स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के आइने में स्वयं प्रकाश की कहानियाँ | बीरज पाण्डेय

0
442

शोध छात्र

स्वयं प्रकाश यथार्थ के लेखक है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ हमें स्पेसमें ले जाकर कल्पना लोक की सैर नहीं कराती बल्कि जमीन पर लाकर पटकदेती है। ऐसा भी नहीं है कि उनकी कहानियाँ धक्का देकर एकदम गिरा देती है, परन्तु तन्द्रा को भंग न कर सके ऐसा भी नहीं है। स्वयं प्रकाश के अधिकतर पात्र और कहानियाँ उनके जीवन के प्रसंगों से उपजे है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ स्वयं पाठक से बात करती है और एक प्रश्नके सामने लाकर उसे खड़ा कर देती है। वे स्वयं लिखते हैं- ‘‘आज इस मौके पर उन मित्रों की याद आ रही है, जो भिन्न-भिन्न कारणों से मेरी कहानियों के निमित्त और कारण बने और यदा-कदा अच्छे-बुरे पात्र भी।’’ स्वयं प्रकाश की कहानियाँ इसी प्रकार जीवन से गहरे स्तर पर जुड़ी है। इसी वातावरण में उपजी उनकी स्त्री जीवन से संबंधित कहानियाँ महत्वपूर्ण है।

वस्तुतः स्वयं प्रकाश के कहानियों में स्त्री जीवन की जो विवशता और पीड़ा देखने को मिलती है, उसी को तोड़ कर एक समतामूलक समाज की स्थापना ही उनकी कहानियों का लक्ष्य है। स्त्री को आश्रिता, अबला जैसे संज्ञाओं से संज्ञायित करना छोड़ जब हम उसे प्रथम दर्जे के नागरिक के रूप में देखने समझने में सहज हो जाए, वहीं वस्तुतः  ‘स्त्री-सशक्तिकरण’ होगा। स्वयं प्रकाश के स्त्री पात्रों पर टिप्पणी करते हुए पल्लव लिखते हैं- ‘‘दरअसल स्वयं प्रकाश स्त्री पुरुष सम्बन्धों में वह आधुनिकता चाहते हैं जो व्यक्तित्व चेतना से पूर्ण हो और जहाँ से जीवन का पूर्ण विकास दिखाई दे।’’ इसी उद्देश्यों को ध्यान में रखकर उन्होंने अशोक और रेनु की असली कहानी’, ‘मंजू फालतू’, ‘अगले जनम’, ‘आयाचित’, ‘पाँच दिन और औरत और  ‘लड़कियाँ क्या बाते कर रही थी’ आदि कहानियों के माध्यम से स्त्री मनऔर जीवनकी सच्चाईयों को उजागर किया है।

स्वयं प्रकाश समाज और यथार्थ को बारीकी से देखने वाले कथाकार है। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ सामान्य विषयों से उपजती है। एक स्त्री का अपने पति के प्रति प्रेम और समर्पण दामत्य जीवन का मूल है परन्तु व्यक्तित्व विलोपनचिंता का विषय है। यहीं प्रश्न उनके स्त्री-विषयककहानियों के मूल में है। लड़कियाँ क्या बातें कर रही थी?‘ एक ऐसी कहानी है जिसमें दामत्य जीवन में कदम रखने से पूर्व लड़कियों द्वारा झेले जा रहे समाज और पारिवारिक दबाव के बीच शिक्षा, रोजगार, प्रेम और विवाह के तनाव से उपजी समस्याएँ है। जीवन में आचार संहिता जरूरी है परन्तु यदि आचार संहिता मात्र एक वर्ग पर ही लागू हो तो उसे गुलामी की जंजीरसमझा जाएगा। इसी आचार संहिता रुपी जंजीर से जकड़ी किशोरियाँ शादी के बाद रेनु, ‘मंजू’ हो जाती है और नहीं चाहती कि अगले जनम मनुष्य योनि मिले और यदि मिले भी तो स्त्रीजीवन न मिलें। दासता के बंधन से उपजी निराशा ही इस कथन में व्यक्त हुयी है- ‘‘हाँ भाई अभी तो बीसवीं सदी ही बीती है। पच्चीसवीं सदी खत्म होने तक शायद आप लोग अपनी मर्जी से खा-पहन सको।” औरत होना जो कि सृष्टि के सर्जना की सबसे अमूल्य निधि है यदि अभिशाप समझा जाए तो यह मानवता पर कलंक है। मानवाधिकारऔर समतामूलक समाज की स्थापना की बातें बड़ी खोखली लगती है जब आज भी खाने और पहनने की स्वतंत्रता पर विवाद होता है। स्त्री मुक्ति संगठनों का अपने मूल पथ से भटकना और राजनीति तथा सत्ता के गलियारों में मत्था टेकना किसी से छिपा नहीं है। पथ से विचपल की ही कहानी है पाँच दिन और औरतजिसमें एक साथ कई लोगों के जीवन के विविध अंश को स्थान दिया गया। भारत में जाति की समस्या ने  किस प्रकार विवाह संस्था की अर्थवत्ता को प्रश्नाकिंत किया है इसका पता चलता है जब अपने प्रेमी के साथ भागकर शादी करने वाली लड़की की माँ छोटी बेटी के लिए कहती है- ‘‘अधेड़ और दुहेजू है तो क्या हुआ, अपनी जाति का तो है, बिरादरी वाले थू-थू तो नहीं करेंगे, वरना कहीं ये भी खूंटा तुड़ाकर भाग गई तो…।’’ इस प्रकार बिरादरीकी सीमा ने किस प्रकार दहेज, अनमेल विवाह की समस्या को  पैदा किया है वह यहाँ उद्घाटित किया गया है। स्थिति यह है कि यहाँ यह कथन लड़की की माँ कह रही जो स्वयं स्त्री है। इस प्रकार जब कोई समाज स्वयं के शोषण को सहर्ष स्वीकार कर ले और खुद उसमें भागीदार बने तो समझना चाहिए कि शोषणकारी अपनी साजिश में सफल हुआ और उसका षणयंत्र अब ‘संस्था’ बन चुका है। जिसे आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता। स्त्री को स्त्री के विरुद्ध खड़ा करना पितृसत्ता का सबसे सफल प्रयोग रहा है।

इसका सबसे विद्रूप  स्वरूप वहाँ देखने को मिलता है जब आयाचितकहानी में स्वयं के जीवन में भागकर शादी करने वाली लड़की, वह भी अन्तर्जातीय विवाह जैसा क्रांतिकारी कदम उठाने वाली लड़की ‘माँ’ के रूप में अपनी बेटी की शादी नाबालिक अवस्था में ही बिना उसकी मर्जी कर देती है। समाज की रूढ़ियों को तोड़कर पुनः उसकी तरफ लौटना रूढ़ियों के विजय का सूचक है जो आयाचितकहानी का मूल कथ्य है। इस प्रकार प्रेमिकाकी भूमिका से अभिभावक की भूमिका  में आते ही समाज की सभी रूढ़ियों को ओढ़ लेने वाला भारतीय अभिवावक आने वाली पीढ़ियों को जीवन के जिस चक्रव्यूह में छोड़ रहा है वहाँ पीड़ा, घुटन और निराशा ही है। यही नहीं स्त्री संगठनों की भूमिका पर प्रश्न उठाते हुए पाँच दिन और औरतमें स्वयं प्रकाश दिखाते हैं कि विक्षिप्त महिला किस प्रकार सड़क पर पाँच दिन नंगी हालात में रहकर मर जाती है परन्तु कोई सामने नहीं आता। कहानी के अन्त में ‘जादुई यथार्थवाद’ का सहारा लेकर उस महिला का विजय दिखा दिया गया, जब महिला संगठन के नेता दिल्ली जो रहे थे तब प्रेत आत्माएँ बनकर दो पीड़ित महिलाएँ उन्हें जलाकर मार देती है।

सवाल यह है कि क्या इस तरह जादुई यथार्थ का सहारा लेना हमारी विवशता है या फिर वास्तव में आग लगाकर ऐसे नेताओं को मार देने से ही समस्या का समाधान निकलेगा? यहाँ दोनों कटघरे में खड़े सवाल है वस्तुतः समाज के ही उत्पाद संगठन होते है समाज की मानसिकता बदले बिना संगठनों की अर्थवता हम नहीं बढ़ा सकते। संगठन में रहने वाले लोग किस वर्ग के है, उनकी पृष्ठभूमि क्या है ? और उनकी संवेदनशीलता ही उसकी उपयोगिता तय करती है।

इस लिए जब तक अशोक और रेनु’ की असली कहानी का रेनु अपने स्वायत्तता को बनाकर रखना नहीं सिखेंगी तब तक स्त्री की स्थिति शोषित की ही बनी रहेगी। अशोक और रेनू पति-पत्नी है। अशोक चाहता है कि उसकी पत्नी उसकी दोस्त बनकर रहे परन्तु रेनु सशंकित है। वह स्वयं को भारतीय पत्नी के प्रेमके आदर्श के अनुरूप अपने को ढालना चाहती है। वह अपने व्यक्तित्व को विलोपित कर देती है। इस पर अशोक इस द्वन्द्व में जीने लगता है कि कहीं व इसका दोषी तो नहीं। वह स्वयं से प्रश्न करता है- क्या वह लड़की लड़ नहीं सकती?… अपने घर में अपनी मर्जी नहीं चला सकती?… यह पढ़ी-लिखी लड़की कहाँ से पढ़ी-लिखी है?’’ वस्तुतः यह प्रश्न उस भारतीय संस्कार पर है जो इतने गहरे स्तर तक हममें समाहित है कि विचार और संस्कार के द्वन्द्व में हमेशा संस्कारही विजय पाता है जो रेनुका निर्माण करता है। यहीं कारण है कि रेनु पति के नापंसद की चीज अब घर में नहीं बनाती। वह स्वयं को अशोक के अनुकूल ढालना चाहती है। मित्रता से मालिक-दासीके सम्बंधों में बदल रही यह कहानी भारतीय परम्परागत नारी के निर्माण की अन्तरकथा है। जिसमें  यह प्रश्न आज भी विद्यमान है- ‘‘क्या चाहती है रेनु ? समानता नहीं चाहती? मुक्ति और विस्तार नहीं चाहती? फिर क्या चाहती है? सुरक्षा? समृद्धि? प्रजनन! एकदम औरत ही है क्या?

इस प्रकार यह कहानी उस सदियों के संस्कार, परम्पराओं और व्यवस्थाओं की निर्मिति को हमारे सामने लाती है। जहाँ स्त्री स्वयं के लिए बनाए गए मानदण्डों को ही सर्वाधिक उपयुक्त समझती है। उसके बाहर आने पर या लाए जाने पर उसे असुरक्षा की भावना घेरने लगती है। इस भावना से निकालना ही आज विमर्शों का उद्देश्य होना चाहिए। स्वयं स्त्री में जबतक खुद की स्वायत्तता और अर्थवत्ता पर विश्वास नहीं जगेगा तब तक बाकी प्रश्न अनावश्यक ही साबित होते रहेंगे। नारी का नारीतत्व के प्रति मोह स्वभाविक है, वह उसकी कोमलता का एक सुनहरा पक्ष भी है परन्तु यह उसकी दुर्बलता और व्यक्तित्व विभाजन का कारण बने तो जो यथेष्ट है उसे ही चुनना होगा। वरन रेनुही आने वाले समय में मंजूसे मंजू फालतूबन जाएगी। मंजू फालतू’ एक ऐसे ही युवती ही कहानी है जो स्वयं के समकक्ष लड़के से शादी करती है। परन्तु माँबनने के बाद उसे नौकरी छोड़नी पड़ती है। बच्चों को पालने और घर के काम में लिए उसे नौकरी छोड़ना पड़ी। दो बच्चों की माँ मंजू अब दिन भर मातृत्व कर्तव्य को निभाने में स्वयं के कैरियर की बलिदेती है । ‘‘जिसने तब कम्प्यूटर सीखा था जब अधिकांश लोग कंप्यूटर को केलकुलेटर का ही बड़ा भाई मानते थे। जिसने निरंतर साधना से अपने लिए छोटी ही सही पर मुकम्मल जगह बनायी थी।’’  स्वयं प्रकाश का यह कथन उसके संघर्ष को दिखाता है जिसकी अंतिम परिणति है उसका फालतूहो जाना। न केवल बाजारवादी व्यवस्था में या तथाकथित मानव संसाधन के रूप में बल्कि अपने बेटियों और पति के नजर में भी फालतू हो गयी। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और पूंजीवाद लगातार तकनीक और कार्यशौली में बदलाव की माँग करता है जिसमें पुराने लोग फिटनहीं बैठते तो वे भी फालतू हो जाते हैं। मंजू परिवार से ऊबकर जब जॉबकी खोज में निकली जो उसे यथार्थ स्थिति का बोध हुआ। अन्ततः वह थक गयी। स्वयं प्रकाश लिखते हैं- ‘‘मंजू को लगा वह एक हारी हुई लड़ाई लड़ रही है। समय उसके पक्ष में नहीं है। उम्र शत्रु बन गयी है।… उसे निकम्मा और निठल्ला होकर जीना मंजूर नहीं था। वह अपने ही घर में अपने ही पति और बच्चों की उपेक्षा, दया और उपहास का पात्र नहीं बनना चाहती थी। वह चीजे रखकर भूलने लगी, सनकने लगी, घुटने लगी, टूटने लगी।’’ और अततः उसने अपना सरनेम फालूतलगा लिया। इस प्रकार जीवन की शुरुआत इतनी ऊर्जा से करने वाली मंजूकी नियति इस बाजारवादी और पितृसत्तात्मक समाज में मंजू फालतू’ बनना ही है।

स्त्री-जीवन की पीड़ा, पुत्र चाह की उत्कटता और प्रसव पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति की कहानी है अगले जनम। जिसमें प्रमुख पात्र सुमि है। सुमि रेनुके विपरित चरित्र है। वह नहीं चाहती अभी ‘माँ’ बनना। परन्तु भारतीय परिवारों में  आज भी कोखपर स्त्री का नहीं बल्कि पति और सास-ससुर का अधिकार है। इसी पीड़ा को व्यक्त करते हुए स्वयं प्रकाश लिखते हैं- ‘‘असल में पूछा जाए तो सुमि माँ बनना ही नहीं चाहती थी।” वे लिखते हैं- ‘‘सास को पोता चाहिए था और पोते से कम कुछ नहीं। एक सुंदर- सुशील सुशिक्षित पुत्रवधु से उसे तसल्ली नहीं था।ससुर को भी पोता ही चाहिए था। उनके लड़के ही हुए, इस बात का उन्हें गर्व जैसे था। कहते थे- हमारे खानदान में बारातें आती नहीं, बाराते जाती है।’’ सुमि और मंजू दोनों पात्र दो जगह है परन्तु दोनों की स्थितियाँ एक जैसी है। स्वंय प्रकाश सुमि के बारे में लिखते है- ‘‘सुमि कुछ उत्साही देशभक्त छात्रों के सम्पर्क में आये और महत्वाकांक्षी होने लगी। जीवन में कुछ कहना है। कुछ बनकर दिखलाना है। औसत जिंदगी जीकर मर नहीं जाना है।’’

परन्तु सुमि की सारी महत्वकांक्षा शादी के बाद तिरोहित करा दी जाती है। ससुराल के लिए उसकी अर्थवत्ता मात्र पुत्रकी माँ बनने और सांस-ससुर को पोता देने में रह गयी। भारतीय समाज में पुत्र मोह की यह अभिलाषा कितनी त्रासद है इसका जिक्र तो कई जगहों पर है परन्तु नवीनतम आंकड़े के अनुसार भारत सरकार ने आर्थिक समीक्षा 2017-18 में पुत्र की इस चाहत को रेखांकित करते हुए कहा भारत में अवांछित बालिकाओं की संख्या 21 मिलियन है। यानि ऐसी संतान जिसके माता-पिता पुत्र चाहते थे, लेकिन पुत्री का जन्म हो गया।

स्पष्ट है कि अवांछित पुत्रियों के शिक्षा, विकास और पालन-पोषण पर बहुत संभावना है उस स्तर से ध्यान न दिया जाए जैसा पुत्रों के लिए किया जाता। विषमता का यह पैमाना ठीक किए बगैर आधुनिक भारत की संकल्पना नहीं की जा सकती। नर्स जब सुमि को बेटी लाकर देती है तो उसके मुँह से मात्र एक शब्द निकलता हैं- मर जाऔर फिर आँसू की धार बहने लगती है। इस प्रकार प्रसव के अथाह पीड़ा के बाद बहने वाले एक माँ के आसू उसकी बेबसी से पैदा हुए है । इस बेबसी का कारण है समाज का दकियानूसी होना जहाँ बेटीको दोयम दर्जे का समझा जाता है। स्वयं प्रकाश यहाँ भी यह दिखाने से नहीं चूकते की बेटीहोने पर सर्वाधिक अवहेलना सासके द्वारा ही झेलना पड़ा जो स्वयं एक स्त्री है। इस प्रकार जिसकी चर्चा इस लेख के शुरूआत में की गयी थी कि सत्ता शेषितोंको भी धीरे-धीरे अपने अनुसार ढाल लेती है यह सास भी उसी सत्ता की उपज है। जब तक स्त्री को उसके अन्तः प्रेरणा को जागृत कर स्वयं के महत्व और अर्थवत्ता के लिए जागरूक नहीं किया जाएगा तब तक स्थिति यही बनी रहेगी। कभी रेनुबनकर स्वयं टिपिकलपत्नी होना चाहेगी तो कही बेटी के रूप में अपनी माँ मंजूको फालतू समझेगी तो कभी सासके रूप में बहु के बेटी पैदा करने पर उसे अपमानित और तिरस्कृत करेगी। इस प्रकार स्वयं के खिलाफ साजिश करने वाले इन पात्रों को अपने समाज में आसानी से देखा जा सकता है। जो स्वयं प्रकाश के कहानियों में कभी युवा, कभी पत्नी तो कभी सास के रूप में आए है। यह अलग बात है कि ये सारे पात्र अलग-अलग कहानियों के पात्र है परन्तु ध्यान से देखें तो एक ही स्त्रीअपने जीवन के विविध पहलुओं में अपनी भूमिका अदा करती है। वह नहीं बदल पाती रूढ़िवादी भारतीय समाज के संस्कारों से निर्मित अपने व्यक्तित्व को। यही कारण है कि स्वयं भागकर अन्र्तजातीय विवाह करने वाली प्रेमिका जब माँबनती है जो अपने ही नाबालिग बेटी की शादी बिना उसके मर्जी करती है। क्याँ यह भारतीय माँहोने की उसकी मजबूरी है?

यदि हाँ, तो इसे बदलना ही पड़ेगा।

संदर्भ ग्रंथ

  • शोध छात्र, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
  • चर्चित कहानियाँ- स्वयं प्रकाश, सामयिक प्रकाशन
  • छोटू उस्ताद- स्वयं प्रकाश, किताबघर प्रकाशन
  • स्वयं प्रकाश चुनिंदा कहानियाँ, स. हिमांशु पंण्डया साहित्य भंडार
  • नीलकांत का सफर- स्वयं  प्रकाश, अरु पब्लिकेशन्स

बीरज पाण्डेय
शोधार्थी, डीयू

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here