पद्य क्षणिकाएँ | सुनीता काम्बोज 

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  1. हर रात गुलाबी है

मेरे प्रीतम की

हर बात गुलाबी है ।

2. तहरीर बदल देंगे

कर्मों से अपनी

तकदीर बदल लेंगे ।

3. ऐसा बदला लेगा

तुझको ये तेरा

अब क्रोध जला देगा ।

4. ये उम्र गई सारी

बेगाने घर की

कर-कर पहरेदारी ।

5. ये पुष्प न झड़ जाएँ

फिर से रिश्तों की

सीवन न उधड़ जाए।

6.अब प्यासा साकी है

सब बरतन खाली

तलछट ही बाकी है ।

7. मुश्किल कुछ काम नहीं

पर जग में मिलता

सब कुछ बिन दाम नहीं  ।

8. मन से संसारी हैं

हाथ कमंडल ये

कर माला धारी है ।

9. मुखमंडल मुरझाया

प्यासी विरहन की

अब सूख गई काया ।

10. मीठा  कुछ खारा  है

दर्द जुदाई का

जलता अंगारा है  ।

11. रहते थे मंडराते

आज मुसीबत में

वो पास नही आते ।

12. मैं आज मुकम्मल हूँ

तुमसे मिलकर मैं

अब गंगा का जल हूँ ।

13. तुम नित -नित करते हो

मात-पिता को क्यों

अपमानित करते हो ।

14. हम सब पर भार हुए

केश हमारे ये

चाँदी  के तार हुए ।

15. भरपूर टपकता है

माँ के चेहरे से

एक नूर टपकता है ।

16. अनुकूल हवाएँ  हैं

लेकिन पथरीली

मेरी ही राहें हैं ।

17. हँसती मुस्काती  थी

मेरे आँगन में

इक कोयल गाती थी ।

18. पगली ये आज भई

ये चंचल नदिया

सीमाएँ लाँघ गई ।

19. ये काम उन्हें  भाते

औरों के पथ में

वो रोड़े अटकाते ।

20. चतुराई करता है

वक्त उधेड़े फिर

तुरपाई करता है  ।

21. ये खटपट करता है

मनवा अभिमानी

अक्सर हट करता है ।

22. सिसकारी सुनती हैं

घर की दीवारें

चुप सारी सुनती हैं ।

23. रण में हारा बल से

आज सभा में वो

फिर जीत गया छल से ।

24. सिरहाने बैठी हूँ

नेह तुम्हारा ही

मैं पाने बैठी हूँ  ।

25. ये जीवन  एक ग़ज़ल

शेर नये कहती

देखा हमने हर पल ।

26. तेवर दिखलाती हैं

लहरे नौका  को

अब डर दिखलाती हैं ।

27. कोशिश बेकार गई

जीती शैतानी

मानवता हार गई ।

28. जब से  दिल हारा है

गलियों में चर्चा

हर ओर हमारा है  ।

29. कुछ पल सब साथ चले

लेकिन अब देखो

हम खाली हाथ चले ।

30

ये चित पावन कर दो

हे मुरली वाले

पतझर सावन कर दो।

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