प्रसंग (संपादकीय) | शैलेंद्र कुमार सिंह

2
869

“निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले”
– फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फ़ैज़ की ये पंक्तियाँ ‘ख़ामोशी की संस्कृति’ को तोड़ने का आह्वान करती हैं। यथास्थितिवाद के माहौल से ऊपर उठकर कुछ सकारात्मक बोलने के लिए प्रेरित करती हैं। चलिए कुछ प्रासंगिक हलचलों की विकृतियों पर बात कर लेते हैं। हाल के समय में दो मुद्दे भारत में तेजी से उभरे हैं। ऐसा नहीं है कि ये पहली बार सामने आ रहे हैं, इनसे हम सभी अच्छे से परिचित हैं; ‘आरक्षण’ और ‘महिला सुरक्षा’। और ऐसा भी नहीं है कि भारत की वर्तमान स्थिति में सिर्फ यही दो मुद्दे बचे हैं, और भी हैं लेकिन अभी बात सिर्फ इन्हीं दो मुद्दों पर। इसका कारण बस इतना है कि इन दोनों मुद्दों को हमेशा से इनके विकृत रूप में देखा जाता रहा है, एक संतुलित नज़रिये से बहुत कम लोग देख पाते हैं। मैं इन दोनों मुद्दों पर कोई विश्लेषणात्मक प्रवचन नहीं देने जा रहा, बस इतना कहना चाहता हूँ कि कुछ भी बोलने से पहले एक संतुलित नज़रिया बना लें, क्योंकि ‘कुछ भी’ बोलना जितना सहज है उससे कहीं ज़्यादा कठिन है उसकी वजह से बिगड़ी हुई स्थिति को संभालना। इन दोनों मुद्दों को इनके विकृत रूप में पहुँचाने का ज़िम्मेदार सोशल मीडिया भी है। ‘लाइक’, ‘शेयर’, ‘कॉमेंट’ और ‘सबस्क्राइब’ की परंपरा ने इन मुद्दों को वीभत्सकारी हास्यास्पद रूप में प्रस्तुत किया है, जिसकी प्रामाणिकता की जाँच किए बिना लोग ‘फॉरवर्ड’ करते रहे और नफरत की आग में जलते रहे।

अभी बात करते हैं आरक्षण पर। आपने आरक्षण से जुड़ा सोशल मीडिया का एक ‘वायरल जुमला’ सुना/देखा/पढ़ा ही होगा, “आप अपने बच्चों का इलाज़ किससे करवाएँगे, एक जनरल डॉक्टर से या आरक्षण वाले डॉक्टर से।” यक़ीन मानिए आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों या सामाजिक मान्यताओं की हत्या करने में जितनी सफलता इस ‘वायरल’ ने पाई उतनी किसी ने नहीं। विकृति का रूप इतना वीभत्सकारी है कि ‘डॉक्टर’ जिसकी कोई जाति नहीं होती वह ‘आरक्षण रूपी नई जातिगत तराजू’ से तौला जा रहा है। मतलब  ‘डॉक्टर’ अब डॉक्टर  रहा ही नहीं! इसका दुष्परिणाम क्या होगा, कभी सोचा है? यही कि कोई भी मरीज़ इस ‘वायरल’ के पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर डॉक्टर के पास जाएगा तो उसकी एंटीबॉडीज गलत दिशा में सक्रिय होंगी और इलाज़ प्रभावी नहीं होगा, फलतः इस ‘वायरल’ को सफलता मिलेगी और ईर्ष्या, द्वेष, घृणा अपने चरम स्तर पर पहुँच जाएँगे। आरक्षण के मद्देनजर दूसरी बात यह  महत्वपूर्ण है कि आरक्षण किसी संस्थान में ‘केवल प्रवेश’ का माध्यम है, अवसर की समानता हेतु। संस्थान  में प्रवेश के बाद व्यक्ति की योग्यता का जो संस्थानिक मूल्यांकन होता है उसमें आरक्षण का कोई योगदान नहीं होता है। उदाहरण स्वरूप- एक प्रतिभागी को अगर किसी संस्थान में आरक्षण के आधार पर प्रवेश मिलता है तो सिर्फ ‘प्रवेश प्रक्रिया’ में उसे आरक्षण का फायदा मिलता है, लेकिन अकादमिक सत्रों के मूल्यांकन में उसे आरक्षण का कोई फायदा नहीं मिलता है, वह जो भी अंक प्राप्त करता है वह उसकी अकादमिक सत्रों के दौरान की गयी मेहनत का परिणाम होता है। मसलन एक डॉक्टर जो कि प्रवेश आरक्षण के आधार पर पाया था, वह अकादमिक सत्र और प्रशिक्षण के दौरान जो सफलता पाता है, वह उसकी अपनी मेहनत से प्राप्त शुद्ध योग्यता होती है।

एक और बात जो सही होते हुए भी गलत हो जाती है वह यह कि ‘जाति आधारित आरक्षण को ख़त्म करने की मांग रोष भरे लहज़े में करना’। यह मांग उचित है लेकिन भारत में जितना स्थायित्व ‘जाति’ को प्राप्त है उतना किसी अन्य आधार को नहीं। ऐसे में किसी अन्य आधार को यह स्थायित्व प्रदान करके ही आगे बढ़ा जा सकता है। बात आर्थिक आधार की चल रही है जो उचित भी है, लेकिन आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने के लिए एक बेहद सशक्त और पारदर्शी व्यवस्था बनाने की जरूरत होगी। और भारत के हर सशक्त पारदर्शी व्यवस्था में सेंध कैसी लगती है यह आप अच्छे से जानते हैं, कम से कम जाति व्यवस्था में सेंध तो नहीं लग पाती। लगता है मैं विषय से बहक गया, वापस आता हूँ। ‘आरंभ परिवार’ के संपादक सदस्य रवि कृष्ण कटियार जातिगत आरक्षण की विकृति वाले मुद्दे पर कहते हैं कि “जाति आधारित आरक्षण को ख़त्म करने की माँग का सीधा मतलब यही निकलता है कि आप ‘जातिगत आरक्षण’ को ख़त्म करना चाहते हैं ‘जाति व्यवस्था’ को नहीं। अगर आप इतने ही प्रगतिशील हैं तो ‘जाति व्यवस्था’ को ही ख़त्म करने की माँग करो ना, फिर देखो कौन-सा समुदाय आपका साथ नहीं देता है! यक़ीन मानिए आप जिनका विरोध कर रहे हैं वे भी आपके साथ आ जाएँगे। अगर आपको ‘जातिगत आधार’ अर्थात् ‘जाति’ से इतनी ही दिक्कत है तो ‘जाति व्यवस्था’ को ही ख़त्म करने की मुहिम करनी चाहिए, क्योंकि ‘जाति व्यवस्था’ के ख़त्म होने से ‘जाति आधारित आरक्षण’ स्वतः ख़त्म हो जाएगा। सलाम  करता हूँ केरल के उन डेढ़ लाख बच्चों को जिन्होंने अपने हाईस्कूल के रजिस्ट्रेशन फॉर्म में जाति/धर्म का उल्लेख ही नहीं किया।” इस पूरे वक्तव्य  का मतलब बस इतना है कि संवेदनशील मुद्दों पर बहस के दौरान खुद को सतर्क रखें और अफ़वाहों की पहुँच से बाहर भी। समाज की सुरक्षा और विकास आपके ही हाथों में है, इसलिए आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वरूप क्या होगा, यह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

अब बात महिला सुरक्षा के संदर्भ में। इस संदर्भ में अफ़वाहें अपेक्षाकृत कम, राजनीति ज़्यादा है। मैं सिर्फ राजनीतिक इस्तेमाल के पहलू पर सामाजिक नजरिए से बोलूँगा क्योंकि इसके चक्कर में अपराधी की मूल ‘आपराधिक पहचान’ खो जाती है और वह एक राजनीतिक मोहरा बन जाता है। चाहे ‘उन्नाव कांड’ हो या ‘कठुआ कांड’, इनके अपराधियों को सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक पहचान देने की कोशिश की जा रही है (मैं यह बिलकुल नहीं कह रहा कि मुख्य अपराधी राजनीतिक व्यक्ति नहीं है, वह है और उस व्यक्ति से संबन्धित राजनीतिक दल पर प्रश्न भी उठना चाहिए तथा उस दल को नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए उस व्यक्ति को पार्टी से निष्काषित कर देना चाहिए। यह बात जब आम जनता कहती है तो उस दल की सत्ता का विरोध होता है, लेकिन यही बात जब अन्य दलों के राजनीतिक व्यक्ति कहते हैं तो उसमें राजनीति की बू आती है)।

मसलन इतने संवेदनशील मुद्दे पर शीर्ष प्रतिनिधित्व द्वारा त्वरित कार्यवाही/टिप्पणी न करना अन्य राजनीतिक दलों को राजनीति का मौका दे जाता और अपराधियों को एक राजनीतिक पहचान मिल जाती है। मैं किसी दल का पक्ष नहीं ले रहा और न ही विरोध कर रहा हूँ, बस इतना कह रहा हूँ कि एक अपराधी, एक अपराधी ही होता है, उसे राजनीतिक पहचान देने की कोशिश न करें। अगर आप उसे राजनीतिक पहचान देंगे तो उसका ‘आपराधिक व्यक्तित्व’ दब जाएगा ऐसे में अपराध की मंशा प्रबल हो सकती है, और ‘आपराधिक प्रवृत्तियों’ को राजनीतिक शह पाने की झलक मिलेगी जिससे ये ‘आपराधिक प्रवृत्तियाँ’ अपराध का इस्तेमाल राजनीतिक सीढ़ियाँ चढ़ने में कर सकती हैं। मसलन एक अपराधी आपके समाज में कहीं भी हो सकता है; उसके खिलाफ राजनीतिक नहीं सामाजिक बगावत करें, फिर उसके आपराधिक व्यक्तित्व को शह नहीं मिलेगी।

पीड़ित और अपराधी को राजनीतिक नजरिए से देखना मानवता की हत्या करने के समान है। ध्यान रहे कि पीड़ित ‘एक मासूम बच्ची/स्त्री’ है, वह हिन्दू/मुसलमान/दलित नहीं है और अपराधी एक ‘अपराधी’ ही है, वह भाजपाई/कॉंग्रेसी/सपाई आदि नहीं है। इस्तेमाल की इस घृणित संस्कृति में राजनीतिक मोहरा न बनें। स्त्री जाति के खिलाफ़ होने वाले इन आपराधों को कानून की कठोरता नहीं बल्कि ‘स्वस्थ सामाजिक मानसिकता का विकास’ ही रोक सकती है। हम अपने भावी पीढ़ियों में ‘स्वस्थ मानसिक विकास’ का बीज बोकर महिलाओं के प्रति परम्परागत समाज के दृष्टिकोण में बदलाव ला सकते हैं और उनके खिलाफ होने वाले अपराधों में कमी भी। स्वस्थ मानसिकता न होने पर ही दल विशेष के नेता महोदय बोलते हैं कि ‘जिस औरत के 3-4 बच्चे हों उसका कोई रेप कैसे कर सकता है?” अलग से कहने की कोई जरूरत नहीं है कि इस वक्तव्य से उनकी किस घृणित सोच का पता चलता है, साथ ही यह भी कि वह किस तरफ संकेत कर रहे हैं? मसलन यह एक राजनीतिक पुरुष कम बल्कि समाज में पनप रही संकीर्ण सामंतवादी पुरुष मानसिकता से ग्रसित पुरुष ज़्यादा है। यह एकमात्र उदाहरण नहीं है, ऐसे उदाहरण आप अपने चारों तरफ़ देख सकते हैं। अपराधियों को राजनीतिक पहचान देने से बचना चाहिए नहीं तो यही होगा कि नृशंस से नृशंस अपराधी के खिलाफ होने वाला विरोध/बहिष्कार पार्टी विशेष के खिलाफ होने वाला विरोध मात्र बनकर रह जाएगा। उदाहरण स्वरूप- अगर मैं ‘निर्भया कांड’ का नाम लेता हूँ तो आपको अपराधियों के चहरे/नाम याद आएँगे, और ठीक वहीं जब मैं ‘कठुआ कांड’ का नाम लेता हूँ तो आपको ‘भाजपा’ का चेहरा याद आएगा। आज भाजपा का चेहरा है, कल किसी और का होगा, परसों किसी और का; फिर अपराधी की मूल पहचान का क्या होगा…? मैं बस इतना चाहता हूँ कि अपराधियों की सामाजिक पहचान को राजनीतिक पहचान के पीछे छिपने न दें। खैर यह उतना आसान भी नहीं है, जितना मैं कह रहा हूँ।

ऐसे जघन्य अपराधों के विरोध स्वरूप होने वाले जन आंदोलनों को राजनीति से दूर रखा जा सकता है। ऐसे में जन आंदोलनों का स्वरूप भी राजनीतिक रूप धारण कर लेता है फलतः जिन माँगों को लेकर ये आंदोलन शुरू हुए होते हैं, वे माँगें पीछे छूट जाती हैं। यह ध्यान रखें कि राजनीतिक पार्टियों द्वारा की गयी रैलियाँ और आंदोलन कभी भी विशुद्ध जन आंदोलन नहीं होते, वे हमेशा अपने विपक्षी दल को निशाना बनाती हैं। दूसरी बात यह कि विशुद्ध जन आंदोलनों की शुरुआत हमेशा सामाजिक व्यक्तियों/ जन समूहों/ जनता द्वारा ही होती है, लेकिन बाद में इसका लाभ उठाने विभिन्न राजनीतिक दल आ जाते हैं और संवैधानिक सरकार के खिलाफ़ उठी आवाज़ पार्टी विशेष के खिलाफ़ उठी आवाज़ बनकर रह जाती है। हमें यहीं सजग रहना होगा और आम जनता को अपनी माँगों पर अड़े रहना चाहिए तथा जन आंदोलनों में राजनीतिक प्रवेश को लक्षित करते हुए अपने मुद्दों से भटकना नहीं चाहिए। मैंने ये बातें सिर्फ और सिर्फ सामाजिक-साहित्यिक नजरिए से लिखी हैं, इसे राजनीतिक रूप देने वाले भूल जाएँ कि उन्होंने कुछ पढ़ा भी है।

पत्रिका के इस अंक में मैंने संपादकीय अधिकार से कुछ कहानियों और कविताओं में जरूरी बदलाव किए हैं क्योंकि वे बेहद सपाट या कोरी कल्पनाएँ लग रही थीं। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा। आलोचनात्मक टिप्पणियों का स्वागत है।

-शैलेंद्र कुमार सिंह

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here