सोच बदलो | स्वाती गुप्ता

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एक माँ हूँ मैं,

दो बेटियाँ हैं,

मेरा प्यार, मेरा अभिमान,

कम शब्दों मे कहूँ तो मेरी जान।

एक मेरे सम्मान को बढ़ाती हैं,

एक अपनी नटखट अदाओं से मुझे लुभाती है,

बहुत खुश हूँ कि..

दो बेटियाँ हैं मेरी।

समाज के एक हिस्से से कुछ सुझाव

स्वयं ही चले आते हैं,

कि एक बेटा भी जन लो,

बेटे वंश को आगे बढ़ाते हैं,

बेटा तुम्हारे बुढ़ापे की लाठी बनेगा,

वरना बिन बेटे के जीवन बड़ा भारी पडे़गा,

सोच कर उनकी बातों को बहुत हँसी आती है,

कि जमाना कितना भी बदल गया,

पर लोगों की सोच को न बदल पाया,

बेटियाँ तो ठीक हैं;

पर एक बेटा जरुर होना चाहिए

इस सोच, इस जुनून, इस फितूर से न निकल पाया जो,

ऐसे लोगों से केवल इतना ही कहना चाहूँगी-

“सोच बदलो…”

क्योंकि बहुत ही खुश हूँ मैं कि

दो बेटियाँ हैं मेरी़।

 

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