घुटन | अंजू निगम

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अपनी बालकनी से झाँकते नेहा ने पहली बार वैदेही को देखा। ट्रक से उतरते सामान पर उसकी नजर टिकी, उसके पति तबादले पर यहाँ आए लग रहे थे। आस-पास से आये होते तो ट्रक न करते, हाथ गाड़ी से ही काम चल जाता। सर्दियों के दिन थे। नेहा बालकनी में आती तो धूप के आखिरी कतरे को भी अपने में समेट लेना चाहती थी। यही वजह थी कि वो अभी तक बालकनी में अटकी थी। किसी की भी गृहस्थी का सामान उतरता-चढ़ता देखना नेहा को जाने क्यों शुरु से ही पसंद था! ऐसा कोई विशेष कारण न था, पर पसंद था तो पसंद था। सामान देख उनकी गृहस्थी के मापदंड बना लेती।

     उसके कुछ दिन बाद वैदेही को बालकनी से झांकते नेहा ने पहली बार देखा। आँखों पर मोटा चश्मा चढ़ा था पर चेहरे पर बहुत सौम्यता थी। वैदेही ने सर उठा देखा, पर उसके होठों पर हल्की-सी भी मुस्कान आयी हो; ऐसा नेहा को नहीं लगा। बातूनी नेहा को वैदेही बहुत सिमटी सी लगी। “मुझे क्या” सोच नेहा ने अपने कंधे झटक दिये।

उनकी कॉलोनी में  २०-२५ ब्लॉक बने थे। हर ब्लॉक में ८ फ्लैट। नेहा के ब्लॉक में तीन फ्लैट जाने कब से खाली पड़े थे। सामने फ्लैट में नया शादी-शुदा जोड़ा रहता था। जिन्हें अपने से परे दूनिया की कोई खबर ही न रहती थी। हाँ, सबसे नीचे फ्लैट में जो भाभी रहती थीं, वो बड़ी मिलनसार थीं। नेहा जब- तब उनके यहाँ हो लेती। पर भाभी का कभी भी उसके यहाँ न आना कभी-कभी उसे खल जाता।  भाभी भी क्या करतीं? बढ़ती उम्र ने उनके घुटनों पर असर दिखाना शुरू कर दिया था  और बिना मकसद तीन माले चढ़ नेहा के यहाँ जाना उनके बस का नहीं था।

   नेहा के बहुत इसरार करने पर भाभी न आतीं और उलाहना भरे स्वर में कहतीं कि नेहा का मन ही नहीं भाभी के पास बन आने का, नहीं तो नीचे के खाली फ्लैट के लिए अभी तक “अप्लाई” कर चुकी होती। बार-बार होते तबादलों और बांधते-खोलते सामान ने नेहा का मन उकता दिया था। इसलिए भाभी की उलाहना  नेहा को जरा न भाती।  इधर वैदेही का नीचे के फ्लैट में बन आना नेहा को अंदर से उत्साहित कर गया था।

इस बार की भाभी की चिरौरी नेहा को अदंर तक कचोटी। उसके बाद कुछ साबका ऐसा पड़ा कि नेहा का नीचे उतरना न हुआ। दो दिन तक जो नेहा का भाभी के घर जाना न हुआ तो तीसरे दिन उनका बुलावा आ गया। नेहा भरी बैठी थी इसलिए उसने नीचे उतर आने में असमथर्ता दिखाई, पर नेहा भी जानती थी कि गरज उसकी है भाभीजी की नहीं। नेहा की सोच अपने में ठीक भी थी क्योंकि रोज सुबह ११बजते न बजते भाभीजी के यहाँ सहेलियों की महफिल सज जाती। घर की दीवारें इतनी मोटी न थीं कि उनके घर से उठती ठहाकों की आवाज नेहा के कानों तक पहुँचने से रोक सकें। ऐसी कसमसाहट के कारण ही अक्सर उसे हथियार डाल देने पडते। ऐसी महफिल में पहुँचने के उतावलेपन में उसके हाथ जल्दी-जल्दी चलते। ११ बजते न बजते वो हाजिर हो जाती भाभी के यहाँ।

  खैर, यहाँ बात वैदेही की हो रही थी, सो भाभीजी ने खुब बुलावे भेजे वैदेही के लिए कि तनिक वो भी आ बैठे इन बैठकों पर। जानती नेहा भी थी कि अभी वैदेही का निकल पाना कितना कठिन होगा। पड़ोसी होने के नाते नेहा ने वैदेही के यहाँ चाय-नाश्ता भिजवा दिया था,  पर उससे आगे उनके बीच कोई संवाद नहीं हुआ था। चाय-नाश्ते के बरतन वापस करने में भी वैदेही का आना न हुआ था। नहीं तो नेहा तभी थोड़ा घेर लेती वैदेही को। वैदेही को अभी जुम्मा-जुम्मा एक महीना भी तो नहीं हुआ था आये हुए। सामान जमाने और दूध, फल, सब्जी, गृहस्थी का और सामान जुटा लेने में वक्त तो लगता ही है न, भाभी के बुलावे पर वैदेही ने बहुत नरमाई से वक्त न मिल पाने की मजबूरी जाहिर की।

    जब भाभी ने ये बात नेहा को बतायी कि दो-तीन बार गुहार लगाने पर भी वैदेही को तनिक समय न मिला उन लोगों से मिल लेने का, तो नेहा को भाभीजी पर ही क्रोध आया। क्या तबादले के बाद दूसरी जगह से आ नये सिरे से सब कुछ जमाने का दर्द भाभी ने नहीं झेला? ये तो हम सबका साझा दर्द था। इससे परे भाभी कहाँ हो गयी?  और फिर वैदेही पर अभी दो बच्चों के सारे काम की भी जिम्मेदारी है। भाभी का क्या, दोनों बच्चे बाहर, आदमी ऑफिस में; सारा दिन सत्तारी ही तो बनी रहती हैं। प्रकट में कुछ न कहा नेहा ने, पर भीतर ऐसे तिक्त भाव उभर आए नेहा के। नेहा ने तबादले से होने वाली टूटन को दिल से महसूस किया था। जब पैर जमने लगते और दोस्तो की फेहरिस्त लंबी होने लगती, तब वहाँ से उखड़ किसी दूसरी जगह बस जाने का आदेश आ जाता!

     वैदेही से उसका मिलना कई दिन तक न हो पाया। हाँलांकि वो अदंर ही अदंर कसमसा रही थी उसके यहाँ हो लेने को। एक दिन उसने सोच ही लिया आज तो धावा बोल ही देगी वैदेही के यहाँ। भई बुलाया है, मिलने ऐसे ही थोड़े न पहुँच रही हूँ!

     वैदेही शायद कपड़े धोने में उलझी थी। दरवाजा खोलने पर नेहा को एक बार शक हुआ कि शायद वो गलत घर आ गयी, पर आँखों पर चढ़े मोटे चश्मे ने ये बता दिया कि वो सही पते पर सही इंसान के सामने खड़ी है। वैदेही एकबारगी उसे देख सकपका ही गयी, शायद यूँ किसी के चले आने की वो आदी न थी। अंदर का हाल भी कोई खास खुशगवार न था। जल्दी-जल्दी उसने सोफे पर फैले कपड़ों की गठरी बनाई और पीछे किसी कमरे में टिका आई। फर्नीचर के नाम पर सोफा सेट, दीवान और एक लम्बी मेज जो बहुत कुछ टिकाने के काम आती होगी। एक तरफ कपड़ों का ढेर देख यही लगा कि सारे सामान को समेट इस्तरी भी इसी में निपटा ली जाती होगी। खानाबदोश जीवन की एक और मिसाल। नेहा ने मन ही मन ये सब देख वैदेही और उसकी गृहस्थी को तोला। काम चल ही जाएगा इससे दोस्ती कर।

   वैदेही थोड़ी देर में पानी का गिलास ले आयी। अपने को भी यथासभंव ठीक-ठाक करके! जैसा कि कहना बनता था; नेहा ने भी उछाल दिये ये शब्द,”अरे! गलत वक्त आ गई। आपके काम का हरजा होगा।”

वैदेही भी उसी अंदाज में बोली” अरे काम तो सारे दिन के हैं। थोड़ी देर ही सही।”

वैदेही का ये बोलना नेहा को इत्मीनान दे गये कि चलो एक-आध घंटे तो निकल ही गये समझो। वो सोफे में और भीतर तक धंस गयी।

   वैदेही का धीरे-धीरे बात करना और उसकी बातों की आत्मीयता ने नेहा का मन हर लिया। शायद शुरुआती मिलन का लिहाज हो! नेहा ने जो वाकपटुता भाभी से सीख ली थी उसका आज सही इस्तेमाल किया। इतनी देर की बातों के निचोड़ से उसे इतना पता लगा कि वे जम्मु से तबादला होने पर यहाँ आये हैं। एक बेटा और एक बेटी है, जो एक साल की छोट- बड़ाई के बावजूद एक ही साल, एक ही कक्षा और एक ही सेक्शन में पढ़ रहे थे। उच्च शिक्षा और अच्छी कोचिंग के कारण ही यहाँ का तबादला लिया, वरना वहाँ भी ठीक-ठाक ही बसे थे। मूलतः उसकी ससुराल दिल्ली की थी और मायका हरियाणा के किसी छोटे कस्बे का।

  चाय नाश्ते का दौर वैदेही ने जल्दी निपटा लिया था क्योंकि घड़ी की सुईयाँ जैसे-जैसे आगे बढ़ती जा रही थीं वैदेही की कसमसाहट भी बढ़ रही थी। बार-बार अंदर जा कुछ काम निपटा लेना नेहा के लिए “अल्टीमेटम” भी था कि “बेटा अब उठ ही लो, आज काफी बाते खोद लीं तुमने!” नेहा ने उठ लेने से पहले वैदेही को जल्द अपने घर चले आने को राजी कर ही लिया। आज जो नेहा का भाभी के घर जाना न हो पाया तो उसका नेहा को बहुत मलाल भी न रहा। गपियाने को एक और साथी जो मिल गया था उसे।

उस दिन के बाद से वैदेही और नेहा के बीच का अबोला जो खत्म हुआ तो वैदेही भी उससे थोड़ा खुल सी गयी। बालकनी में खड़ी उसके अधरों पर अब नेहा को देख एक स्निग्ध मुस्कान तैर आती।

       भाभी को दोनों के मिलने की खबर न लगी हो ऐसा हो नहीं सकता था। आस-पास की सारी कामवालियों से भाभीजी की दुआ-सलाम होती थी सो कोई बात उनके नाक के नीचे हो और उन्हें खबर न हो ऐसा हो नहीं सकता था।

        इस बार जब नेहा भाभी के वहाँ जाने को हुई तो वैदेही को भी संग कर लिया। वैदेही इस पर ही राजी हुई  कि उसे एक दिन पहले ही कहीं चल लेने का पता हो, तो वो सारे काम उसी मुताबिक निपटा ले। उन दोनों के साथ आने पर भी भाभी ने कोई तंज नहीं कसा। भाभी की यही तो खूबी थी कि वो वक्त देख लगाम कसती थीं। वैदेही का सबसे मिलना हुआ। अपने खोल से ज्यादा बाहर भी न निकली, पर नेहा को अहसास हो रहा था, वैदेही की खुशी का। फटाफट वैदेही के यहाँ काम वाली का इंतजाम भी भाभी ने करवा दिया। घर बैठे दूसरों के घर का हाल लेने का इससे सुगम तरीका और क्या हो सकता था?

    कुछ ही महीनों के अन्तर ने दोनों को और करीब ला दिया। शायद इसलिए भी कि दोनों हमउम्र ही थीं। कुछ महीनों की छोट-बड़ाई हो सकती थी! वैदेही ने अपने दिल की कुछ परतें खोली तो उसे पता लगा कि यूँ तो पैसो की किल्लत नहीं है, पर तनख्वाह का ज्यादा हिस्सा किसी न किसी रुप में उसके ससुराल पहुँच जाता है। बच्चों की कुछ बड़ी जरुरतों को पूरा करने के लिए महीनों अपने पापा का मुँह जोहना पड़ता है।  ये सुन नेहा के भीतर तक कुछ दरक गया! वैदेही की सारी बात उसने एक तमाशबीन की तरह नहीं बल्कि एक सच्चे हमदर्द की तरह सुनी।

नेहा को अहसास तो था कि वैदेही कुछ अकेली-सी रहती है। घर का काम खत्म करके वो अक्सर बालकनी में आ थम लेती। मानो अकेले में अपने को तलाश रही हो! उसके पति को कभी उससे गपिया लेते हुए उसने नहीं देखा। वैदेही और नेहा इतने करीब तो हो गये थे कि अपना बरसों का उबाल खाता मन नेहा के सामने जब खोलती तो कई बार नेहा भी सिहर उठती। कोई आदमी परिवार में रहते भी अपने बीबी-बच्चों से इतना विलग कैसे रह सकता है?

  वैदेही ने ही एक बार बताया था कि पैसे बचाने के चक्कर में ही बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिला दिलवाया है। वो तो बस मन मसोस कर ही रह गयी, आज के माहौल में अपनी पटरी बिठाने को जो अग्रेंजी भाषा की पुख्ता जमीन होनी चाहिए थी; उसका अभाव था। आगे बड़ी कपंनियो में “interview” के लिए अग्रेंजी की स्तरी समझ कितनी काम आती?

      एक दिन सुबह ही वैदेही की बेटी घबराई हुई आई, ये बताने कि मम्मी के पेट में भयानक दर्द उठ रहा है और पापा भी घर पर नहीं हैं। उन दोनों का पहला पेपर है, वो भी बोर्ड का। बेटी की नन्हीं बुद्धि ये सोच ही नहीं पा रही थी कि कदम कहाँ बढ़ाएँ? नेहा भागते हुए नीचे गयी। तब तक नीचे वाली भाभी और वैदेही के सामने वाली भाभी आ चुकी थीं, दोनों  दर्द से तड़पती वैदेही को संभाल रहे थीं। दोनों बच्चे माँ की हालात देख और पेपर के छूट जाने के भवंर के बीच डूब-उतर रहे थे नेहा ने दोनों बच्चों से अपना पेपर दे आने को कहा और ढांढस बढ़ाया कि माँ की ओर से चिंता छोड़ अपना पेपर दे आएँ। वैदेही को दोनों भाभियों और भाभी के पति के साथ अस्पताल रवाना किया और खुद उन बच्चों के लिए कुछ बना देने के लिए अपनी रसोई की ओर बढ़ गयी। बच्चे जिद पकड़े रहे कि ऐसे माहौल में हमारे हलक के नीचे अन्न का एक  दाना न जा पाएगा। नेहा ने कुछ खिला कर ही उन्हें रवाना किया।

    उधर वैदेही के सारे टेस्ट हो गये और रिपोर्ट शाम तक आ जाने की बात हुई। जब तक वैदेही वापस आई नेहा दोनों बच्चों को स्कूल के लिए रवाना कर चुकी थी। इतने दर्द में भी बस उसे बच्चों की ही चिंता रही।

    शाम को आयी रिपोर्ट यही बता रही थी कि वैदेही के “gall bladder” में पथरी है। आगे के लिए डॉक्टर ने ऑपरेशन करवा लेने की ही सलाह दी। शाम तक वैदेही के घर में भाभी की सारी मित्र-मंडली हाजिर थी, केवल हंसी-ठहाके लगाने को नहीं बल्कि अपने-अपने स्तर पर वैदेही की मदद कर देने को भी। आज शाम ही नेहा का भाभी के स्वभाव के एक नये रुप से परिचय हुआ। अपनेपन से सराबोर। भाभी और उनकी मित्र-मड़ंली का ये रुप देख नेहा के अदंर जाने कौन-कौन से भाव उमड घुमड़ आए? उसे ये अजीब-सा अहसास हुआ कि अब वो इत्मीनान से बीमार पड़ सकती है! कितना अजीब ख्याल था पर बहुत गहरा! रिश्तेदारी से दूर अगर उसका मन भाभी जैसे अपनों की सेवा-टहल का विचार करे तो कौन सी दीगर बात थी?

    खैर, वैदेही की तबीयत अगले दो-तीन खराब बनी रही। दोनों बच्चों की परीक्षा, ऐसे में ऑपरेशन करा लेने का वो सोच भी कैसे पाती? वैदेही के पति दूसरे दिन शाम तक आए। वैदेही की खराब तबीयत या बच्चों की परीक्षा के समय का विचार उनके मन से गुजरा हो ऐसा बिल्कुल न था, क्योंकि लौटते वो अपने साथ तइया भाई और भाभी को लेते आए थे। ये कह कि चलिए नया शहर दिखा दें आपको!

   वैदेही के पति की इस हरकत को जिसने देखा हैरान रह गया। उन्हें जरा अहसास न था कि वैदेही की इतनी मित्र-मडंली तैयार हो चुकी है और वो भी ऐसी जो आड़े वक्त वैदेही के साथ खड़ी हो।

   ससुरालियों के आ जाने से वैदेही को खड़ा ही होना पड़ा। नेहा और भाभी ने कहा भी कि वो अपने घर से खाना भिजवा देंगे, पर उनके घरो का बना खाना ससुरालियों के गले नहीं उतरता। वैदेही के पति का टेढ़ा रुख देख नेहा की वैदेही के यहाँ ही कुछ बना लेने की हिम्मत न हुई। ससुराली भी ऐसे कि बिस्तर पर ही सारा खाना मिल जाए। नेहा मजबूरी में वैदेही को उसके हाल में छोड़ घर वापस हो ली। अगले दिन भाभी के यहाँ यही चर्चा गरम रही। वैदेही के पति की करनी से सभी हैरान थे। इन सब से दीगर नेहा को केवल वैदेही की ही फ्रिक थी।

   बाद में वैदेही ने ही बताया कि उसके पति के ऊपर ससुरालियों का इतना जबरदस्त प्रभाव है कि चाह कर भी वो हमारे लिए कुछ नहीं कर पाते। तइया भाई-भाभी का टिकट उन्होंने ही कराया था। उन दोनों के आने का केवल यही मकसद था कि जा कर देख आए कि उनकी गृहस्थी में बिना सास की इजाजत कोई नया सामान तो नहीं जुड़ा न! पति की हिम्मत ही नहीं हुई कि उन्हें वैदेही की तबीयत का हवाला देते। इतना सब कर लेने पर भी उन पर ‘जोरु का गुलाम’ होने का जुमला उछाल ही दिया जाता। वैदेही की बात सुन, नेहा यह आंक ही नहीं पायी कि उस दिन जो वैदेही के पति का रुप देखा वो सच है या जो वैदेही कह रही है वह सच है!

वैदेही दोराहे पर खड़ा कर गयी नेहा को, पर वैदेही को अपने पति पर जो गुमान चढ़ आया था वो इसलिए कि सरकारी अस्पतालों की लंबी लाइन देख उसके पति ने वैदेही को निजी अस्पताल में ही दिखा लेने को कहा। और वो बावली इसे अपने पति की अपने प्रति चिंता समझ बैठी। बिना किसी की सलाह लिये जिस निजी डॉक्टर को उन्होंने दिखाया, उसकी केवल नाम की बलिहारी थी। इलाज के नाम पर डॉक्टर ने उनको खूब चूना लगाया। जब तबीयत में फर्क न आया तब दूसरे डॉक्टर को दिखाया, तब खुलासा हुआ कि अब तक का इलाज ही गलत चला और उसकी बीमारी का इलाज तो केवल ऑपरेशन ही है।

     इलाज में खर्च हुए बेहिसाब पैसे की भरपाई वैदेही के नाम की एफ०डी तुड़वा कर हुई। पति की इस हरकत ने वैदेही को अदंर तक तोड़ दिया। वैदेही ने बहुत ही टूटे स्वर में बताया कि इन्हीं एफ०डी के बूते तो वो अपनी बेटी का दहेज जुटा रही है। उनकी तरफ दहेज का दानव मुँह फाड़े खड़ा हैं, अच्छे लड़कों की ऊँची बोली लगती है।

     इन्हीं सबके चलते तो अक्सर वैदेही नेहा को ले बैंक और पोस्ट-ऑफिस के चक्कर लगाती। जो भी पैसे वो पति से खींच पाती उसे तुरंत बैंक के खाते में चढ़ा आती। उसकी बैंक के कार्यों में तत्परता देख नेहा ने जब टोका तब वैदेही ने बताया कि शादी तय होने के साथ ही वो बैंक की क्लर्की पोस्ट के लिए चयनित हो गयी थी, पर ससुरालियों के दवाब के रहते ही वो ये नौकरी नहीं कर पायी थी। उस समय अगर उसने नौकरी कर ली होती तो आज वो पी.ओ. होती। उसके आँखों में सजे सपने आँखों में ही समा गये। उसे कोई जमीन न मिल पायी। फिर हुआ यूँ कि नेहा को बड़ा घर मिल गया रहने को। था एकदम पास, पर रोज दो तीन बार का मिलना थम गया। तसल्ली ही रही कि दूसरे शहर जाना नहीं हुआ।

नेहा का उस ब्लॉक से विलग होना वैदेही को भारी पड़ा। वह गाने की एक उक्ति “दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे” हल्के से गुनगुनायी। तब नेहा को अहसास हुआ कि वो वैदेही के जीवन में कितने अदंर तक प्रवेश कर चुकी है।

“पगली है तू तो बिल्कुल!” कह नेहा ने एक मीठी झिड़की-सी दी वैदेही को।

  वैदेही बोली, “यहाँ ब्लॉक में तो जब-तब आ जाती थी, पर वहाँ के लिए अलग से तैयार होना पड़ेगा; तुम्हारे सिवा किसी से रमा ही कहाँ ये मन?”

  तसल्ली के सिवा और क्या दे सकती थी नेहा उसे। थोड़े दिन का ही रोना था। दोनों सखियों की उछल -कुद फिर से शुरु हो गयी। हाँ, अब पहले से “appointment” लेने का नया रिवाज शुरु हुआ दोनों के बीच। आस-पास की महिलाँए जल उठतीं।

     वक्त ने करवट ली और वैदेही के दोनों बच्चे इंजीनियर और डॉक्टरी की लाइन में निकल गये। दोनों के दाखिले के लिए वैदेही ने घर-बाहर जाने कितने पापड़ बेले? वैदेही और उसके पति के बीच पैसों को ले खूब ठनती थी। मगर इस बार वैदेही बच्चों के लिए ‘झांसी की रानी’ की तरह डटी रही। ये सारा घटनाक्रम नेहा को सिलसिलेवार वैदेही सुना जाती। एक बार वैदेही के मुँह से ये निकल ही गया, “मेरा देवर अमरबेल की तरह अपने भाई से लिपटा है।”

      जीवन के जिस दु्र्गम मार्ग पर वैदेही चलती जा रही थी, उस राह के पत्थरो ने वैदेही और उसके बच्चों को ही लहूलुहान किया, बाकी सब तो उसके और उसके बच्चों के हिस्सों के पैसों पर ऐश कर रहे थे। परिस्थिति ने वैदेही और उसके बच्चों को बेहद करीब ला दिया था। वैदेही के लिए वे ही तो सबसे बड़ा संबंल थे।

   नेहा के बच्चे भी इंजीनियर बनने की राह पर निकल पड़े थे। नेहा और वैदेही का मिलना बदस्तूर जारी था कि एक दिन अचानक नेहा के पति के तबादले की उड़ती-उड़ती खबर मिली। नेहा के पति का तबादला कोई उड़ती खबर न थी। ये सच साबित हुई। वैदेही का दुख वो महसूस कर सकती थी। नेहा के रहते उसने कभी किसी और को अहमियत ही नहीं दी थी और अब किसी और को नेहा का स्थान वो दे भी न पाती। तसल्ली यही थी कि नेहा के दोनों बच्चों का फाइनल ईयर होने से नेहा का बसेरा चार-पाँच महीने से पहले उठना नहीं था।

      नेहा ने अपने को काफी हद तक समेट लिया। वैदेही के लिए भी यही ठीक होता। वैदेही लाख ताने मारती कि, “तुम तो अभी से बदल गयी हो, चले जाने पर तो कोई संपर्क ही न रखोगी?” नेहा वैसी ही बनी रहती। नेहा के जाते-जाते उसके बिना जिदंगी काट लेने की उसकी आदत हो जाएगी। वैदेही कई बार दुखी हो कह देती, “मालूम होता कि हमारी दोस्ती इतनी जल्दी तिरोहित हो जाएगी तो तुम्हारी ओर अपने कदम ही न ले जाती।”

     कभी जैसा सोचो वैसा ही तो सब कुछ नहीं रहता न! हुआ यूँ कि वैदेही जब अपने मायके गयी हुई थी तभी उसके देवर की अत्याधिक शराब के सेवन से आकाल मृत्यु हो गयी। वैदेही के पति का झुकाव तो पहले से ही अपने घर की ओर था, ऐसा होना तो कहर ही ढा गया और उन्होने तुरंत दिल्ली तबादले का मन बना लिया। बीवी-बच्चों की न तो उसके पति को चिंता थी और न उसके ससुरालियों को। उससे सलाह लिये बेगैर ही वैदेही के पति ने दिल्ली तबादले के लिए ‘अप्लाई’ कर दिया। वैदेही के बोल तो वैसे ही अहमियत नहीं रखते थे और अब तो बात ही दीगर थी। उसने अपना मुँह पूरी तरह सिल लिया; जैसे अपने खोल में पहले सिमटी वैसे फिर सिमट गयी। नेहा को ज्यादा कुछ बताना उसने जरुरी न समझा। आगे भी तो उसे अकेले ही जूझना होगा फिर क्यों सहारा लेना? उसे नेहा से यही शिकायत रही कि जब ऐसे ही मुँह मोड़ना था तब उसको अपने खोल से निकाला क्यों? ढाल तो लिया था उसने अपने को वैसे ही। नेहा से पहले ही वैदेही की रवानगी तय हो गयी। जाने से पहले दोनों गले मिल खूब रोईं। जाने नियती में फिर मिलना बदा हो या नहीं।

     कुछ दिनों बाद वैदेही चली गयी अपने पीछे रीतापन  छोड़कर। पर जीवन तो किसी के लिए भी कहाँ रुकता हैं? वैदेही से नेहा की अक्सर फोन पर बात हो जाती है। वैदेही का जीवन वैसा ही बना हुआ है; पर हाँ, अपनी जिस बेटी का दहेज जुटाने को इतनी जद्दो जहद की थी उस बेटी की शादी बगैर दहेज के बहुत ही अच्छे घर में हो गयी। वैदही की तपस्या का ही प्रताप था ये।

     वैदही का बेटा किसी प्राइवेट कंपनी में ऊँचे ओहदे पर है। वैदेही ने कभी किसी का बुरा नहीं सोचा शायद इस रुप में ही भगवान ने उस पर अपना स्नेह दिखाया हो! नेहा आज भी वैदेही के लिए यही दुआ करती है कि वो जहाँ भी रहे उसके जीवन में अब सुख ही सुख हो! पर दोनों के अंदर एक खालीपन भी था.

अंजू निगम
इंदौर

 

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