स्वतंत्रता के पश्चात सामाजिक जीवन में आया बदलाव | डॉ. कुसुम संतोष विश्वकर्मा

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परिवर्तन प्रकृति एवं मानव का नियम है। समाज प्रकृति का ही एक अंग है। इस कारण सामाजिक परिवर्तन भी प्राकृतिक एवं स्वाभाविक है। संसार में कोई भी ऐसा समाज नहीं है, जो पूर्ण तथा अपरिवर्तनशील समाज है। यदि हम सौ वर्ष पुराने समाज की तुलना आज के आधुनिक समाज से करें तो उसके स्वरूप रचना आदर्शों, मूल्यों, संस्थाओं रीति -रिवाज़ो व्यवहारों एवं कार्य के ढंग में कितना परिवर्तन हुआ, यह देख कर आश्चर्य होता है। अपरिवर्तनशीलता समाज को पतन की ओर ले जाती है। सामाजिक जीवन के प्रत्येक आयामों में परिवर्तन होता है; आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, अथवा सामाजिक आदि कोई भी क्षेत्र हो। समाज का अर्थ मनुष्यों का समूह नहीं अपितु सम्बन्धों का जाल है। यह सम्बन्ध सामाजिक जीवन के प्रत्येक पहलू के विस्तृत होने के साथ ही जटिल होता जाता है। इन्हीं सम्बन्धों दायित्वों तथा कर्तव्यों का निर्वाह ही समाज की कल्पना को साकार करता है। स्वतंत्रता के बाद समाज में जो बदलाव आया, उन्हें दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है- (1)‘ग्रामीण जीवन’ तथा (2)‘नगरीय जीवन’।

ग्रामीण जीवन : –

स्वतंत्रता के बाद गांवों में आधुनिकता का प्रसार होने लगा। भारतीय ग्रामीण समुदाय में आधुनिकता का प्रभाव ब्रिटिश शासन के समय से ही परिलक्षित होने लगे थे। परन्तु सम्पूर्ण भारत में पश्चिमीकरण की प्रक्रिया का प्रभाव सामान रूप से न होने के कारण आधुनिकता भी विभिन्न स्थानों और विभिन्न वर्गों में अनेक रूपों में देखने को मिलती है। स्वतंत्रता से पहले आधुनिकता केवल अंग्रेजों के सम्पर्क में थी अतः इन्हीं जातियों में आधुनिकता के लक्षण सर्वप्रथम दृष्टिगोचार हुए।

स्वतंत्रता के पहले ग्रामीण समूह कुछ सीमा तक आधुनिकता से प्रभावित था। ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजों ने ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक संरचनात्मक परिवर्तन करके अपने व्यापारिक स्वार्थ हेतु आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को अनजाने प्रोत्साहन दिया। यह संरचनात्मक परिवर्तन प्रशासन, नौकरशाही व्यवस्था, नवीन न्यायपद्धति, पुलिस और सेना की स्थापना, शिक्षण संस्थाओं में वृद्धि, संचार एवं परिवहन के साधनों का विकास तथा कृषि की नवीन प्रविधियों के रूप में था। संचार एवं परिवहन के साधनों ने जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय दूरी को कम करके विभिन्न ग्रामीण समूहों के बीच सम्पर्क को प्रोत्साहन दिया गया, वहीँ नवीन शिक्षा के प्रसार ने सभी धर्मों, जातियों, में स्त्री और पुरुष दोनों को सामान रूप से विकास के अवसर प्रदान किए।  आजादी के बाद जीन पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बना रहा और उनकी विभिन्न विशेषताओं  का प्रसार हुआ, उसके प्रभाव से अनेक अन्धविश्वास और कुरीतियाँ समाप्त होने लगीं। इसके परिणामस्वरूप बीसवीं शताब्दीं के आरम्भिक समय से ही गावों में भी समाज सुधार की प्रक्रिया को प्रोत्साहन मिला।

भारत में स्वतंत्रता के पश्चात वयस्क मताधिकार के द्वारा स्थापित संसदीय जनतंत्र, समाजवादी व्यवस्था, सामंती सुविधाओं का उन्मीलन, पंचायतीराज वयवस्था की स्थापना तथा पंचवर्षीय योजनाओं के अंतर्गत विकास गावों में तेजी से होने लगा, जिन्होंने ग्रामीण जीवन को व्यापक रूप से प्रभावित करना प्रारम्भ दिया। पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा ग्रामीण पुनर्निर्माण के लिए किए गए प्रयत्नों से गावों में अनेक संरचनात्मक परिवर्तन होने लगे। स्वतंत्रता के बाद गांवों में यातायात के साधनों के प्रसार तथा शिक्षण संस्थाओं में वृद्धि होने लगी। इसी के फलस्वरूप ग्रामीण खान-पान के क्षेत्र में अनेक आधुनिक वस्तुओं का उपयोग होने लगा। खान-पान के बर्तन अब पहले जैसे न हो कर स्टील और चीनी मिट्टी के बर्तनों का रूप धारण करने लगे और व्यापक रूप में इनका उपयोग होना आरम्भ हो गया। पुरुष और स्त्रियों की वेश-भूषा में भी परिवर्तन आने लगा। साइकिलें, मोटरगाड़ी, स्कूटर, घड़ी, रेडियो, ट्रांजिस्टर इत्यादि गांवों में भी लोकप्रिय होने लगे। आंद्रे बिते का कथन है कि – घर में ग्रामीण स्त्रियाँ पूर्ण तथा परम्परागत ही थीं, लेकिन घर के बाहर उनके जीवन में आधुनिकता दिखाई पड़ने लगी।

 घर के अंदर गैस का चूल्हा, स्टोव, बिजली का पंखा, प्रेशर कुकर, सौन्दर्य प्रसाधन आदि आधुनिक वस्तुएँ उपयोग में लाई जाने लगीं। गांवों में विवाह के अवसर आधुनिक ढंग से की गई सजावट को महत्व दिया जाने लगा और आधुनिक ढंग के पेय पदार्थों का प्रयोग किया जाने लगा। गाँवों की आधुनिकता का एक स्पष्ट लक्षण कृषि के नवीन प्रविधियों के उपयोग के रूप में देखे को मिलता है। अधिकांश ग्रामीण कृषक नए प्रकार के हलों, ट्रैक्टरों, पावरटीलर्श, कल्टीवेटर्श, स्पेयर्ष, डसटर्श, थ्रेशर तथा पम्पिंग सेटों का प्रयोग करने लगे। गाँवों में ऐसे व्यक्तियों की संख्याँ कम हो गई, जो नए बीजों, रासायनिक खादों और कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करके अपनी ऊपज में वृद्धि करने का प्रयत्न न करते हों। कृषि की इन आधुनिक प्रविधियों का प्रसार, मित्रों, पड़ोसियों अथवा सम्बन्धियों द्वारा न हो कर प्रशिक्षित सरकारी कर्मचारियों के द्वारा होता था। इसके फलस्वरूप ग्रामीण सेवकों, खण्ड विकास अधिकारियों, कृषि अधिकारियों, पशु चिकित्सकों, पंचयत राज अधिकारियों और सहकारिता विभाग के अधिकारियों आदि से द्वैतीयक सम्बन्ध रखना उपयोगी समझने लगे थे।

ग्रामीण स्तर पर विकास की सभी सुविधाएं प्राप्त न कर पाने के कारण ग्रामीणों का ब्लाक, तहसील और जनपद स्तर पर संपर्क बढ़ा जिससे बाहरी दुनिया के प्रति उनकी जागरूकता व ज्ञान में वृद्धि हुई। ग्रामीण स्तर पर अनेक नए संगठन और युवक दल महिला मण्डल आदि की स्थापनाओं से ग्रामीणों में आधुनिकता का प्रसार हुआ। कृषि का व्यापारीकरण हो जाने से गाँवों में अधिक-से-अधिक विशेषीकृत फसल उगाई जाने लगी।

गाँवों में आधुनिकता का एक विशेष कारण शिक्षा के प्रति ग्रामीणों की बदलती हुई मनोवृत्तियों के रूप में स्पष्ट होने लगा था। अधिकांश ग्रामीण अपने बच्चों को उच्च शिक्षा देने के पक्ष में थे। ग्रामीण क्षेत्रों में व्यवसाय सम्बन्धित प्रतिबंध भी ढ़ीले पड़ गए थे। प्रत्येक ग्रामीण अपने लिए व्यवसाय का चुनाव करते समय उससे सम्बन्धित सामाजिक प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते थे, जातिगत नियमों को नहीं। गाँवों में जजमानी व्यवस्था का प्रभाव पहले की अपेक्षा बहुत कम हो गया। सेवा देने वाली विभिन्न जातियाँ परम्परागत सम्बन्धों के आधार पर सेवाएँ प्रदान नहीं करती थीं, बल्कि लाभ और प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए किसी भी व्यक्ति को सेवाएँ प्रदान कर सकती थीं। बाल काटने वाला नाई अब किसी गाँव अथवा जाति समूह की प्रजा नहीं होते थे, बल्कि वे गाँव से बाहर सलून खोल कर अनेक गाँवों के लोगों को सेवा देना पसंद करते थे। इसी प्रकार कुम्भकार जजमानी व्यवस्था के आधार पर अपने द्वारा बनाए गए मिट्टी के बर्तन किसी को देने की अपेक्षा खुले बाजार में बेचना पसंद करने लगे। गरीबी और बेरोजगारी का अभिन्न रिश्ता था। गाँवों के लिए तो ये दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू थे। गाँव का गरीब बेरोजगारी की मार खा कर शहर और क़स्बे की ओर भागता था। ऐसा इसलिए क्योंकि गाँव में एक तो रोजगार के साधन अत्यल्प थे, दूसरे गाँव हद दर्ज़े की शोषण प्रवृत्ति से लैस थे। शोषण की तलवार हर जगह के गरीबों को अपना शिकार बना रही थी। ऐसे में गाँव का गरीब निर्धनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ, भुखमरी का शिकार होता था या शहर जा कर मजदूरी करता था। इसी प्रकार अनेक काम करता लेकिन उसकी स्थिति बाद-से-बदत्तर होती चली जाती।

स्वतन्त्रता के पश्चात गाँवों में पंचायतों की छाव में गाँधी जी एक आदर्श ग्राम की कल्पना साकार देखना चाहते थे। 28 जुलाई 1946 के “हरिजन” में गाँधी जी ने लिखा था- ‘स्वतन्त्रता नीचे से आरम्भ होनी चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक गाँव एक गणराज्य अथवा पंचायतराज होगा।’ गाँधी जी के इस कल्पना के आलोक में शासन के विकेंद्रीकरण की नियति से सामूहिक स्वशासित ग्राम जनतंत्र की प्रतीक पंचायत सं.1959 की गाँधी जयंती से आरम्भ हुई।

जिस उत्साह के साथ लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने और गाँव के विकास के लिए भारी-भरकम योजनाओं का श्रीगणेश हुआ, वह उत्साह अल्पजीवी प्रमाणित हुआ और ग्राम पंचायत असफल हो कर अपने लक्ष्य से तो भटके ही ग्राम प्रधान ने गाँवों के सहज भाईचारे को विखंडित कर दिया। गाँवों को टुकड़े-टुकड़े में बाँट कर एक दम घोटू माहौल भी तैयार कर दिया। जिसने गंवई मानसिकता को लूटखसोट, झूठ-फ़रेब और मुक़दमेबजी का शिकार बना दिया। ऐसे माहौल में गाँव जावर के बड़े आदमियों की बन आई। गरीब तबका एक बार फिर से पिसने को अभिशप्त हो गया। ग्राम पंचायत के पीड़ित व्यक्तियों को शीघ्र और बेहतर न्याय सुलभ करने के लिए न्याय पंचायत बनी, यहाँ भी न्याय केवल बड़े लोगों के लिए सुरक्षित रखा गया। पंच एवं सरपंच अपने निजी और वर्गीय स्वार्थों से ऊपर उठ कर न्याय करने में सर्वथा अक्षम रहे।

इस देश में भूमि सुधार के लिए जिस चकबंदी की शुरुआत 1912 में ही हो गई थी उसकी रफ्तार आजादी के बाद तेज हो गई और छोटे कास्तकारों की बेहतरी की दिशा में उसे मोड़ा गया। विभिन्न प्रान्तों में तत्संबंधी कानून बनाए गए। 1970 तक देश में एक करोड़ पचहत्तर लाख एकड़ भूमि की चकबंदी का अनुमान किया गया। चकबंदी से आर्थिक लाभ तो हुआ ही, एक जबरदस्त मानसिक बदलाव भी आया। परम्परागत पैतृक भूमियाँ अदल-बदल गईं और एक जकड़न टूटी। भूमि के साथ लगा अनन्य अपनत्व गया। प्रत्यक्ष लाभ से अन्य सुधारों के प्रति आस्था जगी यद्यपि चकबंदी भ्रस्टाचारों से गाँव हिल गए, परन्तु सब मिलाकर लाभ हुआ।

आज़ादी के बाद पिछड़ी हुई जातियों और अनुसूचित जातियों में एकता और जागरूकता आई। इससे पहले इनकी सामाजिक स्थिति दयनीय थी। बाद में शिक्षा, नौकरी इत्यादि के क्षेत्र में सुविधा मिलने के कारण इनमें आत्मविश्वास की भावना आई।

नगरीय जीवन : –

स्वतंत्रता के पश्चात् भारतवर्ष में विकास की जितनी भी योजनाएं बनाई गई उनसे नगरों का विकास अधिक हुआ। कहने के लिए भारतवर्ष गाँवों का देश था। गाँधी जी ने अपने आश्रमों की स्थापना गाँव के अंदर की थी। उनके सामाजिक लक्ष्य में ग्राम विकास को प्रमुखता दी गई। इसलिए महात्मा गाँधी कुटीर उद्योग पर विशेष बल देते थे। लेकिन पंचवर्षीय योजनाओं के द्वारा ये सारी चीजें उलट गई। पाश्चात्य देशों में जिस प्रकार नगरों को महत्व दिया जाता है, उसी प्रकार से भारतवर्ष में भी नगरों को महत्व दिया जाने लगा। परिणामस्वरूप गाँवों से पलायन करके लोग  नगरों की ओर उन्मुख हुए। नगरों में जीवन की सुविधाएँ और रोजगार के साधन अधिक थे। इसलिए नगरों की ओर पलायन करना स्वाभाविक था। दूसरा परिणाम यह हुआ कि नगरों में अधिक-से-अधिक पूंजी सिमटती गई। तीसरा परिणाम यह हुआ कि बहुत से औद्योगिक नगर स्थापित हुए। इन सब के चलते नगरीकरण इतनी तेजी से बढ़ा कि एक प्रकार से नई सभ्यता ने जन्म ले लिया। नगरों की जनसँख्या बढ़ने लगी जनसंख्या का घनत्व अधिक होने के कारण आकार बढ़ा। नगरों में अनेक प्रकार के बेमेल लोग एक जगह रहने लगे। लाउज विरथ के आनुसार – नगरों में जनसंख्या में वृद्धि के कारण सम्बन्धों में परिवर्तन आया।

नगरों में कृत्रिम, स्थाई और दिखावट से भरे हुए सम्बन्ध विकसित हुए। नगरीकरण के कारण जीवन में, व्यक्ति और व्यक्ति के सम्बन्ध तथा व्यक्ति और समाज के सम्बन्ध नए रूपों में परिवर्तित हुए। समाजशास्त्रियों के कथनानुसार तीन प्रकार के नगरों का विकास हुआ जैसे मध्यकालीन नगर, आवस्थित नगर, महानगर औद्योगिक नगर। अनेक योजनाओं के परिणामस्वरूप मध्यकालीन नगरों का स्वरूप तेजी से परिवर्तित हुआ; बनारस, मथुरा, आगरा, हरिद्वार आदि प्राचीन तथा अकबरपुर, मुगलसराय आदि मध्यकालीन नगरों का स्वरूप भी बदला।

    स्वतन्त्रता के बाद नगरों का जिस तरह से विकास हुआ उसी प्रकार से नगरीय जीवन का विघटन भी तेजी से हुआ। इन नगरों के सामाजिक संरचना में स्थाईत्व था। व्यक्तियों के सामाजिक सम्बन्ध कृत्रिम और अस्वाभाविक होने लगे थे। व्यक्ति ने अपने को भीड़ में खोया पाया। यहाँ भिन्न-भिन्न धर्मों, सम्प्रदायों के लोग एक जगह पर आकर इकट्ठे हुए। इसलिए सामाजिक असमंजस्य स्थापित हुआ।

लोगों में व्यक्ति वादिता उभरी, परिवारों का जो आकार था वह विघटित हुआ। संयुक्त परिवार समाप्त होने लगे। पति-पत्नी और संतानों तक परिवार सिमट कर रह गया। महानगरों में तो पति-पत्नी ही अपने को परिवार मान लेते हैं। नगरों में आर्थिक दबाव ने स्त्रियों को भी व्यवसाय या नौकरी में लाया, इसका परिणाम यह हुआ कि परिवार का पितृसत्तात्मक रूप विघटित होने लगा।

इन नगरों के विकास के साथ ही घर भी महत्वहीन होते गए। नगरों में लोगों के लिए रिश्ते महत्वहीन हो गए। नातेदारियों का निर्वाह लोगों को रुढ़िवादी लगने लगा। नगरों के विकास ने स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन ला दिया। पत्नी-अपने को पति से उच्च नहीं तो कम-से कम सामान मानने लगी। अब स्त्री दासी नहीं रही। स्त्रियाँ सामाजिक गतिविधियों में स्वंत्रता से विचरण करने लगीं। इनका भी सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में स्वच्छन्दतापूर्वक आना-जाना आरम्भ होने लगा। स्त्री-पुरुष की बदलती इस विचारधारा के कारण यौन सम्बन्धी धारणाएँ भी परिवर्तित हुईं। विवाह से पूर्व प्रेमसंबंध, तलाक, पुनर्विवाह, वैवाहिक जीवन में भी समानांतर दूसरा प्रेम आदि स्थितियां नगरीय जीवन में दिखाई देने लगीं।

उपर्युक्त परिस्थितियों के परिणाम स्वरूप व्यक्ति आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुआ, लेकिन पारिवारिक तनाव बढ़ गया। विवाह विच्छेद होने लगे। पति-पत्नी के वैवाहिक जीवन में अनेक प्रकार की समस्याएँ आने लगीं। वैवाहिक सम्बन्धों के विच्छेद के पश्चात् संतानों के लालन-पालन का प्रश्न उठा। माता-पिता और संतानों में संघर्ष होने लगा। संयुक्त परिवार में जहाँ सुरक्षा की निश्चितता थी, यहाँ उसका अभाव हो गया तथा परस्पर विश्वास में कमी आई।

माता-पिता के सम्बन्धों में विघटन के परिणाम स्वरूप समाज अन्य समस्याओं से जूझने लगा। जिसमें बाल अपराध महत्वपूर्ण हैं। नगरीकरण की असंतुलित वृद्धि के साथ पारिवारिक विघटन की प्रक्रिया जैसे-जैसे तीव्र होती गई, बाल अपराधों की दर तथा प्रकृति में अभूतपूर्व वृद्धि होने लगी। देश में एक बड़ी संख्या में बालक और किशोर अपराधों की ओर प्रवृति हुई।

स्वतंत्रता के पहले अपराध का सम्बन्ध व्यक्ति की आर्थिक कठिनाइयों के कारण मानसिक विकारों तथा दोषपूर्ण संगति से था। लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात् स्थितियां बदलीं, अपराधियों का एक बड़ा वर्ग वह था जो ऊपर से बहुत संभ्रांत है तथा सज्जन और प्रतिष्ठित दिखाई देता था, लेकिन धन के संचय की लालसा के कारण उसका जीवन अपराधों से घिरा होता था। ऐसे अपराधियों को श्वेतवसन अपराधी कहा जाता है। तस्करी, जालसाजी, करों की चोरी, कालाबाजारी, मिलावट नकली सिक्के बनाना तथा अन्तरराष्ट्रीय अपराधी संगठनों का संचालन करना उनकी जीविका का आधार था। श्वेतवसन अपराधों की एक मुख्य विशेषता यह थी कि इसमे केवल पुरुष ही नहीं हजारों स्त्रियाँ भी सक्रिय भूमिका निभाने लगीं। इसके फलस्वरूप व्यक्ति का जीवन इतना असुरक्षित तथा भयग्रस्त हो गया था कि इमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से कोई कार्य कर पाना ही कठिन हो गया।

स्वतंत्रता के पश्चात् वैश्यावृत्ति की समस्या भी गंभीर रूप धारण करने लगी। पहले जहाँ सार्वजानिक स्थानों पर वैश्याओं का संचालन होता था, 1956 में स्त्रियों तथा कन्याओं का अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम पास हो जाने के बाद भी इस समस्या में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हो सका। बहुत-सी लड़कियों तथा स्त्रियों, काल्गर्ल, कैफे डांसर तथा सोसाइटी गर्ल के रूप में अनैतिक कृत्य के साथ अपराधी व्यवहारों में रूचि लेने लगीं। इनका कार्य प्रतिष्ठा की आड़ में अधिकारियों से मनमानी सुविधाएँ उपलब्ध कराना, तस्करी करना तथा सभी युवकों को दुराचर की ओर प्रवृत करना होता था। वैश्यावृत्ति सामाजिक विघटन का एक बड़ा कारण बनी। इनके मोह में फसे व्यक्ति का परिवार संगठित नहीं रह पाता था। समाज में यौन रोगों के प्रसार में ये एक महत्वपूर्ण कारण है। अनेक सरकारी प्रयासों के बावजूद भी इसपर नियंत्रण नहीं पाया जा सका।

स्वतंत्रता के पश्चात् जैसे-जैसे समय बीतता गया अनेक समस्याओं के साथ मद्यपान की समस्या भी समाज में अपना असर दिखाने लगी। यह समस्या मुख्य रूप से आधुनिकता के भ्रमपूर्ण धारणा तथा निम्न वर्ग के आर्थिक तनाव से आधिक जुड़ी थी। उच्च वर्ग के व्यक्ति मद्यपान को फैशन और प्रतिष्ठा का सूचक मानते थे, जबकि श्रमिक वर्ग के व्यक्ति अनेक चिंताओं तथा निराशाओं से मुक्त होने के लिए इसे एक सहारे के रूप में देखते थे। स्थिति यह हुई कि समाज का अधिकांश युवा वर्ग इस लत की चपेट में आकर अनेक अपराधों में संलिप्त हो गया। नगरीयजीवन में बेकारी की समस्या एक ऐसी समस्या थी जो अनेक गंभीर समस्यों को जन्म देती गई। ये समस्याएँ केवल आर्थिक जीवन को प्रभावित नहीं करतीं बल्कि सामाजिक जीवन भी इससे अत्याधिक प्रभावित हुआ। बेकारी की समस्या के निवारण के लिए भारत सरकार ने अनेक उपाय किए जैसे:- पंचवर्षीय योजनाओं का आरंभ, बंधुआ मजदूरी प्रथा, फसल बीमा योजना आदि अनेक प्रयासों के बाद भी इस पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका। भारतीय समाज विभिन्न सम्प्रदायों का बहुत लम्बे समय तक समन्वय स्थल बना रहा लेकिन भारत के विभाजन के पश्चात् मुस्लिम लीग, मुस्लिम मजलिस, हिन्दू महासभा तथा इसी प्रकार की अनेक संगठनों का उदय हुआ, जिनके कारण साम्प्रदायिकता और तेजी से फैली।

उपर्युक्त विवेचनों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता के पश्चात् गाँवों में भी आधुनिकता आ गई थी। यह आधुनिकता, फैशन, बेरोजगारी, ग्राम पंचायत, जातिवाद, मुकदमेबाजी, चकबंदी, खेती-बारी के साधनों का विकास इत्यादि के रूप में आई। नगरीकरण के प्रभाव के कारण संयुक्त परिवार का विघटन हुआ, दाम्पत्य जीवन में तनाव, पति-पत्नी के बीच अविश्वास, स्त्री शिक्षा पर बल दिया गया। स्त्रियाँ नौकरी करने लगीं, बाल अपराध फैलने लगे, समाज में नशा खोरी, वैश्यावृत्ति, बेकारी, जातिवाद ने अपने पैर फैला दिए। इस प्रकार स्वतंत्रता के बाद समाज ने अनेक कोणों से स्वयं को बदला। यह बदलाव कहीं नकारात्मक था तो कहीं सकारात्मक।

डॉ. कुसुम संतोष विश्वकर्मा
मुंबई, महाराष्ट्र

 

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