एक तस्वीर | कुँवर प्रतीक सिंह

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…आज सबसे ज़्यादा याद आ रहे हो तुम। इसलिए नहीं कि आज मेरी जिंदगी का बहुत बड़ा दिन है, बल्कि इसलिए कि इस वक्त ऑडिटोरियम में तुम्हें मेरा हाथ थामे मेरे पास होना ही चाहिए था। ‘तुम्हें तो पता था न कि मेरे होने के अपने कुछ क़ायदे हैं!’ वो क़ायदे जिनका आँखों-आँखों में मुद्दतों पहले ही इक़रारनामा लिख दिया था तुमने। याद करो उस मुस्कान को जिसने मेरा बनने पर दस्तख़त भी किए थे और जिसे सूखते गले, फड़कती धड़कनों और झुकी नज़रों के साथ क़ुबूल भी किया था मैंने।

अब इस तरह तुम भीड़ में बेगाना बनाकर तो नहीं छोड़ सकते मुझे। देखो! एहसास में तुम्हारा हाथ थामे कितनी दूर चली आई हूँ मैं कि थोड़ी देर में दुनिया-जहान के लोग तुम्हारे सपने और मेरी मेहनत पर तालियाँ बजाकर हौसलाअफ़जाई करने वाले हैं।

मंच की ओर ‎मेरे चेहरे पर तेज रोशनी है और दिल में घुप्प अंधेरा। जानती हूँ तुम्हें नहीं आना… अब कभी नहीं आना… पर मैं तो तुम पर अटकी हुई हूँ और क्यों न अटकूँ? तुम थे तो ख़ुद से परेशानी नहीं थी मुझको। अपनी तस्वीर से कोई शिक़ायत नहीं थी मुझको। तुम से बेहतर यादों में कोई क़ैद नहीं करता था मुझे। तुम होते तो कम-अस-कम अच्छी तस्वीर तो उतार ही लेते मेरी। जिसे फ्रेम में ढाल तारीख़ की कील में फंसा, ड्राइंग रूम की दीवार पर लगाकर ताउम्र की याद बना लेते।

‎ यहाँ कोई ऐसा नहीं है जो मेरी तस्वीर खींच सके पर फिर भी एक लड़की से मदद माँग कर तुम जैसी तस्वीर खींचने को कहा। पता नहीं मेरी उस तस्वीर में कितना तुम नजर आते हो पर उसको तुम्हारी तस्वीर के सामने वाली दीवार पर टाँग दिया है। जिससे मेरी जिंदगी में अब दो दीवारों के मायने गहरे हो चले हैं हमेशा-हमेशा के लिए।

 

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