मेरी माँ कुछ नहीं करती हैं | दीपेश

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माँ का जन्मदिन किस दिन पड़ता है, मुझे नहीं मालूम। मेरी माँ को भी नहीं मालूम और शायद नानी को भी नहीं। वो तो बहुत पुरानी बात हो चुकी हैं, यहाँ तक कि मेरे जन्म के विषय में भी परिवार के कुछ सदस्यों में मतभेद है। कोई अपनी बात पर पूरी तरह कायम भी है, तो भी जन्म की तारीख सटीक रूप से बता पाना कठिन है, जैसे- “कातिक के इजोरिया का दू दिन हुआ था, उसी भोर में रकेसवा का जन्म हुआ।” किसी को साल पता है तो किसी को महीने के नाम में शंका है। मैं तीन साल का था तभी से गाँव के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाने लगा।  प्रधानाध्यापक दादाजी को जानते थे इसीलिए उन्होंने बिना किसी से कुछ पूछे मेरा नामांकन कर दिया और जन्मतिथि उन्होंने अपने मन से ही लिख दिया जो आगे के हर डिग्री पर छपता चला गया। कुल मिलाकर यह कहने में कोई दो राय नहीं है कि बीसवीं सदी में गाँव-देहात में जन्मे लोगों की जन्मतिथियाँ सम्भवतः अनुमानित ही हैं।

मेरी माँ कुछ नहीं करती हैं। डॉक्टर, नर्स, शिक्षिका, प्राध्यापिका कुछ भी नहीं हैं माँ।  उन्हें भैंस दूहना आता है और जरूरत पड़ने पर कुदाल भी चला लेती हैं। खेतों में खाद छींटना और बीज बोना तो उनके बाएँ हाथ का खेल है। जब मुर्गा बाँग देने के लिए अपना गला साफ़ कर रहा होता है, उस समय माँ मवेशियों को बाहर निकालकर चारा डाल रही होती हैं। मेरे घर से लगभग 30  मीटर की दूरी पर मस्जिद और 50 मीटर की दूरी पर मंदिर है। मैं जब भी मस्जिद की अजान या मंदिर के घंटे से जागता हूँ तो माँ लालटेन जलाकर चारा काट रही होती हैं। जब कभी गाँव जाता हूँ तो माँ किसी काम में हाथ भी नहीं लगाने देतीं। कहती हैं कि तुम्हें आदत नहीं है, कोमल देह है, कहीं चोट न लग जाए। मुझे घास काटना आता है। चुपके से जाकर घास काट लाता हूँ तो खूब बिगड़ती हैं- “दिल्ली में कब घास काटते हो जो यहाँ आकर घास काटने लगे, कहीं हाथ कट गया तो? दू-चार दिन के लिए तो आते हो उसमें भी चैन से नहीं बैठा।” ये कहकर मुझे निहारने लगती हैं कि मैं पूरी तरह ठीक हूँ कि नहीं? सवेरे घूमने निकलते समय वह गोबर के उपले बना रही होती हैं और जब लौटकर आता हूँ तो देखता हूँ कि चूल्हे से धुआँ उठ रहा है, खाना लगभग तैयार हो चुका है। देखकर आश्चर्यचकित हो जाता हूँ कि माँ इतना बूता और इतनी फुर्ती लाती कहाँ से हैं?

सुबह  देर तक सोया रह जाऊं तो उठाती नहीं हैं। कहती हैं कि वहां रात-रात भर पढ़ता होगा तो देर से जगने की आदत हो गई होगी। मेरी किताबें घर में कहीं इधर-उधर बिखरी हुई दिख जाएँ तो ऐसे संभाल के रखती हैं मानो रामायण या गीता हो। इन सभी प्रकरणों से निजी तौर पर मुझे कभी-कभी अपराधबोध-सा होता है। क्या सचमुच मैं और मेरे जैसे कई-कई हजार-लाख संतानें वो कर रहे हैं जिनकी अपेक्षा हमारी माँएँ करती हैं? न जाने किस गुणवत्ता वाले उर्वरक से उनकी अपेक्षाएँ फल-फूल रही हैं जो कभी मुरझाना जानती ही नहीं। कभी-कभी सचमुच व्याकुल-सा हो जाता हूँ कि उनकी उम्मीदों की हमें जरा-सी परवाह है भी या हम उनकी अपेक्षाओं से पूरी तरह अनभिज्ञ ही हैं।

जब तक नाश्ता न कर लूँ, माँ का मन किसी और काम में रमता ही नहीं। वे बार-बार अपना आग्रह दुहराती हैं कि “ठंडा हो जाएगा, खा लो बउवा।” एक तो इतना सवेरे खाने की आदत नहीं है ऊपर से इतना आग्रह; मैं खीझ जाता हूँ, गुस्सा हो जाता हूँ। मेरे गुस्से से डर जाती हैं माँ। उन्हें लगता है कि बेटा इतना पढ़ा-लिखा है तो उनका गुस्सा भी जायज ही होगा, गलती मेरी ही होगी। कितना औपचारिक हो गया है एक देहाती माँ और शहरी हो गए बेटे के बीच का रिश्ता! अबकी एक नए उधेड़बुन में फँस जाता हूँ। उनकी किस गलती के लिए मैंने अभी-अभी उन्हें डांटा है? अपराधबोध का भाव लिए मैं माँ की और देखता हूँ तो माँ दीन-भाव से फिर दोहराती हैं- “बेटा, खा लो खाना, ठण्डा हो जाएगा तो अच्छा नहीं लगेगा।” बिलकुल एक अपराधी-सा महसूस होता है; माँ और मेरे बीच पनपते औपचारिकता के लिए, उस वातावरण से खुद को जोड़ नहीं पाने की बेचैनी के लिए और तमाम उन चीजों के लिए जो मेरे हाथ से फिसल चुकी हैं।

हमारी परछाइयाँ सूरज के ताप से भयभीत होकर जब पैरों तले छुप जाती हैं, उस समय माँ गेहूँ का बोझा लिए, नंगे पाँव मेड़ पर आती हुई दिखती हैं। किसी जनम में किसी देवता से उन्हें ज़रूर कोई वरदान मिला होगा, तभी तो उन्हें जाड़ा, धूप, बरसात कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। छठ में वो रात-रात भर जागकर ठेकुआ बनाती हैं, दिन में जो काम उनके जिम्मे हैं वो तो करती ही हैं और तिस पर तीन दिन, तीन रात भूखा भी रहती हैं। हम एक पहर कुछ न खाएँ तो पृथ्वी का घूमना सचमुच में दिखाई पड़ने लगता है ऐसी स्थिति में यह बात तो कल्पना की परिधि से ही बाहर हो जाती है कि तीन दिन तक भूखा भी रहा जा सकता है।

आसमान में टंगा हुआ सूरज थक चुका है। वह अकुलाकर बार-बार अपनी कलाई पर नज़र दौड़ाता है कि कब शाम हो और मैं अपने घर जाऊं। ‘लू’ अपना आक्रामक तेवर दिखाकर न जाने कब अपने ठिकाने की ओर भाग खड़ी हुई। हवा भी सुस्ताना चाहती है, उसके आदेश पर पेड़ ने पत्तों को सख्त चेतावनी दी है कि अपनी जगह से हिलना-डुलना नहीं। उधर माँ, परियारपुरवाली दादी, बड़की चाची और उस टोले की सामू की पतोहू सब मिलकर घास छीलने निकल पड़ी हैं। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मौसम का तापमान कितना है, घड़ी में कितना वक्त हुआ है, वे तो मानो रोबोट हैं जिनमें सभी प्रोग्राम फिट करके छोड़ दिए गए हैं। वहाँ घरों में कैलेण्डर नहीं हैं। यदि होता भी तो उस कैलेण्डर में शनिवार, रविवार अथवा पर्व-त्योहार वाला दिन लाल या पीला रंग से रंगा नहीं होता। उस कैलेण्डर में सभी दिन एक ही रंग से रंगे हुए होते क्योंकि उनके लिए कोई छुट्टी का प्रावधान नहीं किया गया है। नो वीकेंड, नो वीक डेज़।

मेरी माँ हर वो काम कर लेती हैं जिसका संसार के बड़े-से-बड़े पुस्तकालय के छोटी-से-छोटी पुस्तकों तक में जिक्र नहीं मिलता, जिसका मूल्य सामाजिकों ने शून्य तय किया है- नील बट्टे सन्नाटा। वे लोग शाम को घर-घर जाकर पूछते होंगे कि आप क्या करती हैं? संभवतः वे उन्हीं घरों में जाते होंगे जहाँ पर दुधिया रौशनी हो और दरवाजे की शोभा एक विलायती कुत्ता बढ़ा रहा हो। उन सामाजिकों को रतौंधी है, ढ़िबरी और लालटेन की कम रौशनी में उन्हें कुछ नहीं दिखता। एक और ख़ास बात कि देहाती कुत्तों से शायद वे डरते होंगे। कुछ तो आँगन से उठते धुएँ को देखकर, उसे विषैला प्राणघातक प्रदूषण मानकर ही उलटे पाँव लौट जाते होंगे। शायद यही कारण है कि उनका काम करना, काम करने की परिभाषा से मेल नहीं खाते हैं जिससे यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि वे कुछ नहीं करतीं।

रात का खाना माँ अंत में खाती हैं। उनके और बाकी लोगों के खाने में अधिक अंतर नहीं है। हम लोगों को जितनी भूख लगी होती है, उतना खाना खाते हैं लेकिन माँ के लिए नियम अलग है। जितना खाना बचता है माँ को उतनी ही भूख लगी होती है। किसी दिन सारा खाना खत्म हो गया तो माँ ‘एडवांस’ में ही बोल देती हैं कि मुझे भूख नहीं थी इसीलिए अपने लिए नहीं बनाई। माँ को आजतक सोते और जागते कभी नहीं देखा मैंने। विज्ञान के इस उद्घोषणा “मनुष्य के शरीर को कम-से-कम छः-सात घंटे की नींद चाहिए” को माँ हर दिन झूठा साबित करती हैं। और भी न जाने कितने सिद्धान्तों और निष्कर्षों को समय-समय पर माँ झूठा साबित करती रहती हैं। आखिर ऐसा क्यों न हो? इन सिद्धान्तों में इन्हें कभी शामिल किया ही नहीं गया। जब भी इनके बारे में कोई सर्वे किया गया, कोई रिपोर्ट तैयार की गई तो एक बार भी उनकी राय नहीं पूछी गई, उनकी इच्छाओं की पड़ताल नहीं की गई, केवल अनुमान भर लगा लिया गया कि ऐसा होता होगा, वैसा होने ई संभावना है और छाप दिया गया किताबों में।

इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सोशल मीडिया लगभग पूरी तरह महिलामय हो चुका था। बेटों ने माँओं के, पतियों ने पत्नियों के, पिताओं ने बेटियों के साथ की अपनी तस्वीरें साझा कीं, करनी भी चाहिए। प्रोफाइल फ़ोटो बदली गईं, बदलनी भी चाहिए। शुभकामनाएं दी गईं, देनी भी चाहिए। लेकिन मुझे अपनी माँ को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन शुभकामना देना, उन्हें अपमानित करने जैसा लगा। माँ को पहले अंतरराष्ट्रीय शब्द का मतलब समझाओ, फिर महिला दिवस का और शुभकामना शब्द का अर्थ भी कहाँ जानती हैं माँ! कौन इतनी मथ्था-पिच्ची करे? और क्यों करे?

‘गाँवों का देश-भारत’ की राजधानी दिल्ली की चमचमाती हुई सड़कों से जब विश्वविद्यालय के विशाल परिसर में प्रवेश करता हूँ तो वहाँ ‘स्त्री-विमर्श’ पर चर्चा जोड़ पकड़ चुकी होती है। जिसने कभी गाँव देखा तक नहीं, जिसके लिए खेत में उगने वाला धान भी चावल है, धान से निकला चावल भी चावल है और फिर उससे बना भात भी चावल ही है, वो दूरद्रष्टा भी अपनी दिव्य-दृष्टि से ग्रामीण स्त्रियों की दशा को देख लेता है और उसपर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए परेशान दिखने लगता है। शायद पढ़ाई का मतलब ही यही होता है कि जिसे कभी हमने अपनी आँखों से देखा नहीं उसपर भी हम दावे के साथ अपने प्रामाणिक और यथार्थवादी विचार व्यक्त कर सके या फिर जो हम बोल रहे हैं उसे तर्क से प्रामाणिक और यथार्थवादी सिद्ध कर सकें। इस बहस में एक शहरी युवक एक देहाती युवक को उसके ही गाँव की विभिन्न स्थितियों पर भाषण देकर उसे परास्त कर देता है। शहरी युवक कहता है कि मैंने सोशल साइंस पढ़ा है, क्या तुमने कभी पढ़ा है? वो देहाती युवक सोशल साइंस नहीं पढ़ा है इसीलिए वो उसकी हर बात को मान लेता है। इस चर्चा में हम चरम तक पहुँच जाते हैं और निष्कर्ष निकालते हैं कि ग्रामीण स्त्रियों की हालत सचमुच बहुत दयनीय है। अब शुरू होती हैं निजी बातें; गाईज़, प्लीज अपना-अपना इंट्रो दो- “माय मदर इज़ ए सीनियर जर्नालिस्ट”, “यू नो एम. एन. सी.? माय मदर इज़ द चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर…..”, “………………” मैं भी इन्हीं शोरगुल में एक वाक्य उछाल देता हूँ- “मेरी माँ कुछ नहीं करती हैं!”

 

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