ध्रुवस्वामिनी में स्त्री-चिंतन |अनुराधा

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भारत में पितृसत्तात्मक समाज है। इस पितृसत्तात्मक समाज में धर्म, वर्ग, जाति और वर्ण के आधार पर स्त्री को दोयम दर्जे का प्राणी माना जाता रहा है इसलिए स्त्री असमानता का मूल स्त्रोत समाज ही है। भारतीय स्त्री के संदर्भ में यह बात प्रचलित है कि वह अपने भावों, विचारों, आकांक्षाओं व तर्कों से नहीं सोचती। पुरुष प्रधान समाज में परवरिश होने के कारण स्त्री हर क्षेत्र में पुरुष के पीछे ही चलती रहती है। स्त्री अपनी इच्छा, चाह और अधिकारों के प्रति सजग होने के बावजूद भी समझौतावादी दृष्टिकोण अपनाकर अस्तित्वहीन जीवन जीने के लिए अभिशप्त है। संसार का विस्तार स्त्री के शोषण और पुरुष के वर्चस्व पर आधारित है। जयशंकर प्रसाद की नाट्य-कृति ‘ध्रुवस्वामिनी’ (1933) की शुरुआत ही स्त्री-पुरुष के असंतुलित संबंधों की स्थिति से हुई है। यह प्रकटतः स्त्री के भौतिक व्यक्तित्व की एक वस्तुपरक तुलना है। अपने समय के अन्य लोगों की भांति प्रसाद भी शायद यही मानते थे कि प्रकृति ने पुरुष को सत्ता और अधिकार दिया है और स्त्री को कोमल व दुर्बल बनाया है। किंतु वर्तमान समय में यह मिथक टूट रहा है। आज स्त्रियाँ विभिन्न क्षेत्रों व खेलों में पुरुषों की अपेक्षा अधिक सफल हैं और देश को उन्नति की ओर ले जा रही हैं। जिससे यह ज्ञात होता है कि स्त्री को शारीरिक दक्षता में पुरुष से कमतर आंकना न्यायसंगत नहीं है। स्त्री की शारीरिक संरचना पुरुष से भिन्न है, किंतु हीन नहीं। वर्तमान समय में स्त्री-मुक्ति के लिए पुर सत्ता के वैचारिक विचारधारा को बदलना आवश्यक है, अपितु सत्ता के वर्चस्व को हथियाना नहीं। इस युग में पुरुष और स्त्री के संबंध में पारदर्शिता आयी है। किंतु आज भी स्त्री को केवल देह के रूप में  देखा जाता है। इसके साथ ही समाज ने माना है कि पुरुष सर्वशक्तिमान है।

मानव जीवन की गहन जटिलताओं को प्रसाद ने ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक में चित्रित किया है। इसमें उन्होंने इतिहास और कल्पना का सम्मिश्रण किया है। ध्रुवस्वामिनी में जिन ऐतिहासिक पात्रों को प्रसाद ने लिया है वे जीवंत चरित्र हैं जो जीवन के महान सत्य को उजागर करते हैं। ध्रुवस्वामिनी के सभी पात्रों का चित्रांकन सशक्त है। ध्रुवस्वामिनी में प्रसाद ने तीन प्रधान पात्रों के माध्यम से संघर्ष की भूमिका को प्रस्तुत किया है साथ ही कुछ गौण पात्रों को भी लिया है। इसमें चन्द्रगुप्त, रामगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, शकराज, कोमा, मंदाकिनी का चरित्र-चित्रण बहुत प्रभावशाली है। ध्रुवस्वामिनी का सशक्त, आकर्षक और विलक्षण व्यक्तित्व मन-मस्तिष्क पर छा जाता है। इस तरह चरित्र-चित्रण की दृष्टि से यह एक सशक्त नाटक है। प्रसाद का आशय ऐतिहासिक कथाओं के जरिए वर्तमान समस्याओं से रूबरू कराना है। इस नाटक में प्रसाद का मूल उद्देश्य नारी स्वातंत्र्य की चेतना को अभिव्यक्ति प्रदान करना है। आचार्य नन्ददुलारे के अनुसार- “ध्रुवस्वामिनी की कथा-वस्तु ऐतिहासिक है, परंतु उसके मूल में समस्या का समाधान प्रमुख तत्व है, किंतु यह समस्या नाटक नहीं है।”[1]

प्राचीन काल से परंपरा के नाम पर समाज ने स्त्री को रूढ़िवादी मानसिकता में जकड़ रखा है। समाज में परंपरा का निर्वहन करने वाली स्त्री को श्रेष्ठ माना जाता है। अर्थात् जो स्त्री पति को परमेश्वर माने और उसकी अवज्ञा न करें। समाज में स्त्री को केवल वस्तु के रूप में देखा जाता है। जिससे स्त्री का अपना अस्तित्व नहीं है। स्त्री जीवित प्राणी है, लेकिन समाज में स्त्री के लिए यही प्रतिमान है कि वह उपभोग की वस्तु है। ‘ध्रुवस्वामिनी’ की स्त्री पात्र की स्थिति लगभग ऐसी ही है। उसे उपहार की वस्तु के रूप में देकर पिता ने अपनी जान बचायी। राजा ने अपने नपुंसक पुत्र को ध्रुवस्वामिनी को सौंप दिया। जहाँ उसका विवाह नपुंसक से हो गया।

युद्ध से बचने के लिए पति रामगुप्त ने उसे शकराज के पास भेज दिया। ध्रुवस्वामिनी जब तक सब ओर से जकड़ी हुई थी, इन तमाम प्रतिकूल स्थितियों को सहती रही। कभी सर झुका कर, कभी प्रतिकार के साथ, लेकिन अनुकूल स्थिति आते ही उसमें साहस का संचार होता है और वह अपने को पुनर्परिभाषित करने की मांग करती है। ध्रुवस्वामिनी की अंतिम पंक्तियाँ हैं- ‘आज यह निर्णय हो जाना चाहिए कि मैं कौन हूँ।’ इस नाटक में स्त्री के जीवन गाथा के विभिन्न पक्षों को उजागर किया गया है। इस नाटक की कथावस्तु स्त्री की यथास्थिति से पुनर्परिभाषा तक की कहानी को बयाँ करता है। प्रसाद ने सभ्यता के मानचित्र पर स्त्री जीवन की अनेक विसंगतियों को प्रस्तुत किया है। अर्थात् वे पुरुष की उपभोगी प्रवृति को सहन नहीं करते। लेकिन कहीं- कहीं पुरुषसत्ता को स्वाभाविक मानते हैं। ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक सिर्फ भावों के धरातल पर ही घटित नहीं होती अपितु उसका रंगमंच इतिहास एक समृद्धि का दौर है। इसमें शास्त्र, प्रथाएं, समाज का वर्चस्व और राज्यसत्ता आदि सभी व्यवस्थाएँ हैं जो मानव जीवन का केंद्र व आवश्यकताएं हैं। इस व्यवस्था में स्त्री का अस्तित्व क्या है? उसपर परंपरावादी रूढ़ियों का वर्चस्व किस प्रकार से हैं? इस सवालों का जवाब ढूंढने के लिए प्रसाद कृत ‘ध्रुवस्वामिनी’ का कथानक है जो इतिहास और काल्पनिकता के सम्मिश्रण को समेटे हुए है। दूसरी ओर अंतर्द्वन्द्व और बाहरी संघर्ष के माध्यम से व्यक्तिगत मानवीय विशिष्टताओं की व्याख्या है। दरअसल ध्रुवस्वामिनी में स्त्री और पुरुष पात्रों में कुछ इतिहास से संबंधित लगते हैं तो कुछ कल्पना मात्र लगते हैं। प्रसाद के ‘ध्रुवस्वामिनी’ में स्त्री जीवन के ऐतिहासिक और सामाजिक पक्षों को दर्शाया गया है। अर्थात् उन्हें यह सिद्ध करना है कि स्त्री मुक्ति सिर्फ एक आधुनिक अवधारणा नहीं है। ध्रुवस्वामिनी में स्त्री-संघर्ष के साक्ष्य है जो समकालीन माने जानेवाले प्रश्नों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य देते हैं। नाटककार के अनुसार-“सीधा, तना हुआ, अपने प्रभुत्व की साकार, कठोरता, अभ्रभेदी, उन्मुक्त शिखर और इन क्षुद्र निरीह कोमल लताओं और पौधों को इसके चरण में लोटना ही चाहिए।”[2]

‘ध्रुवस्वामिनी’ में प्रेम के अलग-अलग पक्ष प्रस्तुत हैं। इसमें कई तरह का प्रेम और अनेक प्रेमी हैं। वस्तुतः प्रेम का कोई एक स्वरूप नहीं है। ध्रुवस्वामिनी और चंद्रगुप्त का प्रेम गुप्त था, जिसकी परतें धीरे-धीरे खुलती हैं। युद्ध के पश्चात् यह प्रेम विधिवत विवाह में बदल जाता है। शकराज और कोमा का प्रेम असफल है, जिसका अंत शकराज की मृत्यु से होता है। डॉ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने कहा है कि “इस विद्रोह के स्वरूप को और निखारने के लिए इसके तुलनात्मक विरोध को कोमा के शकराज के प्रति आदर्शवादी स्नेहभाव को प्रस्तुत किया गया है।”[3] शकराज सिर्फ कोमा को प्रेम नहीं करता बल्कि उसे ध्रुवस्वामिनी भी चाहिए। इस नाटक में स्त्री-पुरुष संबंध में प्रेम, पुनर्विवाह, कामुकता आदि जैसे पह्लूओं को बारीकी के साथ उद्घाटित किया गया है। इस नाटक में दि‍खाया गया है कि‍ ‘ध्रुवस्वामिनी’ जि‍स पुरूष (चंद्रगुप्‍त) से प्रेम करती है, उससे विवाह नहीं कर पाती और जि‍ससे(रामगुप्‍त) उसका वि‍वाह हुआ है, उससे वह प्रेम नहीं करती। जाहिर है केवल विवाह ही स्त्री-पुरुष संबंध का एक मात्र रूप नहीं है, यद्यपि विवाह उसका सर्वोत्तम परिपाक माना जाता है। किंतु भारतीय संस्कृति में विवाह की अपनी विशिष्टता है। यही कारण है कि चन्द्रगुप्त तब तक अपना हृदय नहीं खोलता, जब तक ध्रुवस्वामिनी स्वतन्त्र नहीं हो जाती। ‘ध्रुवस्वामिनी’ भी विवाह संस्कार की मर्यादा का पालन करती है। विवाह और प्रेम की विडंबना देखना हो तो कोमा की त्रासदी पर गौर करना होगा। ध्रुवस्वामिनी अपने पति के मृत्यु पर मुक्त होती है। किंतु कोमा को शकराज जैसे व्यक्ति के लिए अपना जीवन विसर्जित करना पड़ता है जो उसके ह्रदय से उतर चुका था। पुरूषों की प्रभुता तथा प्रेम में फंसकर स्‍त्रि‍यों को हमेशा निराशा, उत्‍पीड़न और उपेक्षा ही मिलती है।

इस नाटक में पुरूष सत्‍तात्‍मक समाज के शोषण के प्रति नारी का विद्रोही स्‍वर सुनाई पड़ता है। वैसे प्रताड़ित स्‍त्री की अवस्‍था का चि‍त्रण इस नाटक में मुख्‍य है परन्‍तु नारी-स्‍वतंत्रता के भाव से परिपूर्ण आधुनि‍क चेतना के कारण ही इसमें पहली बार ‘ध्रुवस्वामिनी’ प्रति‍क्रि‍या करती है। ध्रुवस्वामिनी रामगुप्त को स्‍पष्‍ट रूप से कह देती है- “पुरूषों ने स्त्रियों को अपनी पशु-संपत्‍ति‍ समझकर उन पर अत्‍याचार करने का अभ्‍यास बना लि‍या है, वह मेरे साथ नहीं चल सकता।”[4] इस नाटक में कोमा द्वारा प्रेम को परिभाषित किया गया है। कोमा ध्रुवस्वामिनी से कहती है, “रानी, तुम भी स्त्री हो, क्या स्त्री की व्यथा नहीं समझोगी? आज तुम्हारी विजय का अंधकार तुम्हारे शाश्वत स्त्रीत्व को ढक ले, किंतु सबके जीवन में एक बार प्रेम की दिपावली जलती है। जली होगी अवश्य। तुम्हारे भी जीवन में वह आलोक का महोत्सव आया होगा, जिसमें ह्रदय ह्रदय को पहचानने का प्रयत्न करता है, उदार बनता है और सर्वस्व दान करने का उत्साह रखता है। मुझे शकराज का शव चाहिए।”[5] ध्रुवस्वामिनी से शव लेकर वह मिहिरदेव के साथ चली जाती है किंतु रस्ते में रामगुप्त के सैनिक उसकी हत्या कर देते हैं। इस नाटक में ध्रुवस्वामिनी से बेहतर प्रेम करना और उसके लिए त्याग करना शायद ही अन्य कोई पात्र कर सकता था। प्रसाद की ध्रुवस्वामिनी प्रेम के अंतर्सघर्ष और विवाह की मर्यादा, इन दोनों पाटों के बीच पिसती रहती है। इसके विपरीत कोमा का प्रेम उसकी आँखों के सामने कुम्हलाने लगता है। वह अपने प्रेमी की वास्तविकता से अनभिज्ञ है। या कह सकते हैं कि जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो उसकी एक खास छवि हमारे हृदय में होती है जो सभी अच्छाई- बुराई को दरकिनार कर देती है। किंतु कभी यह छवि टूट जाने पर भी कुछ लोग प्रेम-पात्र के साथ बंधे रहना चाहते हैं। लेकिन कोमा के व्यक्तित्व को प्रेम ने पूर्ण किया है, उसे दास नहीं बनाया है। इसलिए वह शकराज के प्रेम को ठुकरा देती है, “प्रेम का नाम न लो। वह एक पीड़ा थी, जो छूट गई। उसकी कसक भी धीरे-धीरे दूर हो जाएगी। राजा, मैं तुम्हें प्यार नहीं करती। मैं तो दर्प में दीप्त तुम्हारी महत्वमयी पुरुष-मूर्ति की पुजारिन थी, जिसमें पृथ्वी पर अपने पैरों से खड़े रहने के दृढ़ता थी। इस स्वार्थ-मलिन कलुष से भरी मूर्ति से मेरा परिचय नहीं।”[6] लेकिन प्रेम की विडंबना ही यही है कि प्रेम-संबंधों में दुराव आने के बावजूद उसकी एक धुंधली रौशनी जीवन में बनी रहती है। प्रेम में समपर्ण और त्याग होता है। कोमा का प्रेम भी शकराज के प्रति समर्पण और त्याग है इसलिए शकराज के तिरस्कार के बाद भी उसकी मृत्यु होने पर कोमा शव माँगने ध्रुवस्वामिनी के पास पहुँच जाती है।

रामगुप्त को ध्रुवस्वामिनी से प्रेम नहीं है बल्कि उसके प्रति स्वामित्व का भाव रखता है। विवाह के बाद एक बार भी उसने ध्रुवस्वामिनी से शारीरिक संबंध नहीं बनाया। ध्रुवस्वामिनी जानती है कि रामगुप्त को विलासिनियों के साथ मदिरा में उन्मत के आनंद से अवकाश कहाँ है? रामगुप्त उसे अपनी विवाहिता मानकर उसपर अपना पूर्ण अधिकार रखता है। वह ध्रुवस्वामिनी से कहता है, “तुम उपहार की वस्तु हो। आज मैं तुम्हे किसी दूसरे को देना चाहता हूँ, इसमें तुम्हें क्यों आपत्ति हो?”[7] अर्थात् समाज में ऐसे अधिकतर पुरुष हैं जो स्त्री को मात्र वस्तु समझते हैं। रामगुप्त के जैसे ही शकराज को भी स्त्री केवल उपभोग व मनोरंजन की वस्तु लगती है। कोमा पूछती है, “तो क्या आपकी दुश्चिंताओं में मेरा भाग नहीं? मुझे उससे अलग रखने से क्या वह परिस्थिति कुछ सरल हो रही है?”[8] गौर करने की बात यह है कि स्त्री का हरण या अपहरण सामाजिक मान-अपमान का पैमाना बन गया है। यदि युद्ध होते है तो स्वयं को बचाने के लिए पुरुष परिवार की स्त्रियों को भेंट स्वरूप दे देते थे या स्त्रियाँ का हरण कर लिया जाता था। अर्थात् स्त्री को समाज के प्रत्येक युद्ध में अपने अस्तित्व की आहुति देनी पड़ती है।

प्रसाद ‘ध्रुवस्वामिनी’ में प्रेम की अवधारणा के साथ आनंद और वेदना का गहरा आख्यान करते हैं, लेकिन विवाह की परंपरागत व्यवस्था की जटिलताओं में उलझ कर तोड़ नहीं पाते। वह विवाह संस्था को भारतीय परिप्रेक्ष्य में सही मानते हैं। लेकिन यदि विवाह त्रासदी का रूप धारण का ले तो प्रसाद उससे मुक्ति पर भी बल देते हैं। ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक में इसी नारी मुक्ति प्रमाण निहित है। शकराज युद्ध में मारा जाता है और ऐसी स्थिति में भी ध्रुवस्वामिनी विवाहेतर संबंध और विवाह मुक्ति के द्वंद्व में फंसी हुई है। वह चंद्रगुप्त का वरण कर सकती है, किंतु उसे अपने प्रेम के झुकाव के प्रति गहरा संदेह होता है। वह मंदाकिनी से कहती है, “दुर्ग की विजय मेरी सफलता है या मेरा दुर्भाग्य, इसे मैं नहीं समझ सकी हूँ। राजा से मैं सामना करना नहीं चाहती। पृथ्वीतल से जैसे एक साकार घृणा निकल कर मुझे अपने पीछे लौटने का संकेत कर रही है, क्यों, क्या यह मेरे मन का कलुष है? क्या मैं मानसिक पाप कर रही हूँ?”[9] ध्रुवस्‍वामि‍नी और चंद्रगुप्‍त का पुनर्लग्‍न प्रसाद की प्रगति‍शीलता है क्‍योंकि‍ पौरूष के बल पर स्त्री को दासी माननेवाले रामगुप्‍त की मृत्यु के बाद वह अपनी इच्‍छा से चंद्रगुप्‍त का वरण करती है। डॉ. ओझा के अनुसार- “ध्रुवस्वामिनी नाटक का उद्देश्य स्त्री के पुनर्विवाह की समस्या को प्रकाश में लाना है।”[10] इस नाटक में मंदाकिनी जैसे पात्रों की सृष्‍टि‍ की गई है जो जड़ शास्‍त्र के खि‍लाफ आवाज उठाती है कि‍ “जिन स्त्रियों को धर्म-बंधन में बांधकर, उनकी सम्मति के बिना आप उनका सब अधिकार छीन लेते है, तब क्या धर्म के पास कोई प्रतिकार, कोई संरक्षण नहीं रख छोड़ते, जिससे वे स्त्रियाँ अपनी आपत्ति में अवलम्ब मांग सके।”[11] प्रसाद ने इस नाटक में स्त्री की विभिन्न समस्‍याओं को उठाया है किंतु इन समस्याओं को भारतीय चिंतन और परंपरा के आधार पर ही ढूँढने का प्रयास कि‍या है।

इस नाटक की कथावस्तु स्त्री संघर्ष पर आधारित है और स्त्री-संघर्ष की समाप्ति पर ही अंत दिखाया गया है। अर्थात् ध्रुवस्वामिनी की कथा भी ध्रुवस्वामिनी के संघर्ष से विकसित हुई है और उसके समापन के साथ ही समाप्त हुई है। ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक में अतिप्राकृतिक, त्रासद जैसे विपदाओं का भी समावेश है जो संयोग और आकस्मिकता को भी महत्व देता है। ‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक में आधिकारिक कथा के अन्तःसूत्र प्रासंगिक कथा के साथ इस तरह जोड़े गए हैं कि वे दोनों एक हो गयी हैं। कोमा का प्रसंग ध्रुवस्वामिनी के मूल कथा सूत्र से अलग होते हुए भी उसका एक भाग बन गया है। दोनों कथाएँ नारी समस्या को लेकर चलती हैं। प्रसाद ने इस नाटक के माध्यम से एक ओर स्त्री-जीवन से जुड़ी समस्याओं पर विभिन रूपों में दृष्टिपात किया है तो दूसरी ओर गुप्तकालीन इतिहास के उन धुंधले पृष्ठों को भी सामने लाने का प्रयत्न किया है जिसके बारे में अधिकांश इतिहासकार अनभिज्ञ हैं। प्रसाद के ‘ध्रुवस्वामिनी’ में अयोग्य शासक की व्यवस्था पर अंकुश, राष्ट्र सम्मान की भावना, अक्षम और दोषी शासक को दण्डित करने के भाव निहित हैं। लेकिन इसका मूल उद्देश्य स्त्री मुक्ति और अस्मिता है। वर्तमान समय में स्त्री मुक्ति की जो बात कही जाती है प्रसाद ने उसे वर्षों पहले अनुभव कर लिया था और अपने नाटक में उसकी अभिव्यक्ति भी की है। प्रसाद ने अपने इस नाटक में नारी के अस्‍ति‍त्‍व, अधि‍कार, पुनर्विवाह की समस्‍या को उठाया है। अतः प्रसाद का नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ समाज में स्त्री चिंतन के विभिन्न दृष्टिकोणों को समग्रता में लिए हुए ऐतिहासिक व काल्पनिक कृति है।

निष्कर्षतः ध्रुवस्वामिनी में इसी ओर संकेत है कि स्त्री की मुक्ति तभी संभव है, जब व्यवस्था में परिवर्तन हो। नयी व्यवस्था में नयी नैतिकता और विधिशास्त्र को लाया जाये। तभी स्त्री की मुक्ति और अस्तित्व में नया आयाम आ सकेगा। नारी मुक्ति से जुड़ा एक पहलू यह भी है कि क्या विवाह ही स्त्री के जीवन का लक्ष्य है? क्या स्त्री की नियति एक पुरुष से दूसरे पुरुष तक भटकने की है? इन सभी सवालों के जवाब ‘ध्रुवस्वामिनी’ ने दिया है और यह प्रतिपादित करती है कि पुरुष यदि गौरव से नष्ट और आचरण से पतित हो, तो वह स्त्री के योग्य नहीं है। रामगुप्त से मुक्त हो कर ध्रुवस्वामिनी अकेले जीवन यापन कर सकती है लेकिन वह किसी से प्रेम करती है। प्रेम के लिए आज तक त्याग देने के बाद उसे आखिरकार चन्द्रगुप्त का प्रेम मिल गया है। ‘ध्रुवस्वामिनी’ की नाटकीय घटनाएँ इतिहास के जिस काल में घटती हैं, वहां शायद प्रसाद के प्रश्नों ने उस व्यवस्था को हिला दिया होगा।

संदर्भ ग्रन्थ

[1] आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी, आधुनिक साहित्य, पृष्ठ सं. 250
[2] जयशंकर प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी, पृष्ठ सं. 12
[3] डॉ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, हिंदी नाटक पर पाश्चात्य प्रभाव, पृष्ठ सं. 259
[4] जयशंकर प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी, पृष्ठ सं. 27
[5] जयशंकर प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी, पृष्ठ सं. 53
[6] जयशंकर प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी, पृष्ठ सं. 46
[7] जयशंकर प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी, पृष्ठ सं. 27
[8] जयशंकर प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी, पृष्ठ सं. 38
[9] जयशंकर प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी, पृष्ठ सं. 55
[10] डॉ. दशरथ ओझा, हिंदी नाटक: उद्भव एवं विकास, पृष्ठ सं. 252
[11] जयशंकर प्रसाद, ध्रुवस्वामिनी, पृष्ठ सं. 52

 

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