की मौत के बाद, वे औरंगजेब के दरबार से लगभग एक दशक तक जुड़े रहे। उन्होंने पुरी की यात्रा की थी। बर्नियर के अनुसार, हर साल पुरी में रथयात्रा के पहले भगवान जगन्नाथ का विवाह एक नई युवती से किया जाता था। विवाह की पहली रात, मंदिर का कोई एक पुजारी उसके साथ संभोग करता था।  सन् १९२७  में, मोहनदास करमचंद गांधी ने यही बात कही, “मुझे यह कहते हुए बहुत शर्मिंदगी महसूस होती है कि हमारे देश के कई मंदिर वेश्यालयों से अलग नहीं।[[10]] इन संबंधों  को धार्मिक और पवित्र ठहराने  के लिये कहने  लगे  की देवदासियों  और उनके  बीच  सम्बन्ध  स्थापित करने से उनके और भगवान के बीच  संपर्क  स्थापित  होता है। देवदासियों  को न सिर्फ  इन पुजारियों  से सम्बन्ध  स्थापित  करना  होता था बल्कि  इसके अलावा उन्हें मकान मालिक  और देवताओं  के सम्बृद्ध  भक्तों  को भी  सेवा  देना पड़ता था।

धार्मिक अंध- विश्वास  के नाम पर  छोटी -छोटी  बच्चियों को देवदासी  बना  दिया  जाता है। उसे धर्म के नाम पर  दलदल में धकेल दिया जाता है। उनकी मासूमियत  को छीनकर  उन्हें समय से पहले ऊपरी तौर पर परिपक़्व  होने के लिये  मजबूर कर दिया जाता है, उनकी  इच्छाओं पर अंकुश लगा दिया  जाता है। ये वही कार्य करते थे जो मंदिर  के पुजारियों द्वारा उसे दिया  जाता  था। कुछ  देवदासियां  अन्य  आम जन  से भी  सम्बन्ध  बनाकर  प्राप्त  धनराशि  को मंदिर  में समर्पित  कर  देती थीं। धीरे -धीरे  ये देवदासियां  जब मंदिर से उपेक्षा का शिकार होती थीं, तो उनकी मूलभूत आवश्यकतओं  की पूर्ति नहीं होती थी इसलिए वें वेश्यावृत्ति  को अपनाने  लगीं। ये  देवदासियां  चाह  कर भी दूसरी शादी नहीं कर सकती थीं क्योंकि इनका विवाह  एक बार देवता से हो चुका रहता है, जिस कारण ये  जीवित व्यक्ति  से फिर से शादी नहीं कर सकती थीं। जब ये कम उम्र में देवदासी बन जाती थीं तो  इनके साथ  कम उम्र में ही  पुजारियों द्वारा  शारीरिक  सम्बन्ध  बना लिया जाता था। ये ३०-३५ की होने पर उपेक्षा का शिकार होने लगती थीं, जिस कारण ये वेश्यावृत्ति के व्यवसाय को अपना  लेती थीं। कम उम्र में ही शारीरिक  सम्बन्ध  बनाने के कारण ये यौन सम्बंधित रोगों का शिकार हो जाती थीं। एड्स जैसी खतरनाक  बीमारियां जब  गंभीर रूप धारण कर लेती थीं तो गरीबी  और लाचारी एवं  उपेक्षिता  के  रूप में तिल- तिल कर मरना पड़ता था। देवदासियों के सम्बन्ध में एक और गंम्भीर समस्या सम्पूर्ण  विमर्श में उभर कर सामने आता है; वह यह है कि यौन सम्बन्धों से कभी-कभी  गर्भ भी ठहर जाता था, तब उन्हें उन बच्चों को जन्म भी देना पड़ता था। अब प्रश्न यह उठता  है कि इन बच्चों को समाज में वह अधिकार व सम्मान कैसे मिले जो एक बच्चे को मिलाना  चाहिए। इन नाजायज बच्चों को अधिकार दिलाने एवं समाज में जागरूकता फ़ैलाने के लिए  काम करने वाली संस्था ‘पोराट संघम’ के अध्यकक्ष  लक्ष्मम्मा  कहती हैं कि इन सारे नाजायज बच्चों का डी.न.ए. टेस्ट करवाया जाये ताकि उनके पिता का पता लगा सके और उनकी संम्पति में इन बच्चों को भी हिस्सा मिल सके। ऐसा करने पर किसी भी महिला का देवदासी के नाम पर पुरुष शोषण नहीं करेगा।

निष्कर्ष निष्कर्ष के तौर  पर हम यह  कह सकते हैं कि एक लम्बे समय से धर्म के नाम पर देवदासी प्रथा के नाम पर स्त्री का शोषण किया जा रहा है। हम अतीत को तो नहीं सुधार सकते हैं परन्तु वर्तमान में जरूर सुधार सकते हैं। आज जहाँ स्त्री जीवन के सभी क्षेत्र में सफलता के मुकाम को हासिल कर रही है, एक स्वस्थ  समाज के निर्माण में अपना सहयोग  दे रही है। वहीं कुछ ऐसी स्त्रियां भी हैं जो धर्म की आंड़ में शोषित हो रही हैं। उन्हें वे सभी अधिकार दिलाने का प्रयास सरकार और समाज को करना चाहिए, जिससे वे अपना जीवन का मजबूरी से नहीं; बल्कि सम्मानपूर्वक निर्वाह कर सकें। बम्बई, मद्रास, कर्णाटक, आंध्र  प्रदेश, गोवा एवं भारत सरकार ने इस प्रथा पर अधिनियम लाकर इसे रोकने का एक सकारात्मक कदम उठाया है। सरकार के आलावा  अन्य  संस्थाओं  के द्वारा भी इनके पुनर्वास का प्रयास किया जा रहा है।

 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची:

[1] Sathyabama, K, 1998. Mechenzie Tamil Chuvadikal Chuttum Makkal Valviyal (unpublished Ph.D thesis). (in Tamil). Thanjavur: Tamil University. p. 204.

[2]  Swaminathan, A. 1992. Tamilaka Varalarum Panpadum. (in Tamil). Chennai: Deepa Pathppakam. p. 150

[3] Orr, Leslie. C. 2000. Donors, Devotees and Daughters of God: Temple Women in Medieval Tamilnadu. Oxford: Oxford University Press. p. 49

[4] Philip, George. March, 2005. A Historical Anatomy of the Evolution of Social Revolution in Travancore (unpublished Ph.D thesis). Kottayam: Mahatma Gandhi University. p. 66.

[5] Orr, Leslie. C. 2000. Donors, Devotees and Daughters of God: Temple Women in Medieval Tamilnadu. Oxford: Oxford University Press. p. 49.

[6] Cush, Denise; Catherine Robinson and Michael York. 2008. Encyclopedia of Religion. London: Routledge. p. 180

[7] Saskia C. Kersenboom- Story. 1987. Nityasumangali. Delhi: Motilal Banarsidas. p. XV.

[8] मधुकर,विश्वकर्मा  गुरुरामजी .२००६ .भारतीय नारी  और उनका  त्याग . दिल्ली,काल्पाज  पब्लिकेशन .पृष्ठ  सं.135.

[9] मिश्र, उर्मिला प्रकाश.२००२.प्राचीन भारत में नारी .मध्य प्रदेश. मध्य प्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी. .पृष्ठ सं. 135-136.

[10] गाँधी, महात्मा.  (‘यंग इंडिया ६  अक्टूबर १९२७)

         अमित कुमार झा
महिला अध्ययन एवं विकास केंद्र
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

                              

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