प्रवासी हिंदी साहित्य और संस्कृति : एक मूल्यांकन | डॉ. संजय प्रसाद श्रीवास्तव

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‘प्रवास’ शब्द का अर्थ है, विदेश गमन, विदेश यात्रा। अतः किसी दूसरे देश में रहने वाला व्यक्ति प्रवासी है। बॉक्यूबलरी डिक्शनरी में प्रवासी की परिभाषा इस प्रकार दी गई है—“A diaspora is a large group of people with a similar heritage or homeland who have since moved out to places all over the world.” अर्थात् प्रवासी ऐसे लोगों का एक बड़ा समूह है जिनकी विरासत या मातृभूमि एक समान है और जो विश्व के अन्य स्थलों में स्थानांतरित हो गए है।”[1]

A diaspora (From Greek “Scattering, dispersion”) is a scattered population whose origin lies within a smaller geographic locale. Diaspora can also refer to the movement of the population from its original homeland”[2]. अर्थात् “डायस्पोरा शब्द ग्रीक शब्द से विकसित हुआ है। जिसका अर्थ होता है—बिखरे हुए लोग। ऐसे लोग जिनका मूल एक भौगोलिक विस्तार में हो। डायस्पोरा ऐसे लोगों के लिए भी प्रयुक्त होता है जो अपनी मातृभूमि से अन्य स्थानों में स्थानांतरित होते हैं।”

डॉ. रामदरश मिश्र के अनुसार “प्रवासी साहित्य ने हिंदी को नई जमीन दी है और हमारे साहित्य का दायरा दलित विमर्श और स्त्री विमर्श की तरह विस्तृत किया है।”3

मृदुला गर्ग के अनुसार “प्रवासी साहित्य को अलग करके देखने की बजाए उसे हिंदी की मुख्यधारा में स्थान दिया जाए।” विदेशों में रहने वाले लेखक जब संस्कृति के टकराव के बारे में लिखते हैं, तो लोगों को उच्च श्रेणी के साहित्य से मुखातिब होने का अवसर मिलता है।

भारतीय मूल के लोग विश्व के विभिन्न देशों में फैले हुए हैं। विदेशों में रहते हुए भी हिंदी लेखकों ने हिंदी साहित्य को जन-जन तक पहुँचाया। प्रवासी हिंदी साहित्य को इस प्रकार से समझा जा सकता कि भारतीय मूल के लोग जो विदेशों में रहते हुए हिंदी के सृजनात्मक लेखन को विकसित किया, ऐसे लेखन कार्य को प्रवासी हिंदी साहित्य के श्रेणी में रखा जाता है। इन लेखकों ने ‘हिंदी’ को केंद्र में रखकर साहित्य का सृजन हिंदी में किया है, उन्हें हम ‘प्रवासी हिंदी साहित्यकार’ की संज्ञा देते हैं। प्रवासी हिंदी साहित्यकारों ने अपनी कृतियों में मिथक, इतिहास, सभ्यता और संस्कृति को जीवंत रखा। प्रवासी हिंदी साहित्य ब्रिटेन अमेरिका, कनाड़ा, मॉरिशस, सूरीनाम, त्रिनिडाड आदि स्थानों में लिखे गये। प्रवासी हिंदी साहित्यकारों में उषाराजे सक्सेना का नाम अग्रणीय है। उन्होंने इंग्लैंड को अपनी साहित्यिक कर्मभूमि बनाया। इनके साहित्य में भारत और भारतीय संस्कृति एवं भाषा के प्रति अधिक बल दिया गया है। उन्होंने अपनी रचनाओं में भारतीय संस्कृति को विस्तार से चित्रित किया है। आज साहित्य सृजन प्रवासियों के जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। प्रवासी लेखकों की संवेदना संस्कार के रूप परिवेश को आत्मसात करता है।

प्रवासी हिंदी साहित्य को आगे बढ़ाने और विकसित करने में मॉरीशस की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। मॉरीशस के लिए गर्व की बात है कि यहां के निवासियों ने अपने सांस्कृतिक विरासत के रूप में हिंदी भाषा एवं साहित्य को स्थापित करने के साथ-साथ उसे विकसित भी किया। मॉरीशस में हिंदी साहित्य के सृजनात्मक लेखन का कार्य किया जाता है, जैसे- कहानी, उपन्यास, नाटक, लघुकथा, एकांकी, यात्रा वृत्तांत, कविता आदि विधाओं पर लेखन कार्य मिल जाते हैं। कुछ रचनाएँ मॉरीशस तथा भारतीय विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में लगी हुई हैं। हिंदी साहित्यकारों में डॉ. हेमराज सुंदर, अभिमन्यु अनंत, रामदेव, धुरंधर, राज हीरामन, इंद्रदेव भोला, सूर्यदेव सीबोरत आदि हिंदी साहित्य सृजन से जुड़े हुए हैं।

प्रवासी हिंदी साहित्य ने विश्व में अपनी एक अलग छवि विकसित की है। हालांकि ‘प्रवासी’ शब्द का अर्थ है, विदेशों में रहनेवाले भारतीय मूल के लोग। अतः प्रवासी हिंदी साहित्य को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है कि जो हिंदी साहित्यिक लेखन भारत से दूर के देशों में हुआ हो, उसे प्रवासी हिंदी साहित्य कहा जाता है। आज प्रवासी हिंदी साहित्य में उत्तरोत्तर विकास हो रहा है। हिंदी साहित्य में प्रवासी साहित्य की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके माध्यम से लेखकगण भारतीय संस्कृति, संस्कार एवं उसके भू-भागों का स्पष्ट चित्रण हिंदी साहित्य के विभिन्न विधाओं में वर्णन करते हैं। ‘प्रवासी साहित्य’ हिंदी साहित्य की एक विधा के रूप में विकसित हो रही है।

बचपन में जिस भाषा में व्यक्ति को संस्कार मिलता है, प्रायः उसी भाषा में साहित्य का सृजन होता है और अपने देश की मिट्टी की खुशबू उसी साहित्य में झलकती है। इस कारण प्रवासी हिंदी साहित्यकारों ने अपने लेखन का माध्यम हिंदी को बनाया। क्योंकि इसी भाषा में अपनी अभिव्यक्ति को रचना में उतार सकते है। प्रवासी हिंदी लेखक गण प्रवास के दौरान अपने दुःख-दर्द की संवेदनाओं के साथ अपने देश के संस्कारों को अपनी कृतियों में ज्यों का त्यों विवरण कर देते है। प्रवासी हिंदी लेखक अपने लेखन के माध्यम से देश विदेश की संस्कृति के बीच समन्वयक का कार्य करते है। जिनिडाड आदि देशों में हरिशंकर आदेश ने हिंदी भाषा, साहित्य औऱ संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। वास्तव में हिंदी प्रवासी साहित्य हिंदी साहित्य को अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया है। प्रवासी साहित्य भारत के बाहर हिंदी साहित्य की एक पहचान है। प्रवासी साहित्य ने हिंदी को वैश्विक रूप प्रदान किया है।

हिंदी साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति के प्रचार एवं प्रसार का सर्वाधिक श्रेय प्रवासी हिंदी लेखकों को जाता है, जिन्होंने भारतीय संस्कृति और सभ्यता के स्तर को बनाये रखते हुए साहित्य की सृजन किया। साथ ही विदेशियों को इसके प्रति आकर्षित किया। प्रवासी हिंदी लेखक अपने कृतियों एवं लेखन में देश और विदेश की विभिन्न संस्कृतियों को समन्वय कर रहे है। इस संबंध में प्रवासी लेखिका उषा राजे सक्सेना लिखती है कि “वह लेखक संस्कृतियों को निकट लाकर समन्वयवादी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन दे सकता है। आर्थिक जगत में वैश्वीकरण की धारणा जिस प्रकार फलीभूत हो रही है और विश्व गाँव का स्वप्न देखा जा रहा है तथा सूचना क्रांति इस स्वप्न को साकार करती दिखाई पड़ रही है, उसी प्रकार से साहित्य जगत में भी विश्व में इस प्रकार का नैकट्य लाया जा सकता है। समन्वय सदा से साहित्य का सर्वोत्कृष्ट गुण रहा है। आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व भक्ति काल के शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास ने वर्ग-वर्ग में बंटे समाज, सम्प्रदायों और विचारधाराओं को समन्वय करने का युग परिवर्तनकारी कार्य किया था। अपनी इस विशिष्टता के कारण ही ‘रामचरितमानस’ एक सार्वकालिक और सार्वजनिक ग्रंथ बन गया है। आधुनिक युग में महान घुमक्कड़ और विराट व्यक्तित्व के धनी साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन ने देश-विदेश के अगम्य क्षेत्रों का न केवल अन्वेषण किया अपितु गंगा और बोल्गा नदियों पर अपनी दार्शनिक दृष्टि से समन्वयकारी विचारधारा को संतुष्ट किया है। आज प्रवासी हिंदी साहित्य से जुड़ी सबसे बड़ी अपेक्षा समन्वय की है।”4 प्रवासी भारतीयों की मानसिकता के संदर्भ में दुर्गा प्रसाद गुप्त लिखते है कि “यह ऐसा भारतीय मन है जो एक तरफ भारत के आध्यात्मिक अतीत पर मुग्ध होता है, उसके लिए आहें भरता है तो दूसरी तरफ भौतिकता में उलझे उसके गरीब औऱ पिछड़े वर्तमान पर आँसू बहाता है। उसके प्रति विरक्ति भाव से प्रेम प्रदर्शित करता है। यह विभाजित मन उन प्रवासी भारतीयों का है जो न तो सही अर्थ में अपनी धर्म और संस्कृति के प्रति तटस्थ रह पाते है और न निर्वैयक्तिक। फिर भी वे दोनों संस्कृतियों के प्रेमी आलोचक है।” अतः लगभग अनेक उपन्यासों में प्रवासी भारतीयों के दोहरे जीवन को दर्शाया गया है।

भारतीय संस्कृति पाश्चात्य संस्कृति से भिन्न है। भारतीय भोजन, पोशाक, धार्मिक आचार-विचार भाषा, रीति-रिवाज पाश्चात्य संस्कृति से हटकर एक पृथक पहचान स्थापित करती है। साथ ही प्रवासी हिंदी साहित्य हिंदी साहित्य की एक कड़ी बन चुकी है। इस विषय में डॉ. कमल किशोर गोयनका जी ने कहा है—“अतः हिंदी के प्रवासी साहित्य की गति और विकास को अब कोई भी विरोधी शक्ति नहीं रोक सकती। वह हिंदी साहित्य की एक सशक्त धारा बन चुकी है और उसे हमें हिंदी साहित्य की प्रमुख धारा में सम्मानपूर्ण स्थान देना होगा।”5

प्रवासी हिंदी साहित्य में स्थानीय संस्कृति एवं संस्कारों की झलक देखने को मिलती है। प्रवासी साहित्यकारों ने वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा के विकास में महत्वपूर्ण कार्य किया है। प्रवासी साहित्यकार अपने जन्मभूमि एवं अपनी बोली भाषी के प्रति सदा उदार दिखते हैं। सभी ने अपनी भाषा और संस्कृति से पृथक नहीं हुए बल्कि उन्हें आज भी इन सबसे लगाव है। विदेशी मिट्टी में देशी संस्कारों की महक मिलती है। प्रवासी हिंदी साहित्य सतत अपनी रचनाओं से हिंदी साहित्य को समृद्ध बनाने के साथ-साथ पाठकों को प्रवास की संस्कृति, संस्कार एवं उस भूभाग के लोगों की स्थिति से भी हमें अवगत कराती है। विदेशों में प्रवासी हिंदी सांस्कृतिक दूत का काम करती है। भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम एवं सर्वाधिक समृद्ध संस्कृति है। अतः पूरी दुनिया में भारतीय मूल के लोग अपने साथ-साथ भारतीय संस्कृति को जीवित रखे हुए है।

भारतीय संस्कृति में अनेकता में एकता देखने को मिलती है। अनेक धर्म, संप्रदायों, भाषाओं, संस्कृतियों, रहन-सहन, खान-पान, आचार-व्यवहार, भौगोलिक भिन्नता आदि के रहते हुए भी एक अभिन्न संबंध देखने को मिलता है। मॉरीशस के जाने माने कवि हेमराज सुंदर लिखते है—

“हिंदी हमारी संस्कृति की/रानी है

हिंदी का भक्त होना/भारत से जुड़ना है।

अपनी पितृभूमि से/नेह लगाना है।”

–(सुदंर, 2013:58)

 

फ़ीजी के कवि सुखराम की कविता ‘हिंदी : हमारी मातृभाषा’ में हिंदी और संस्कृति के अभिन्न संबंध को इस प्रकार दर्शाया गया है—

“हिंदी हमारी मातृभाषा, हिंदी हमारा धर्म है।

हिंदी हमारी संस्कृति, हिंदी हमारा कर्म है।

भारत की प्राचीन भाषा, हिंदी को प्रणाम है।

अन्य भाषा की तरह, हिंदी का बड़ा नाम है।”

–(वर्मा 2012:149)

भारतीय पर्व-त्यौहारों, रीति-रिवाजों की जीवंत परंपरा एवं भारतीय संस्कृति को फ़ीजी कवि ने अपनी कविता में इस प्रकार वर्णन किया है:-

“सब के लिए शुभ हो, कार्तिक अमावस्या की शाम

इंतजार कर रहा मानव जगत परिवार के साथ

दीपमाला का स्वागत में दीया की थाली लेकर हाथ

श्रद्धा से पूजन करूँ कि चरणों में प्रणाम

सब के लिए शुभ हो, कार्तिक अमावास्या की शाम्”

–महावीर मित्र (वर्मा, 2012:127)

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि प्रवासी हिंदी साहित्य और संस्कृति का अभिन्न संबंध है। भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार में प्रवासी हिंदी साहित्य की मुख्य भूमिका रही है। भारतीय हिंदी साहित्य की मुख्य विधा के रूप में प्रवासी हिंदी साहित्य विकसित हो रही है। प्रवासी हिंदी साहित्य विदेशों में भारतीय संस्कृति एवं भाषाओं के वर्चस्व को समृद्ध कर रहा है। विदेशी संस्कृति में रह रहे हमारे प्रवासी साहित्यकारों के मन में भारतीयता रची-बसी है। प्रवासी हिंदी साहित्य विदेशों में लिखा जा रहा है लेकिन मूल रूप से यह भारत से जड़ी हुई है। प्रवासी हिंदी साहित्य में विदेशी संस्कृति में अपने अस्तित्व को बचाए रखने का चुनौती है।

डॉ. कमल किशोर गोयनका के अनुसार—“हिंदी के प्रवासी साहित्य का रूप-रंग उसकी चेतना और संवेदना भारत के हिंदी पाठकों के लिए नई वस्तु है, एक नये भावबोध का साहित्य है, एक नयी व्याकुलता और बेचैनी का साहित्य है जो हिंदी साहित्य को अपनी मौलिकता एवं नये साहित्य संसार से समृद्ध करना है। इस प्रवासी साहित्य की बुनियाद भारत-रेम तथा स्वदेश परदेश की द्वन्द्व पर टिकी है तथा बार-बार हिंदू जीवन मूल्यों तथा सांस्कृतिक उपलब्धियों तथा उनके प्रति श्रेष्ठता के भाव की अभिव्यक्ति होती है।”6

प्रवासी हिंदी लेखक भारतीय होने के कारण वे एक तरफ हिंदी प्रचार-प्रसार विदेशों में कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता से भी वहां के लोगों को परिचय करवा रहे हैं। प्रवासी भारतीय दुनिया में जहाँ भी गये अपनी बहुरंगी संस्कृति का पुष्प अपने साथ लेकर गये हैं। प्रवासी हिंदी साहित्यकार सिर्फ हिंदी भाषा को ही समृद्ध नहीं कर रहे है, बल्कि हमारी संस्कृति व परम्पराओं की संवाहिका का उत्तरदायित्व निभा रहे है। अतः प्रवासी हिंदी साहित्य को विविधता रूप प्रदान कर रही है। हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय पहचान बनाने में प्रवासी हिंदी रचनाकारों का योगदान महत्वपूर्ण है।

भारतीय और विदेशी संस्कृति के टकराव एवं विदेशों में भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों अथवा भारतीयों के वे संघर्ष को लेकर ही प्रवासी हिंदी साहित्य का कथा साहित्य हमारे सामने आता है प्रवासी हिंदी कहानियों का विश्लेषण करने से यह निष्कर्ष निकलता है कि विदेशी संस्कृति के टकराव से भारतीय संस्कृति में भी विकार उत्पन्न हुआ है। भारतीय समाज की अपेक्षा विदेशी समाज में लिव इन रिलेशनशिप, प्रेम-प्रसंग, विवाह विच्छेद व पुनर्विवाह आदि आसानी से स्वीकार किये जाते है। इन सब परिस्थितियों से प्रवासी भारतीय द्वंद्व की स्थिति में पहुँच जाता है।

डॉ. संजय प्रसाद श्रीवास्तव
जूनियर रिसोर्स पर्सन/लेक्चरर ग्रेड (हिंदी),राष्ट्रीय परीक्षण सेवा-भारत
भारतीय भाषा संस्थान, मानसगंगोत्री, मैसूर, कर्नाटक

 

संदर्भ:

[1] http://www.vocabulary.com/dictionary/diaspora
2 Diaspora Merriam Webster.Retrieved 22 February 2011
3 अक्षरम संगोष्ठी, अप्रैल-जून 2006, पृ. 6
4 उषा राजे सक्सेना, ‘प्रवासी हिंदी लेखन तथा भारतीय हिंदी’, ‘वर्तमान साहित्य’, कुंवरपाल सिंह, नमिता सिंह (संपादक), जनवरी-फरवरी-2006, पृ. 62
5 डॉ. कमल किशोर गोयनका, ‘भूमिका शब्दयोग’, अप्रैल 2008, पृष्ठ-6-8
6  कमल किशोर गोयनका, विश्व हिंदी रचना, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, नई दिल्ली-2003

सहायक ग्रंथ सूची :-

  • प्रवासी साहित्य : जोहान्सबर्ग से आगे, प्रधान संपादक, डॉ. कमल किशोर गोयनका, प्रकाशक-विदेश मंत्रालय, भारत सरकार, साउथ ब्लॉक, नई दिल्ली, संस्करण-2015
  • विभिन्न पत्र-पत्रिकाएँ

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