प्रज्ञा का ‘गूदड़ बस्ती’ और गीताश्री का ‘हसीनाबाद’ | पंकज सुबीर 

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यह निश्चित रूप से महिलाओं का समय है। विशेषकर हिन्दी लेखन के संदर्भ में। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ उसके पीछे कारण है। इस वर्ष के साहित्य के तीन सबसे प्रतिष्ठित सम्मान ज्ञानपीठ सम्मान, व्यास सम्मान और साहित्य अकादमी सम्मान यह तीनों लेखिकाओं के हिस्से में गए हैं। कृष्णा सोबती जी, ममता कालिया जी और नासिरा शर्मा जी को क्रमशः ये तीनों सम्मान दिए गए हैं। यह स्त्री लेखन को लेकर सबसे बड़ी स्वीकारोक्ति है। अब दूसरी बात करता हूँ, संपादक मंडल से जुड़ा होने के कारण मैं दोनों पत्रिकाओं को आने वाली सामग्री को देखता हूँ तथा संपादक मंडल में उस पर चर्चा करता हूँ। पिछले कुछ अंकों को तैयार करते समय हमारी चर्चा में यह विषय हर बार होता है कि कुछ पुरुषों को भी स्थान दिया जाए। यहाँ पर आप ‘को भी’ पर विशेष ध्यान दीजिए। लेकिन होता यह है कि हर बार लेखिकाओं को ही अधिक स्थान मिलता है। पुरुष धीरे-धीरे पिछड़ रहे हैं लेखन में। पिछड़ रहे हैं, तो उसके कई कारण हैं, उनकी चर्चा फिर कभी….। लेखिकाओं की चार से पाँच पीढ़ियाँ इस समय लेखन में सक्रिय हैं। कृष्णा सोबती जी की नई पुस्तक इसी वर्ष आई है  ‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान’ और मुझे लगता है कि उनके बाद की लेखिकाओं में अलग-अलग आयु वर्ग के चार समूह तो लेखन में सक्रिय हैं ही, और इस वर्ष यदि तलाश करेंगे, तो सभी की कोई न कोई पुस्तक विशेषकर उपन्यास इस वर्ष आया हुआ आपको मिलेगा। और उन्हीं में शामिल हैं दो उपन्यास  ‘‘गूदड़ बस्ती’ और ‘हसीनाबाद’ आज हम इन्हीं दोनों उपन्यासों की चर्चा करने जा रहे हैं।

 

प्रज्ञा और गीताश्री, यह दोनों बहुत सक्रिय कथाकार हैं। दोनों की कहानियाँ ख़ूब चर्चित रही हैं। और अब यह पहला-पहला उपन्यास भी दोनों का लगभग एक साथ ही सामने आया है। कहानी में सफलता प्राप्त कर लेने के बाद जब आप उपन्यास की दुनिया में कदम रखते हैं, तो बहुत तनाव में घिरे होते हैं। तनाव प्रदर्शन को लेकर होता है। एक और बात यहाँ ये महत्त्वपूर्ण है कि दोनों ही लेखिकाओं ने कहानीकार के रूप में अपने को बहुत अच्छे से स्थापित कर लिया है और अपना एक पाठक वर्ग भी बना लिया है। जब आप किसी एक विधा में स्थापित हो जाते हैं, तो आपके लिए चुनौती और बढ़ जाती है। यह चुनौती अपेक्षाओं की होती है। पाठकों की अपेक्षाएँ। विधाओं में जो अंतर होता है, उसके चलते यह तनाव होता है कि जिस प्रकार हमने एक विधा को साधा, उसी प्रकार हम दूसरी को साध पाते हैं कि नहीं। कहीं ऐसा न हो कि कहावत की भाषा में त्रिवेदी जी, चतुर्वेदी बनने चलें और द्विवेदी बन कर वापस लौट आएँ।

लेकिन, मैं यह कह सकता हूँ कि इन दोनों उपन्यासों के माध्यम से दोनों त्रिवेदी जी, चतुर्वेदी जी बन गए हैं। मतलब यह कि गीताश्री को ‘हसीनाबाद’ के द्वारा तथा प्रज्ञा को ‘गूदड़ बस्ती’ के द्वारा अब पहचाना जाएगा। (यह मेरा व्यक्तिगत विचार है कि कथा-लेखक को उसके उपन्यास द्वारा ही पहचान मिलती है। इस विचार से आप असहमत हो सकते हैं।) दोनों ही लेखिकाओं ने उपन्यास की दुनिया में बहुत मज़बूती के साथ, बहुत प्रभावशाली कदम रखा है। दोनों ने दो अलग-अलग दुनियाओं की कहानी को अपने-अपने उपन्यास में विषय बनाया है। और उन दुनियाओं के नाम पर ही अपने उपन्यास का शीर्षक बनाया है। यह हमारे देश, हमारे समाज, हमारी सभ्यता की दो बजबजाती हुई आबादियाँ हैं, बस्तियाँ हैं, जो हमारे लिपे-पुते चेहरे पर किसी बदनुमा दाग़ की तरह सदियों से हैं। इन दोनों ही उपन्यासों में उस यथास्थिति को तोड़ देने की छटपटाहट है, उससे निकलने का संघर्ष है। एक तरफ़ हसीनाओं से आबाद नगर है, तो दूसरी तरफ़ गूदड़ बस्ती है। यह संयोग ही है कि दोनों लेखिकाओं ने दो ऐसी आबादियों की चर्चा अपने उपन्यास में की है,  जो अपने-अपने तरीके से संघर्षरत हैं। नाचने-गाने वालियों, तवायफ़ों से लेकर दलित और पिछड़े वर्ग का संघर्ष, इन दोनों उपन्यासों में स्थान पाता है। लेखक की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी भी यही होती है कि वह उनकी चर्चा करे, जिनकी चर्चा ज़रूरी होने के बाद भी कोई नहीं करता। लेखक उन सारे लाल कालीनों को उठा-उठा कर, उनके नीचे बिछे शोषण की पड़ताल करे, जो राजपथ पर बिछाए गए हैं। इसलिए सबसे पहले तो दोनों लेखिकाओं को बधाई देता हूँ कि उन्होंने अपने पहले उपन्यास में स्त्री लेखन के तय फ़ार्मेट (क्षमा सहित) को तोड़ते हुए अपने लिए मुश्किल रास्ते का चयन किया है। शोषित और उपेक्षित की कहानी कहना बहुत मुश्किल होता है। पिछले वर्ष चित्रा मुद्गल जी ने भी अपने उपन्यास ‘नाला सोपारा’ में एक ऐसे ही विषय को उठा कर एक अनूठी कृति को पाठकों के सामने प्रस्तुत किया था।

अलग-अलग दोनों उपन्यासों के बारे में बात करने से पहले मैं थोड़ी-सी और एक साथ चर्चा करना चाहता हूँ। यह दोनों उपन्यास पूरी तरह से भारतीय उपन्यास हैं। इनके विषय भारत से ही उठते हैं और आम भारतीय पाठकों के लिए ही हैं। इनको समझने के लिए आपको किन्हीं संदर्भ ग्रंथों की, किन्हीं विवरणों की, किन्हीं अतिरिक्त पुस्तकों की आवश्यकता नहीं होगी। दोनों ही उपन्यास अपने संगठन में बहुत खुले हुए और सरल हैं। सरलता इन उपन्यासों की सबसे बड़ी विशेषता है क्योंकि इन दिनों हिन्दी में सरल होना सबसे कठिन और कठिन होना सबसे सरल होता जा रहा है।

पहले बात करते हैं ‘हसीनाबाद’ की। यह कहानी गोलमी की कहानी है। लेकिन इस कहानी में वैशाली की नगरवधु आम्रपाली की गूँज सुनाई देती है। गोलमी का निर्माण वैशाली की मिट्टी से ही किया गया है। यह आम्रपाली का रीक्रिएशन है। उपन्यास में कई स्थानों पर इसके संकेत भी पाठक को मिलते हैं/दिए जाते हैं। ‘हसीनाबाद’ के आने के पूर्व से ही कई लोगों के मन में संशय था कि प्रखर युवा कहानीकार प्रभात रंजन की ‘कोठागोई’ से यह किस प्रकार अलग होगा। क्योंकि दोनों का उद्भव एक ही स्थान से हो रहा है और दोनों एक ही प्रकार की कहानी कह रहे हैं। ‘कोठागोई’ को लेकर मैंने विस्तार से कहीं लिखा था और वह पुस्तक मुझे बहुत अच्छी लगी थी। और अब मैं ही यह कहना चाहता हूँ कि ‘हसीनाबाद’ एक ही स्थान, एक ही विषय की कहानी होने के बाद भी ‘कोठागोई’ से बिल्कुल अलग है। शिल्प में भी, भाषा में भी और तकनीक में भी। ‘कोठागोई संस्मरणात्मक कथा थी तो ‘हसीनाबाद’ एक मुकम्मल उपन्यास है। और हाँ यह भी कि -स्त्री की पीड़ा को स्त्री होकर ही बेहतर जाना जा सकता है।

‘हसीनाबाद’ उपन्यास का सबसे सशक्त पहलू है इस उपन्यास की पठनीयता, इसकी रोचकता। गोलमी की कहानी कभी भी, एक क्षण के लिए भी पाठक को अपने से दूर होने का अवसर नहीं देती है। उस पर गीताश्री ने बहुत ही सुगठित और सुंदर भाषा का प्रयोग उपन्यास में किया है। कुछ छोटे-छोटे टुकड़े जो बीच-बीच में वाक्यों के आते हैं, वो मन मोह लेते हैं पाठक का। गीताश्री की कहानियों का मैं प्रशंसक हूँ, लेकिन इस उपन्यास की भाषा उन सारी कहानियों की तुलना में बहुत अधिक समृद्ध है। उपन्यास का शिल्प भी बहुत सुस्पष्ट है, कहीं कोई झोल-झाल नहीं है। सारी नक़्क़ाशियाँ, सारे बेलबूटे बिल्कुल साफ-साफ दिखाई देते हैं। बहुत सारे पात्रों को फैलाव है, लेकिन उन सारे पात्रों के बीच लेखक ने कुशलता के साथ कहानी का संतुलन साधा है। इस प्रकार कि वे जो कुछ बिन्दु, जहाँ पर पाठक को असहज होना था, वहाँ भी वह गोलमी की उँगली पकड़ कर वह निकल जाता है। चूँकि मैं चाहता हूँ कि आप उपन्यास को पढ़ें, इसलिए कहानी के बारे में विस्तार से कोई बात नहीं। अच्छा उपन्यास।

‘गूदड़ बस्ती’ एकदम अलग समय और स्थान की कहानी है। यह हमारे समय और समाज की तलछट में जमी हुई गंदगी की कहानी है। वह गंदगी जो हमारे दिमाग़ों में जाने कितनी सदियों से जमी है। प्रज्ञा ने उस कहानी को कुछ अलग तरीक़े से देखने का प्रयास किया है। निम्नवर्गीय परिवार की कहानियाँ कभी भी पुरानी नहीं होतीं, उनमें हमेशा कुछ न कुछ नया मिल ही जाता है। क्योंकि समय उनको नए संत्रास, नई पीड़ाएँ, नए कष्ट देता ही रहता है। इस उपन्यास के लिए प्रज्ञा को प्रतिष्ठित मीरा सम्मान प्राप्त हुआ है। सही चयन है निर्णायकों का।

यह कहानी मीनू की है जो सुरेंद्र की ज़ुबानी पाठकों तक पहुँचाई गई है। बहन की कहानी भाई की ज़ुबानी। एक ऐसे परिवार की कहानी, जिसके संघर्षों का कोई अंत ही होता दिखाई नहीं देता। जिस परिवार का एक-एक सदस्य संघर्ष में है। मीनू का संघर्ष अधिक कड़ा और बड़ा इसलिए है क्योंकि वह लड़की है। उसके हिस्से में सूरज कुछ अधिक तीखी धूप लेकर निकलता है। हालाँकि पूरे परिवार की ही स्थिति वही है। प्रज्ञा की सबसे बड़ी सफलता इस उपन्यास में यह है कि उपन्यास के पात्रों के अंदर की छटपटाहट, उनके अंदर की बेचैनी पाठक को अपने अंदर महसूस होने लगती है। उस घर के अंदर जो भयावह, काली तथा स्थगित सी रात है, उस रात का सन्नाटा पाठक को अपने आस-पास ही महसूस होता है। ऐसा लगता है जैसे पाठक स्वयं उस घर का एक सदस्य  हो गया है। जब पाठक किसी कृति को पढ़ते समय उसके पात्रों की तरह बेचैन हो जाए, तो लेखक का उद्देश्य पूरा हो जाता है।

उपन्यास की भाषा अपनी कहानी का बहुत ठीक प्रकार से प्रतिनिधित्व करती है। मेड फार ईच अदर। इस प्रकार के उपन्यास में जैसी भाषा होनी चाहिए, वैसी ही भाषा। वही भाषा जो उन पात्रों की होनी चाहिए। इस उपन्यास की एक और विशेषता यह भी है कि पूरी संभावना तथा गुंजाइश होने के बाद भी लेखक स्वयं अपने विचार पाठकों पर थोपने उपस्थित नहीं होता है। जो कुछ सामान्य रूप से पात्र कहते हैं बस वही पाठक तक पहुँचता है। प्रज्ञा ने सुरेंद्र के शरीर में अपना परकाया प्रवेश करने की उस बड़ी भूल से अपने आप को बचा लिया, जो भूल अमूमन बड़े लेखक भी इस प्रकार के कथानक में कर जाते हैं। अपनी बौद्धिकता झाड़ने का मोह यह भूल करवा देता है कि देखिए मुझे कितना कुछ पता है। लेकिन पाठक वह पब्लिक होती है, जो सब जानती है। कसे हुए शिल्प और सधी हुई भाषा के   साथ प्रज्ञा ने भविष्य के संकेत अभी से दे दिए हैं। गूदड़ बस्ती उपन्यास नहीं एक यात्रा है। निम्नवर्गीय परिवार की संत्रास यात्रा…।

यह दोनों उपन्यास मैंने एक ही रात में एक साथ पढ़े और लगा कि आपको कहूँ कि आप भी पढ़ें। पढ़ें और ज़रूर पढ़ें…।

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