हिन्दी और हिन्दी के बढ़ते दायरे (संपादकीय) | ललिता जोशी

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भाषा हमेशा की भांति मात्र एक ज़ुबान न होकर स्व को व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम रही है । प्राचीनतम समय की समीक्षा की जाए तो तब भाषा नाम का कोई नामोनिशान नहीं था व्यक्ति बिना बोले अपने विचारों को दूसरे के समक्ष व्यक्त करता था और श्रोता उसे समझता भी था । परंतु कई भाषाविदों द्वारा जांच करने पर पाया गया कि प्राचीन समय में अमूक भाषा बोली जाती थी और अमूक भाषा के साथ-साथ वह इशारों की भाषा का भी प्रयोग करते थे । भाषा का मुख्य उद्देश्य विचारों और भावों को व्यक्त करना होता है और जहां यह कार्य वक्ता और श्रोता दोनों तरफ से हो रहा हो उसे ‘अभिव्यक्ति’ कहते हैं, इसलिए अमूक और इशारों को भाषा न कहकर हम भाषा के एक बड़े समूह को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं । क्योंकि आज भी हम अमूक शब्दों व इशारों का प्रयोग विचारों को व्यक्त करने में करते हैं जिनको भाषा का माध्यम कहा जा सकता है । इन्हीं माध्यमों के अतिरिक्त हिन्दी भी एक ऐसा माध्यम है जिसका प्रयोग देश का एक बहुत बड़ा समूह कर रहा है ।

हिन्दी भाषा का जन्म हिन्दी साहित्य के अनुसार 1000 ईसवी में ही हो गया था लेकिन उसे अपने आधुनिक रूप में आते-आते कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । जो हिन्दी अपने विकास के प्रारम्भिक समय में संस्कृत के शब्दों को एकत्र किए थी वह आज संस्कृत के साथ अरबी, फारसी ,उर्दू, तुर्की आदि के शब्दों को लेकर खुद का एक नए अंदाज में विकास करती दिखाई दे रही है यही नहीं उर्दू, फारसी के अतिरिक्त हिन्दी ने कई लोक-भाषायी शब्दों को भी निष्पक्ष रूप से स्वीकार किया है ।

जिस प्रकार स्थिर जल स्वच्छ नहीं होता अर्थात पीने या प्रयोग लायक नहीं होता उसी प्रकार पुराने समय में प्रयोग होने वाली भाषा अपना वजूद खोने लगी थी इसलिए स्वयं की प्रासंगिकता को बढ़ाते हुए हिन्दी भाषा ने कई अंग्रेजी शब्दों को अपने भीतर इस प्रकार ढाल लिया है कि वह शब्द अन्य भाषा के शब्द प्रतीत ही नहीं होते हैं ।

हिन्दी के प्रसार को बढ़ाने के लिए हाल ही देश में 69वां हिन्दी दिवस मनाया गया । हिन्दी भाषा को 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा एकमत होकर राजभाषा के रूप में दर्जा दिया गया और देवनागरी लिपि को हिन्दी की लिपि का दर्जा दिया गया । संविधान के अनुच्छेद 343(1) से अनुच्छेद 351 तक के अनुच्छेद में राजभाषा हिन्दी के प्रयोग से सरकारी कामकाज के संवैधानिक तथा अहिंदी राज्यों में राजभाषा के नियम व सरकारी कार्यालय की प्रतिशतता का वर्णन है परंतु जहाँ तक बात हिन्दी भाषा के बढ़ते कदमों की है, आज भी लोगों की अभिव्यक्ति की भाषा हो या शिक्षा की भाषा हो वह हिन्दी ही है ।परंतु इन सब को ध्यान रखते हुए भी हम हिन्दी के लगातार बढ़ते प्रयासों को अनदेखा नहीं कर सकते हैं, यदि सोशल मीडिया की बात की जाए तो अधिकतर चैनल हिन्दी में ही है । जैसे एनडीटीवी, आज तक, दूरदर्शन आदि न्यूज़ चैनल की टीआरपी अंग्रेजी चैनलों से कम नहीं है । अब मनोरंजन की बात की जाए तो यू टयूब, फेसबुक, व्हाट्सप, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया में हिन्दी भाषा विश्व स्तर पर छाई हुई है यही कारण है कि हिन्दी सोशल मीडिया पर सबसे अधिक मुनाफे की भाषा बन गई है

जहाँ तक हिन्दी भाषा के प्रयोग की बात है हमारे लिए यह जानना आवश्यक है कि भारत के अतिरिक्त हिन्दी भाषा फिजी देश की भी राजभाषा है तथा कई अन्य देश जैसे न्यूयोर्क, मॉरीशस, ब्रिटेन व श्रीलंका आदि भी हैं जहाँ हिन्दी का प्रयोग भरपूर तरीके से होता है जहाँ हिन्दी भाषा के पठन-पाठन की व्यवस्था है इसके साथ ही स्वीडन, डेनमार्क, रोमानिया, नॉर्वे, फ्रांस आदि कई देशों में हिन्दी अध्ययन व अध्यापन की व्यवस्था देखी जा सकती है ।

अत: अधिकतर देश में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के प्रति प्रयास देखा जा सकता है जिसने हिन्दी को वैश्विक स्तर तक पहुंचा दिया है जहाँ विदेशी लोग तक हिन्दी भाषा का अध्ययन व अध्यापन कर रहे हैं ।

अत: शिक्षा व कार्य की भाषा चाहे अंग्रेजी ही क्यों न हो लेकिन भावनाओं को व्यक्त करने व मनोरंजन की भाषा हिन्दी ही रहेगी । और वो दिन दूर नहीं जब हिन्दी भाषा विश्व स्तर पर प्रयोग की जाने वाली भाषा में तीसरे पद से उठकर जल्द ही प्रथम पर पहुँच जाएगी ।

हिन्दी की आरंभ-ई-पत्रिका हिन्दी भाषा के प्रति जागृत करने व अपनी भाषा में विचार व्यक्त करने का अवसर देती आई है, जिसमें  पत्रिका ने हिन्दी में लिखे लेख, कविताएं, कहानियाँ आदि रचनाओं को स्थान दिया है । इन रचनाओं और लेखों ने हिन्दी भाषियों के साथ साथ अहिंदी भाषी को भी हिन्दी के बढ़ते उत्साह और प्रयासों से प्रभावित किया है । अत: आरंभ-ई-पत्रिका अपने पहले अंक से हमारे पाठकों के समक्ष नए-नए लेख अपने नए अंदाज़ में प्रस्तुत करती आई है और अपने लेखों से आरंभ पत्रिका के पाठकों को साहित्यिक ज्ञान के साथ वैश्विक ज्ञान भी देती आई है ।

आरंभ के 16वें अंक में भी अपने पहले अंक की तरह से नये और युवा लेखकों को स्थान दिया गया है, यह अंक किसी विशेषांक पर आधारित न होकर सामान्य अंक के तौर पर प्रकाशित किया गया है। जिसके अंतर्गत देश के कई राज्यों से न केवल साहित्य से जुड़े लोगों बल्कि साहित्य के अलावा अन्य क्षेत्रों में कार्यरत लोगों की रचनाओं को स्थान दिया गया है। सामान्य अंक होने के कारण इस अंक में विविध विषयों से ओत-प्रोत लेख शामिल हैं। पत्रिका के इस अंक में संपादकीय अधिकार से कुछ कहानियों और कविताओं में जरूरी बदलाव किए गये हैं क्योंकि वे बेहद सपाट या कोरी कल्पनाएँ लग रही थीं। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा। आलोचनात्मक टिप्पणियों का स्वागत है।

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