डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी की लघुकथाएं                                      

0
28

                                          
पहचान

पता नहीं वह कौन था…!उस छोटे से सर्कस में, चाहे जानवर हो या इंसान, वह सबसे बात करने में समर्थ था। प्रत्येक के लिए वह एक ही प्रश्न लाया था – “तुम कौन हो?”, सभी के पास जाकर वह यही प्रश्न पूछ रहा था।

सबसे पहले उसने एक शेर से पूछा तो शेर ने उत्तर दिया, “मैं शेर हूँ।”
फिर एक हाथी से पूछा तो हाथी ने कहा, “हाथी हूँ।”
एक कुत्ते ने पूछने पर उत्तर दिया, “कुत्ता और कौन?”
एक गधे ने रेंकते हुए बताया कि, “मैं तो गधा ही हूँ।”
अब वह मुड़ा और एक आदमी से वही प्रश्न पूछा, उस आदमी ने गर्व से कहा,
“मैं पंडित प्रकाश हूँ।”
वह चौंक गया और दूसरे आदमी से पूछा, जिसने कहा,
“मैं मोहम्मद नूर हूँ।”
उसे विश्वास नहीं हुआ अब वह एक महिला के पास गया और पूछा, उसे उत्तर मिला,
“मैं रौशनी कौर हूँ।”
उसके लिए अब असहनीय हो गया और वह उल्टे पैर लौटने लगा, सर्कस का कुत्ता वहीँ खड़ा था। कुत्ते ने उससे पूछा, “क्या हुआ तुम्हें?”
उसने उत्तर दिया, “ये सारे इंसान हैं, लेकिन खुद को इंसान नहीं कहते।”
कुत्ता हँसते हुए बोला, “ये तो मुझे भी टॉमी कहते हैं, लेकिन तुम कौन हो?”
वह मुस्कुरा कर बोला, “मैं तुम हूँ, तुम सब हूँ…लेकिन इंसानों में मैं भी नहीं जानता कि मैं कौन हूँ… बहुत सारे नाम हो गए…”
कहकर वह लम्बे डग भरता हुआ चला गया।

2) एक औरत

“काजल लगाने के बाद तुम्हारी आँखें कितनी सुंदर हो जाती हैं?”
“जी, मेरे बॉस भी यही कहते हैं।”
“अच्छा, तुम्हारे कपड़ों का चयन भी बहुत अच्छा है, तुम पर एकदम फिट!”
“बॉस को भी यही लगता है।”
“ओह, तुम चेहरे पर जो मेकअप करती हो, उससे तुम्हारा रंग कितना खिल उठता है।”
“बॉस भी बिलकुल यही शब्द कहते हैं…”
“उफ़…. तुम्हारा पति मैं हूँ या बॉस
“आपकी नज़रें पति जैसी नहीं, बॉस जैसी हैं, वर्ना इन सबके पीछे एक औरत भी है।”

3) मेरी याद

रोज़ की तरह ही वह बूढा व्यक्ति किताबों की दुकान पर आया, आज के सारे समाचार पत्र खरीदे और वहीँ बाहर बैठ कर उन्हें एक-एक कर पढने लगा, हर समाचार पत्र को पांच-छः मिनट देखता फिर निराशा से रख देता।

आज दुकानदार के बेटे से रहा नहीं गया, उसने जिज्ञासावश उनसे पूछ लिया, “आप ये रोज़ क्या देखते हैं?”

“दो साल हो गए… अख़बार में अपनी फोटो ढूंढ रहा हूँ….” बूढ़े व्यक्ति ने निराशा भरे स्वर में उत्तर दिया।
यह सुनकर दुकानदार के बेटे को हंसी आ गयी, उसने किसी तरह अपनी हंसी रोकी और व्यंग्यात्मक स्वर में पूछा, “आपकी फोटो अख़बार में कहाँ छपेगी?”
“गुमशुदा की तलाश में…” कहते हुए उस बूढ़े ने अगला समाचार-पत्र उठा लिया।

 

डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी
जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय
उदयपुर (राजस्थान)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here