हिन्दी साहित्य 150 रुपए किलो | मनोज शर्मा

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रंगीन होलिजन लाइटस से बिखरती रोशनी बाज़ार की भव्यता को अति  विशिष्ट बना रही थी। बादलों के ओट से निकलते-छिपते चांद की आभा भी यहाँ मंद नज़र आ रही थी। बाजार में आधुनिक फैशन में रचे बसे युवक युवतियां यहाँ से वहाँ हंसी मजाक करते निकल रहे थे। मि.जगमोहन धीमे-धीमे कदमों को टेकते हुए उस ठेले के पास पहुँच गये, जहाँ उलटी-पलटी, बिखरी, उदास और बेबस हिन्दी साहित्य की पुस्तकें अपना दम तोड़ रही थीं। कटी-फटी ऊंची फ्रॉक में राधेश्याम की भूखी बेटी के एक हाथ में "150 रू में किलो हिन्दी की पुस्तकें" का  बोर्ड तो दूसरे हाथ में एक पिचकू-सा आम लिए ठेले के इर्द गिर्द घूम रही थी। मि. जगमोहन ने अपने चश्मे का शीशा साफ करते हुए और कुछ किताबों के पन्ने पलटते हुए पूछा- ‘क्यों भई, राधे
इतना उम्दा और विरला साहित्य किलो के हिसाब से? मति मारी गयी है तुम्हारी!’ राधे खीझता सा बोला, मैं तो साहित्य की सेवा कर रहा हूँ। अगर मैं आप जितना विद्वान होता तो समझता, पर पेट पालना है तो मुझे क्या पता साहब?’
मि.जगमोहन अध्यापन क्षेत्र से जुड़े हैं। हिन्दी साहित्य की इतनी दुर्दशा देख उनका अंतर्मन रो उठा, उन्होंने तुरंत जेब से हज़ार-बारह सौ रूपये निकाले और सारी किताबें खरीद लीं और कहा, ‘आगे से हिन्दी के साहित्य की किताबें हमारी  लायब्रेरी में दे दिया करना।’ कुछ बाल पुस्तकों को  राधे की बेटी को देते हुए 150 रूपये वाला बोर्ड भी ले लिया और कहा कि ‘इस बच्ची को सूबह हमारे स्कूल में दाखिला दिला देना, वहाँ गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाया लिखाया जाता है।’ इसके बाद राधे ने कभी भी हिंदी साहित्य को अपने ठेले पर नहीं रखा बल्कि मार्केट में नित्य बिकने वाली किताबें ही बेचने लगा। दूसरी ओर विरल साहित्य को पाकर जगमोहन जी अति प्रसन्न हैं क्योंकि ऐसे साहित्य की दरकार उन्हें काफी दिनों से थी, जो अब मयस्सर हुआ। सामने राम शब्द का उच्चारण करती, राधे की बेटी की आंखें खुशी से नम थीं।

 

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