ढाबेवाली | डॉ. मीनाक्षी सिंह

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झारखण्ड की कोडरमा घाटी के पास ही हाईवे पर एक छोटा-सा ढाबा है। ढाबे के बाहर रस्सी की खाट पर अलमस्त एक छोकरी लेटी हुई है। उसने अपना मटमौला दुपट्टा अपने चेहरे पर ओढ़ लिया है और एकटक सूरज को गोल नाचते हुए देख रही है। दुपट्टे के पार सूरज की किरणें पार कर उसकी आँखें ढक्कन की तरह घूमते पीले सूरज के गोले पर टिकी हुई हैं और उसका मन लट्टू की तरह नाच रहा है।
सूरज के घूमते हुए पिण्ड पर नाचते-नाचते उसकी आँखें मुँदने लगीं और धीरे-धीरे उसका अन्तर्मन उतनी ही दूर कहीं खोने लगा जितनी कि दूर उससे सूरज था, जितनी कि दूर उससे उसका अपना सूरज था…
करीब पांच साल पहले जब वह सोलह साल की थी, उसे किसी कारण से अपनी मामी के घर दिल्ली जाना पड़ा था। दिल्ली में उसके मामा, मामी और उनकी दो बेटियाँ तथा एक बेटा रहते थे। उस वक्त उसे करीब डेढ़ साल तक वहाँ रहना पड़ा था और उसी डेढ़ साल में उसके मामाजी ने उसका एडमिशन अपनी ही बेटी के साथ एक स्कूल में करा दिया था। प्रतिदिन वह अपनी बहन के साथ स्कूल जाती थी। उसे वह स्कूल बहुत अच्छा लगा था, वहाँ की लड़कियाँ, वहाँ के शिक्षक, वहाँ के लोग और सबसे ज्यादा वह लड़का, जो नीली यूनिफार्म में हमेशा सफेद गुलाब-सा लगता था, जो सबसे शांत और पढ़ने में सबसे तेज था। उसका नाम था – सूरज। सूरज हमेशा अपनी किताब में सिर झुकाए बौठा रहता था। तन्वी ने कई बार महसूस किया था कि उसकी पीठ पर कुछ टिका हुआ-सा है। उसकी बहन ने उसे बताया था कि सूरज की नज़र हमेशा तन्वी की तरफ रहती है। तन्वी, जो उस वक्त करीब सोलह साल की थी, मध्यम कद की पर दुबली-पतली, गोरी और बहुत ही सादा वेश ; पर काले लम्बे बालों के बीच उसका गोरा सफेद मुखड़ा चाँद-सा खिला हुआ। तन्वी जो हमेशा अपनी बड़ी-बड़ी आँखों की काली घनी पलकों को झुकाए रखती थी शायद उसे एहसास था कि अब वह बहुत सुन्दर दिखती है, उसका मुख-चन्द्र अब चतुर्थी का आधा चाँद नहीं, बल्कि पूर्णिमा का पूरा चाँद बन गया है, उसके बदन से अब एक अजब-सी सुगंध निकलती है, उसका मन बहुत उल्लसित रहता है, उमंगित रहता है और जब वह अपनी पलकें उठाती हैं तो खुद पर किसी की निगाह टिकी देखकर उसे रोमांच हो उठता है, उसके टमाटर जौसे गोल-गोल गाल और भी लाल हो जाते हैं, उसके मोती जौसे दाँत कहीं भीतर छुप जाते हैं अपने घर की कपाट बंद करके पर फिर कुछ ही क्षण बाद उसका हृदय खुद ही आँखों को आदेश देता है ऊपर उठने को और उस लड़के को निहारने को जो कि उसे भी बहुत अच्छा लगता था।
सूरज से उसने कभी बात नहीं की थी, पर उसने सुना था अपनी बहन के मुँह से कि सूरज उसके बारे मेंे पूछता रहता है – उसका नाम, उसका उससे रिश्ता और बहुत कुछ। फिर उसकी मार्फत उसे सूरज का एक खत भी मिला था और जिसे हाथ में लेते ही उसकी धड़कने जोर-जोर से उछलने लगी थीं, उसकी साँसें रुकने लगी थीं और उसने उस ख़त को बड़े ही काँपते हाथों से खोला था और तब उसके टमाटर जौसे गाल और लाल हो गए थे।
खिड़की के पास लेटे हुए वह दुपट्टा मुखड़े पर ओढ़कर सूरज की तरफ घण्टों देखती रहती थी – “वह सूरज जो गतिमान है, वह सूरज जो आग का गोला है और सोचती मेरे सूरज इस तरह गतिमान नहीं बल्कि बहुत स्थिर हैं, मेरे सूरज तो आग का गोला नहीं पानी के समान शीतल हैं, ये सूरज सारी दुनिया के नहीं सिर्फ मेरे हैं।” और ऐसा ख्याल आते ही उसके गाल लाल हो जाते।
एक दिन वह सूरज से कहीं पार्क में मिलने भी गई थी और उस दिन तन्वी ने पहली बार सूरज को अपलक सामने से निहारा था। उस दिन सूरज ने आइस्क्रीम खरीद कर उसे अपने हाथों से खिलाया था और फिर इसी बहाने उसके हाथों को स्पर्श भी किया था। उस एक स्पर्श से मानो तन्वी की पलकें भारी-भारी हो गई थीं, उसकी नाक से लेकर कान तक सारा मुंह जौसे तँदूर बन गया था और उसके गाल लाल-लाल हो गए थे। दोनों एक दूसरे को घण्टों निहारते रहे थे। सूरज सोच रहा था – तन्वी के गाल क्यों इतने लाल हैं – कुछ तो खास बात है इनमें। जौसे सूरज ने खुद अपनी लाली मल दी हो उसके गालों पर। तन्वी सोचती -“खास बात मेरे गालों में है पर शायद उससे भी ज्यादा सूरज की आँखों में क्योंकि उसके टमाटर जौसे गोल-गोल गाल तब और लाल हो जाते जब सूरज को वह अपलक उन्हें निहारते देखती। वह उन आँखों में डूब जाना चाहती थी, खुद उनमें छुपकर पलकों के दरवाजे बन्द कर लेना चाहती थी। वह दुनिया जिसमें वह खुद को बहुत असुरक्षित महसूस करती सूरज की आँखों के पार बंद हो वह खुद को बहुत महफूज पाती। सूरज की पुतलियों में उसने झाँका था और उसे खुद की तस्वीर दिखी, उसे अच्छा लगा था, मानों सूरज की आँखों में सिर्फ वह है उसने खुद को सूरज के साथ पाया, उसके पास उसकी बाँहों में और अपनी आँखों में, अपनी ही कल्पना में सूरज के साथ खुद को पाकर वह पानी-पानी हो उठी थी। उसकी गालों की बढ़ती लाली को सूरज ने महसूस कर लिया था और शायद तन्वी की खोई हुई आँखों में उसकी काल्पनिक तस्वीर को भी देख लिया था और गालों की लाली का राज भी समझ गया था। इसलिए तो खोई हुई तन्वी के तन्दूर जैसे लाल-लाल गालों पर उसने अपने काँपते होंठ रख दिए और तन्वी मानो बेसुध -सी हो उठी थी, मचल उठी थी, वह कुछ भी न कर पाई थी कि तभी तन्वी की बहन कहीं से आ गई और उसे वापस घर जाना पड़ा।
उसी शाम जब वह अपने कमरे में खिड़की के पास लेटी डूबते सूरज को देख रही थी – दुपट्टे के पार से तब उसे लग रहा था उसके गाल भी डूबते सूरज की भाँति ही लाल हो गए होंगे, उसी आग के गोले सूरज की भाँति गर्म हो गए होंगे शायद जब सूरज …तभी जोर से कर्र…कच्च…चर्ट करके एक गाड़ी की आवाज़ आई और खट् करके दरवाज़ा खुलने की भी-फिर दरवाज़ा बंद होने की भी – और तभी तन्वी की बहन कमरे में तीर की तरह घुसी और कहा – तन्वी, तेरे पापा की तबीयत बहुत खराब हो गई है। तुझे आज ही पापा के साथ झारखण्ड जाना होगा। और उसके टमाटर जैसे गाल मानो सूख गए थे, सफेद पड़ गए थे…
तन्‍वी को लगा जैसे उसे कोई झकझोरकर जगा रहा है- उसका नशा टूटा- उसने देखा सामने एक कार खराब होने की वजह से गाड़ी वाले का परिवार उसके ढाबे पर ही रुक गया है। और उसकी बहन उसे झकझोरकर शायद देर से जगा रही है- “दीदी उठो, देखो मेहमान आए हैं। चलो उठो, माँ चिल्ला रही है। जल्दी, खाने-पीने का इंतज़ाम करना है। तुम खाने-पीने का इंतज़ाम करो, तब तक मैं उनके हाथ-पाँव धुलवाती हूँ। तन्वी उठते ही तीर की तरह ढाबे में घुस गई और जल्दी-जल्दी खाना-पीना करने लगी। ढाबे के भीतर से ही उसने देखा एक लंबा-दुबला-पतला पर स्वस्थ-सुन्दर आदमी है, जिसने हल्की-सी नीली कमीज पहन रखी है, साथ में एक बहुत ही सुन्दर स्त्री है – जिसके बाल बहुत लम्बे हैं और उसने हल्के पीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहन रखी है जिसका पल्ला गुलाबी रंग का है और जिसके पीले चुन्नटों पर हल्के गुलाबी रंग के छोटे-छोटे फूल कढ़े हुए हैं। तन्वी उसके रूप को देखकर मुग्ध हो गई और उसकी सुन्दरता के आईने में उसकी सुन्दरता की कसौटी पर खुद को कसने लगी। और इसके लिए वह सिर से पौर तक बड़ी देर तक गौर से उसका निरीक्षण करती रही।
तन्वी बड़ी ही मुग्ध होकर उस स्त्री को देखे जा रही थी और साथ ही अपने काम भी कर रही थी पर जब स्त्री-पुरुष और उनकी बच्ची आकर खाट पर बौठे, मानो तन्वी को बिच्छू ने डंक मार लिया। वह मानों चीख पड़ी – सूरज….। आज सुबह से और सिर्फ सुबह से ही क्यों, उसी दिन से जिस दिन से उसने सूरज को देखा था, और जिस दिन वह सूरज से मिली थी और उसे अचानक वापस आ जाना पड़ा था – ऐसा एक भी दिन नहीं था जब उसने सूरज को याद न किया हो। और सच पूछो तो उसकी मीठी याद के सहारे ही उसका शुष्क मन शुष्क पर्वतों, पहाड़ों में रमा रहता है -पर आज उसे लग रहा था जैसे किसी ने उससे इस आशा को, इस विश्वास को, इन सपनों को भी उससे छीन लिया है। उसका जी उचाट हो गया। वह भीतर ही भीतर सारी व्यवस्था करके बहन के माध्यम से खाना-पीना बाहर पहुँचवाती रही, पर खुद भीतर ही रही।
काम-काज करते-करते पहर बीत गया। पहाड़ी जगह थी, जल्दी ही अँधेरा घिरने लगा और साथ ही मानो किसी मनहूसियत का साया-सा सन्नाटा भी। कोडरमा की घाटी और जलेबिया मोड़ रात के सफ़र के लिए बहुत खतरनाक है साथ ही गुण्डों-लुटेरों के अड्डों ने उसे और भी मारक बना दिया है। अत: सूरज का परिवार आज रात ढाबे पर ही रूक गया। जब सब खा-पीकर सो गए तो तन्वी-ढाबे के पीछे अपनी फुलवारी में चली गई।
यह फुलवारी उसके सपनों का जहाँ था, यह एक छोटी-सी इंसानी सीमा में कैद गार्डन नहीं था बल्कि प्रकृति की असीमित सृष्टि और सीमाओं के विस्तार का संसार था, जहाँ ऊँचे-ऊँचे पहाड़, चट्टान इस बगिया की चारदीवारी का काम कर रहे थे और ढाबे के पीछे की छोटी-सी पहाड़ी पर ही रास्ते मानो खुदे हुए थे जिसपर से नीचे उतरने की अभ्यस्त तन्वी फुदकती-सी नीचे उतर गई। जहाँ उसकी छोटी-सी फुलवारी थी। वास्तव में वहाँ छोटे-छोटे गमलों में कुतरे हुए आधुनिक फूलों के पौधे नहीं थे, बल्कि चम्पा, चमेली, गुलमोहर आदि के लाल-पीले फूलों की असीमित विस्तारता पूरे चमन को ही गुलज़ार बना रही थी। अनगिनत पेड़ों और अनगिनत फूलों-पत्तियों का सृष्टि द्वारा सृजित यह बंजर ही तन्वी का अपना संसार था। वह उन पेड़ों को देखती, ऊँचाइयों पर झाँकती, जब उसे धरती की संकीर्णता सताने लगती तब वह विशाल आकाश की तरफ देखने लगती और उसे महसूस होता कि इस धरती पर भी विस्तार है पर हृदय बँटने और स्वार्थ बँटने की वजह से प्रत्येक की अपनी जगह बहुत संकुचित हो गई है। ये ब्रह्माण्ड, उस आकाश का बँटवारा अभी तक नहीं हुआ है और इसलिए वह एक संपूर्ण है सिर्फ उसका, तन्वी का। उसे लगता आकाश में कोई देवी अपना संपूर्ण आँचल दिखाकर उसे बुला रही है कि आ जाओ, यहाँ असीमित जगह है, तुम सुख पाओगी, शांति पाओगी, और तन्वी का मन मचल उठता। खाली आकाश का दृश्य उसकी आँखों को सुकून पहुँचाते और तब उसे उन पक्षियों से ईर्ष्या होती जो इसी आकाश के निवासी हैं, इस आकाश में स्वच्छन्द विचरण तो करते हैं, पर अपने स्वार्थ के लिए, अपने वंश के लिए इसका विभाजन नहीं करते। आकाश को वे अपनी बपौती नहीं बल्कि सृष्टि का वरदान मानते हैं…
तन्वी !…तन्वी !…तन्वी अपनी विचारधाराओं में इतनी मग्न थी कि उसे प्रतीत हुआ मानो उसके असीम प्रेम की पुकार आज आसमान ने, पौधों ने, चट्टानों ने सुन ली है और उसे उसका नाम लेकर पुकार रहे हैं, अपने पास बुला रहे हैं, वह इधर-उधर देखने लगी मानो आवाज़ की सीमा निर्धारित कर रही हो। तभी आवाज़ उसके और करीब आई।
तन्वी !… सुनो तन्वी !… तन्वी ने देखा, सामने उसी छोटी पहाड़ी के रास्ते कोई नीचे, उसके संसार में प्रवेश करने की कोशिश कर रहा है, पर चूँकि वह अभ्यस्त नहीं है, इसलिए उसे कठिनाई हो रही है और वह तन्वी को मदद के लिए पुकार रहा है। तन्वी झट से उस ओर जाती है। यूँ तो वहाँ अँधेरे के झुटपुटे में हाथ को हाथ नहीं दिखते पर आज मानो इसी दिन के लिए जमा कर रखी हुई अपनी सारी सम्पत्ति चाँद लुटा रहा था। और उसके इस लुटाने से वहाँ की हर चीज़ प्रफुल्लित थी, पेड़-पौधे चाँदनी की छींटों को अपने पत्तों में, फूलों में सहेज रहे थे, चट्टानों ने तो चाँदनी को इस प्रकार अपने पूरे शरीर पर लपेट लिया था मानो वह खुद चाँदनी बन गया हो। और यह ‘मून पार्टी’ इसलिए चल रही थी क्योंकि आज इस फुलवारी में और कोई नहीं, चाँद का अपना दोस्त, उसे प्रकाश देने वाला, उसे चाँदनी से रू-ब-रू करवाने वाला स्वयं उसका सूरज आया था।
तन्वी ने देखा – सूरज को बड़ी दिक्कत हो रही है उस पहाड़ी से उतरने में – वह झट खुद ही आधी पहाड़ी पर चढ़ गई। उसने सूरज को पुकारा और कहा मेरा हाथ पकड़ लीजिए। सूरज ने देखा – तन्वी उसकी तरफ हाथ बढ़ाकर खड़ी है। आज सूरज ने फिर से उस चेहरे को देखा जिसे कभी वह चाहता था कि रात-दिन निहारा करे, जिसे कभी वह हमेशा अपने सामने देखते रहना चाहता था और तब उसकी नज़र पड़ी तन्वी के उन्हीं गोरे-गोरे गालों पर। उसे लगा कि आज यहाँ कुछ ‘मिसिंग’ है। उसे ध्यान आया तन्वी के टमाटर जैसे लाल गाल और उसे लगा कि आज तन्वी के गालों पर वह सुर्खी, वह लाली नहीं है जो सूरज की एक नज़र पड़ते ही मानों सूरज की आँखों से फुदककर तन्वी के गालों पर टिक जाती थी। उसने तन्वी का हाथ पकड़ लिया, उसे लगा आज तन्वी के हाथों में भी वह मुलायमियत नहीं है …धीरे-धीरे दोनों नीचे उतर गए। तन्वी सूरज को वहाँ देखकर अवाक् हो रही थी। इतनी देर से उसे मौका ही नहीं मिला कि वह कुछ पूछे। उसने सोचा था कि मैं सूरज के सामने ही नहीं जाऊँगी फिर सूरज यहाँ कैसे आ गए और फिर बहुत सारे सवाल उसके मगज में एक साथ गड्ड-मड्ड करने लगे पर जुबान एक के लिए भी खुलने के लिए तौयार ही नहीं थी।
तभी सूरज की जुबान ने मानो ऑर्डर दे दिया।
“तन्वी, तुम कहाँ चली गई थी अचानक। मौंने तुम्हारी बहन से तुम्हारे बारे में पूछा था पर उस वक्त पता जानकर भी करता क्या ? और बाद में पढ़ाई-वढ़ाई के चक्कर में हम दोनों अलग-अलग जगह चले गए इसलिए मेरे हाथों से तुम ही खो गई।”
तन्वी ने बताना शुरू किया -“हाँ, मुझे अचानक आना पड़ा था। मैं… मैं… उस दिन… हाँ…उस दिन मेरे घर से मामा जी को खबर आई थी कि पिताजी की तबीयत बहुत खराब हो गई है और मामाजी ने मुझे उसी दिन की गाड़ी से यहाँ पहुँचाया था। और… और दूसरे ही दिन पिताजी… पिताजी मेरे नहीं रहे।” और जौसे तन्वी के शब्द भी उस मृत्यु के दिन का शोक मनाने लगे। …कुछ देर बाद वह फिर बोली …”पिताजी के जाने के बाद मैं, मेरी बहन और माँ अकेले रह गए। हमारे पास और तो कुछ था नहीं। पिताजी का यही ढाबा था। मामाजी चाहते थे कि हम उनके साथ दिल्ली चलें पर मेरी माँ नहीं मानीं। उन्होंने इसी ढाबे को अपनी जिंदगी बनाने का फैसला किया और तबसे हम तीनों मिलकर ही इस ढाबे को चला रहे हैं …नहीं …शायद हम तीनों को यह ढाबा चला रहा है।”
सूरज बड़ी तन्मयता से यह सब सुन रहा था। वह पेड़ की टहनी से टिका पाँव फैलाकर बौठा हुआ था। पास ही तन्वी बौठी हुई थी और हाथों से घास-फूस उखाड़-उखाड़कर मानो अपने मन से कुछ उखाड़ने की कोशिश कर रही थी। सूरज उसकी ओर बड़ी देर से देखे जा रहा था। उसने देखा हर बात की उतार-चढ़ाव के साथ-साथ घास तोड़ने की उसकी गति भी बढ़-घट रही थी। सूरज हल्का-सा उठा और तन्वी का बायाँ हाथ अपने हाथों में लेकर फिर लेट-सा गया। इस बार हल्के-हल्के वह अपनी बात बताने लगा। पढ़ाई पूरी करने के बाद पापा ने मुझे एक साल के लिए अमेरिका भेज दिया था। वहाँ पापा के एक फ्रेंड रहते हैं। उनके साथ रहकर मुझे बिजनेस के टिप्स सीखना था। वहाँ से आकर पापा ने मुझे अपनी ही कम्पनी में मैनेजर बना दिया। उसके छ: महीने बाद ही उन्होंने अपने बिजनेस पार्टनर की बेटी के साथ मेरी शादी करवा दी। मैं अभी शादी करना नहीं चाहता था पर पापा की जिद थी कि ये शादी हो और जल्दी हो। हारकर मुझे उनकी बात माननी पड़ी और मुझे तुम्हारे बारे में कुछ पता भी तो नहीं था…यहाँ मैंने तुम्हारी बहन को देखा उसकी शक्ल हू-बहू तुम्हारी तरह है, और पता नहीं क्यों मुझे लगा कि तुम भी यहीं कहीं हो पर तुम मिली नहीं। अभी मैंने एक साए को इस तरफ आते देखा, मैं भी पीछे-पीछे आया और देखा, यह तुम्हीं थी।
यह कहकर सूरज तन्वी की हथेली को धीरे-धीरे सहलाने लगा। तन्वी नीचे आँखें किए हुए थी और न जाने क्या देखे जा रही थी। सूरज ने कहा -“तन्वी मेरी तरफ देखो।” तन्वी सूरज की तरफ पीठ किए हुए बैठी थी। उसने मानों कुछ सुना ही नहीं। सूरज हल्के से उठा और उसके गालों को अपने हाथों में लेकर उसने अपनी तरफ घुमाया और कहने लगा -“तन्वी, मैं जानता हूँ तुम बहुत कुछ कहना चाहती हो पर कह नहीं पा रही हो। पर तुम्हीं कहो, मैं क्या करूँ ? मेरे हाथ में तो कुछ भी नहीं था। हम बहुत कुछ अपनी इच्छा से करना चाहते हैं पर सब कुछ हमारी इच्छा से होता तो नहीं है। किस्मत हमें अपने हाथ की कठपुतलियों की तरह नचाती रहती है। यही उँगलियों में बंधे, नाचते-नाचते हम कभी एक इंसान तो दूसरे ही क्षण दूसरे इंसान के सामने आ जाते हैं।” तन्वी ने अब धीरे-धीरे अपनी भारी पलकों को उठाया। उसने देखा सूरज उसकी तरफ बड़ी ही याचना से देख रहा था। अब तन्वी ने भी सूरज के चेहरे को देखा, बहुत सामने से देखा, ध्यान से देखा …सूरज ने भी तन्वी को देखा, सिर्फ तन्वी को। दोनों को लगा…शब्द तो मात्र भ्रम है; शब्द चुक गए हैं।
शब्दों ने ही आदमी को कितना अव्यवस्थित बना दिया है। ये शब्द बीच में ना रहें तो मनुष्य कितना शांत जीव है। जितने भी झगड़े हैं, हिंसा है, सब कुछ इन बातूनी शब्दों की वजह से। छोटे-छोटे जीव जिनके पास शब्द नहीं हैं उनमें विभाजन नहीं है, उनमें मौन है और इसलिए बस प्रेम है, कलह नहीं है। दोनों निस्तब्ध से हो गए हल्की-हल्की सांसों की आवाज के सिवा अब कोई शब्द नहीं था उनके बीच। उन्हें लगा ये शब्द ही तो जोड़ते हैं पर ये शब्द ही तोड़ते भी हैं। अब बोलने को कुछ नहीं है बस। बातें बहुत हो चुकीं। और उनके मौन चेहरे आपस में बात करने लगे। उनकी बातों को सुनने के लिए पूरा का पूरा वातावरण नि:स्तब्ध था। पत्तों ने झूमना बन्द कर दिया, हवाओं ने सरसराना बन्द कर दिया, छोटे जीवों ने बिलों को कुतरना बन्द कर दिया…और इस मौन निस्तब्धता में सांसों ने सांसों से , आंखों ने आंखों से बातें करनी शुरू की। सूरज की आंखें सोचती हैं -“आज तन्वी कई सालों के बाद मिली है। कुछ देर पहले ही उसे मैंने देखा था, और तब से वह पूरी तरह से अजनबी थी, अलग थी, उसके हाथ रूखे-रूखे से थे, उसकी आंखें अजनबी थी, उसके होंठों पर पपडि़यां थीं, गालों पर वह लाली नहीं थी। तभी उसे लगा जौसे धीरे-धीरे तन्वी के गालों पर लाली-सी आ रही है और उसकी पलकें भारी, उनींदी हो रही हैं। तन्वी ने महसूस किया कि जैसे उसकी नसें आंखों से कानों तक खिंची जा रही हैं, उसके चेहरे पर तवे जैसी आग छा रही है, और उसके गाल जौसे लाल-लाल हो रहे हैं। और आज अचानक बरसों से बौठा एक सवाल दोनों के मन में सुलझ गया। दोनों को यह तो समझ नहीं आया कि बात खास तन्वी के गालों में है या सूरज की आंखों में पर यह जरूर समझ आ गया कि काले-काले बादल अचानक आकाश में क्यों छँटने लगते हैं, बंद-बंद-सी सूखी सूरजमुखी अचानक खिल क्यों उठती है… और …बातें अब चुक चुकी थीं।
दोनों के बीच शब्दों ने दूरियां बना रखी थीं। शब्द दुनिया के, शब्द परिवार के, शब्द समाज के और शब्द खुद उनके। अब इन शब्दों के बस का कुछ न था। अब मौन ने विजय पा ली थी। अब तन्वी और सूरज दोनों अपने उसी स्थान पर पहुंच गए थे जहाँ वे खत्म हो गए थे। जहाँ आज भी उस पार्क की हवा दोनों का इंतजार कर रही थी, जहाँ आज भी सूरज के होठों का मुहर छप-सा गया था और जहाँ आज भी तन्वी के तंदुरी गाल पिघलकर अपना निशान चिपका आए थे, आज तन्वी के गाल उन होंठों से अपना कर्ज चुकाने की मांग कर रहे थे, और सूरज के लरजते होंठ उस कर्ज चुका देने के लिए, तन्वी के गालों पर मर मिटने के लिए तत्पर थे, हवाएं जो हाथी की तरह झूमती आ रही थीं, सूरज और तन्वी पर नजर पड़ते ही ठिठककर वहीं रुक गई थी, पत्ते झूमना बन्द कर सांसें-रोक दोनों की बातें सुन रहे थे, छोटे जीव बिलों में कुतरना बंद कर दुबककर इन्हीं की ओर नजरें लगाए बैठे हुए थे। सब कुछ थम गया था, सूरज के होंठ तन्वी के तन्दूरी गालों की तरफ बढ़ रहे थे तन्वी भारी पलकें लिए अपने हाथों को घूरे जा रही थी कि तभी ….उन्होंने वातावरण में कुछ हलचल महसूस किया।
ऐसा लगा जैसे फिजा पर ओढ़ाई गई जादुई चादर झट से किसी ने खींच ली हो, हवाएँ फिर से झूमने लगीं, पत्ते फिर से सरसराने लगे, जीव फिर से बिलों में धमा-चौकड़ी मचाने लगे, सबकी तन्द्रा टूट गई थी और सभी अपने-अपने रास्ते लग गए। कारण था सूरज की जेब में रखा हुआ सैमसंग गैलेक्सी से निकलने वाला क्लियर मधुर संगीत जिसने जादुई मंत्र का सारा जादू तार-तार कर दिया था और मोबाइल की रिंग स्तब्धता को चीरती हुई गाने लगी -“हमको मिली हैं आज ये घड़ियां नसीब से …जीभर के देख लीजिए हमको करीब से; फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो।…शायद इस जन्म में फिर… मुलाक़ात हो न हो, लग जा गले … सब होश में आए, सूरज और तन्वी भी…उन्होंने महसूस किया कि फिज़ा कुछ अनमनी-सी हो गई है। हवाएँ कुछ अस्थिर-सी और दोनों कुछ बेचैन से …सूरज ने कुछ लंबी सांसें ली, गला साफ किया और तपाक से फोन रिसीव करते ही बोला-हैलो डार्लिंग कहो – स्‍पीकर से आवाज गूँज उठी …व्हेयर आर यू सूरज ? ….मुझे तो यहाँ बिल्कुल नींद नहीं आ रही। रूही भी बहुत तंग कर रही है। यू प्लीज कम फास्ट। …. “सूरज ने शुरू ही किया ….हाँ मैं जरा घूमने निकल आया था अभी आता हूँ …थोड़ी देर …बात पूरी भी न हुई थी कि फोन डिस्कनेक्ट हो गया।
एक बार फिर फ़िजा खामोश हो गई थी पर इस बार उन लिजलिजे तंतुओं की मानों सांसों की डोर ही टूट चुकी थी। वे डोर जिनमें अब भी कुछ चिपचिपाहट बची थी, और जो गिरते लड़खड़ाते पड़ते खुद को जोड़ने की कोशिश कर रहे थे। अबकि बार टूटकर गिरने से उनमें वह अंतिम शक्ति भी नहीं बची और वाकई में अब सब कुछ चूक गया था-सब कुछ, निस्तब्धता भी, मौन भी …प्रेम भी। और हारकर सूरज को उठना पड़ा। उसने धीरे से तन्वी का हाथ लेकर अपने हाथ से दबाया और फिर जल्दी से पहाड़ी पर चढ़ने लगा। उसका अटक-अटककर पहाड़ी पर चढ़ना देखकर तन्वी की आंखें अटककर रह गर्इं …और उसे देखती रह गर्इं जब तक वह पूरी पहाड़ी चढ़ नहीं गया। …सब कुछ अस्थिर हो गया था, सबकी साँसें जौसे कैद से छूटकर नॉर्मल हो रही थी…सूरज की गाड़ी भी अब रुकने वाली नहीं थी, यह तो पड़ाव था, जहाँ थोड़ी देर स्थिर हो वह फिर चल पड़ा था, हवाएँ, पत्ते, जीव-जन्तु, फूल, चंदा, सब मानो अस्थिर से हो गए थे, बादल जो तबसे ठिठके से थे अब वे भी छँटने लगे थे, पर तन्वी …तन्वी की तो सांसें जड़ हो गई थीं, नज़रें अटक गई थीं, और उसका बदन उसका पिघला-सा बदन अब ठण्डा होकर उसी जमीन पर बूत बन गया था। वैसे ही जैसे सालों पहले एक मूर्ति उसकी उस बाग में एक ही पल में उग आई थी, पर तब वह भूमि से उगी थी, और आज मानों ऊपर से थुप गई हो, चिपक गई हो। ….किसी ने उसे मूर्ति बनाकर उसका सर्वस्व उसके हाथों से छीन लिया था।
रेत की तरह उसका सूरज उसके हाथों में आकर फिर फिसल-सा गया था और वह देखती रह गई थी मूर्तिवत्…जड़…। धीरे-धीरे पौ फटने लगी ….चिडि़या अपने-अपने घोसलों से निकलकर व्यस्त-सी हो गर्इं …वातावरण बड़ा अपरिचित-सा लगने लगा, वही हवा, वही जीव-जन्तु जो तन्वी के साथ पूरी रात की निस्तब्धता के गवाह थे अभी सब पलट गए थे, मानों किसी ने कुछ देखा ही नहीं, कोई कुछ जानता ही नहीं…और तन्वी…तन्वी को तो वे पहचानते भी नहीं। तभी तन्वी ने सुना -“दीदी… दीदी… कहाँ थी तुम रात भर, जानती हो, कलवाले साब और बीबी जी निकल गए। साब बहुत अच्छे थे। उन्होंने मुझे तुम्हारे और मेरे कपड़ों के लिए रुपये दिये। माँ को भी उसने रुपया दिया। वाह दीदी …ऐसे ही दो-चार साब रोज आते रहे तो हमारी तो लाइफ बन जाएगी। …दीदी…दीदी…धूप निकलने वाली है। मैं जाकर रास्ते पर कीलें फेंक आऊँ ?’’ तन्वी खामोश थी मानो उसकी कानों तक आवाज पहुंच तो रहे थे पर कानों में प्रवेश नहीं कर पा रहे थे, और बाहर ही मगज पीटकर वापस लौट जा रहे थे। बहन ने एक बार मानों चिल्लाते हुए ही कहा -दीदी…कहाँ खोई हो ? बोलो ना …कीलें फेंक आऊँ ना ? आज भी कोई साब आ जाएं तो…तन्वी चौंक पड़ी …आँ…। फिर रुककर बोली …हूँ… हाँ… जा फेंक आ। फिर ऊँघती-सी खड़ी हुई और पांव झटका, मानो रात की सारी खामोशी झाड़-झटककर उतार रही हो और चल पड़ी ….साथ ही उसकी जिंदगी की गाड़ी भी चल पड़ी यह ‘रियलाइज’ करती हुई कि दूसरों की गाड़ी रूकने में ही उसकी अपनी जिंदगी की रफ्तार है…।

 

डॉ. मीनाक्षी सिंह
गार्डेनरिच, कोलकाता

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