स्वयं प्रकाश के निबंधों में नव-भारत की संकल्पना | बीरज पाण्डेय

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किसी भी रचनाकार या कलाकार की कृतियाँ उसके मानसिक उपज और बुनावट की अभिव्यक्ति होती हैं। कलाकार जिस वातावरण में रहकर स्वयं के रचनात्मक मानस का विकास करता है उसी के अनुरूप उसकी रचनात्मकता करवट लेती है। इसलिए किसी भी रचनाकार के साहित्य या फिर कला के आलोचना से पहले यह जानना अत्यन्त आवश्यक है कि रचनात्मकता की दिशा कैसे बनती रही, बदलती रही और इस दिशा को गतिमान करने वाली उर्जा कहाँ से मिलती रही।

हमारी अभिव्यक्तियाँ वस्तुतः हमारे विचारों की रचनात्मक परिणति होती हैं। साहित्य में विचार कल्पना के साथ घुलकर आते हैं तो ज्यादा प्रभावशाली और संप्रेषणीय होते हैं परन्तु निबंध साहित्य की वह विधा है जिसमें आप लेखक के मानसिक बनावट-बुनावट, विचारधारा और जीवन दर्शन से सीधे साक्षात्कार करते हैं।

स्वयं प्रकाश के साहित्य का अध्ययन करना आपके मन में कहानी कला के प्रति लगाव और भाषा के प्रति रोमांच पैदा करता है। लोककला शैली के माध्यम से जब वह अपनी बात रखते हैं, या फिर पात्रों और प्रतीकों  के माध्यम से अपनी बात कहते हैं तो हो सकता है कि पाठक कहानी के कथ्य की मार्मिकता में खो जाए और उसका उसमें छिपे प्रश्नों से उसका सामना न हो। वस्तुतः कहानीपन की यह शैली भी कहानी को बनाए रखने के लिए अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि साहित्य सिर्फ अकादमिक और आलोचनीय जगत के लिए नहीं लिखे जाते। साधारणीकरण के माध्यम से पाठकों के हृदय में प्रेम, करुणा, दया और क्रोध जगाना भी साहित्य का लक्ष्य है। सिर्फ विमर्श और सतर्कता कहीं-न-कहीं साहित्य के संप्रेषणीयता के मूल स्वरूप पर अतिक्रमण की भाँति रहे हैं। इसीलिए कथा साहित्य जहाँ हमारे भावनाओं का विरेचन करता है वहीं निबंध हमें सीधे जोड़कर परिष्कार के लिए प्रयास करने को प्रेरित करते हैं। इसी उद्देश्य से ही स्वयं प्रकाश के निबंध भी लिखे गए हैं।

स्वयं प्रकाश के निबंधों की विविधता के कारण उन्हें किसी एक ‘स्ट्रीम’ का निबंधकार नहीं कह सकते हैं। उनके निबंधों को पढ़ने पर अनायास उनके निबंधों के लिए ‘बंधनमुक्त निबंध’ शब्दावली मन में आने लगी। स्वयं प्रकाश के  क्रमशः ‘दूसरा पहलू’, ‘रंगशाला में एक दोपहर’ और ‘एक कहानीकार की नोटबुक’ नामक तीन निबंध-संग्रह प्रकाशित हैं।

उनके निबंधों में देश की संस्कृति से लेकर बाज़ार, साहित्य, सिनेमा, टीवी, महिला समस्या, पर्यावरण, लोक-शास्त्र सबकुछ है। वस्तुतः एक साहित्यकार के रूप में अपनी सीमाओं को पहचानने वाले स्वयं प्रकाश ने निबंधों के माध्यम से सामान्य भाषा में वह सबकुछ लिखने-कहने का प्रयास किया जो एक आम व्यक्ति के लिए उपयोगी और समझने योग्य है। वे खुद साहित्य की सीमाओं में बंधे लोगों के लिए कहते हैं- ‘‘साहित्यकार की आपसी चिट्ठी-पत्री भी साहित्य के बाहर के प्रश्नों को अक्सर नहीं छूती। मसलन वहाँ एक-दूसरे के परिवार के समाचार तो होंगे परन्तु शहर के नहीं।’’[1]

साहित्य जगत की इस ‘रिंग-कल्चर’ को तोड़ने का प्रयास ही उनके निबंधों की प्रेरणाभूमि रही है। वे स्पष्ट कहते हैं- ‘‘मुझे लगता है कि साहित्य की बेहतरी के लिए भी साहित्य से बाहर निकलना जरूरी है।’’[2]  वे जानते हैं कि साहित्य को सिर्फ पात्रों और घटनाओं को कल्पना के माध्यम से कथा के द्वारा प्रस्तुत कर समाज का दीर्घकालिक हित संभव नहीं हैं। इसीलिए ‘दूसरा पहलू’ की भूमिका में ही वे कहते हैं- ‘‘हिन्दी गरीब आदमी की भाषा ही सही, वह इतनी दरिद्र भी नहीं कि उसपर वर्षों अनुवाद पेले जा सके।’’[3]

साहित्यकार को अपने साधारण समझ से ही सामान्य विषयों पर सामान्य लोगों के लिए लिखना चाहिए। अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, समाज के विविध पहलू आवाम के समझ में आए इसके लिए ‘पहल’ जरूरी है। ‘आयातित दर्शन’ या ‘आयातित भाषा’ से कोई भी देश उन्नति या तरक्की नहीं कर सका है। स्वयं प्रकाश इस सीमा को समझने वाले समाजशास्त्री है। ‘समाजशास्त्री’ शब्द का प्रयोग मैं यहाँ सयास कर रहा हूँ। स्वयं प्रकाश के बारे में लिखने वाले को परिपाटी तोड़ने या नयी परिभाषा गढ़ने का साहस तो करना ही चाहिए। आवाम की आवश्यकता के प्रति सचेत स्वयं प्रकाश लिखते हैं- ‘‘अंग्रेजी में सोचने बोलने वाला समाज वैज्ञानिक चाहे जितना महान हो- हमारी जनता के किस काम के।”[4] ‘हमारी जनता’ शब्द जाकर पाठक को छू जाता है और जरुरतमंद हिन्दी भाषी के मन में स्वयं प्रकाश के लिए एक कृतज्ञता जग उठती है। यही कारण है कि कितने लोग ऐसे हैं जो मानवता के सबसे बड़े सिपाही बनने का दावा कर रहे हैं, मानवीयता के नींव पर अपने साहित्यिक जगत का ‘ताजमहल’ बना रहे हैं, परन्तु उसकी रचनाएँ, उनके विचार दुरुहता के उस स्तर पर हैं कि उसे अकादमिक बहसों और मानसिक जुगली के लिए आरक्षित कर दिया जाता है। इस प्रकार भाषा और अभिव्यक्ति का टेढ़ापन ‘मानव’ को ‘केस स्टडी’ बनाकर रख दिया है। इसलिए स्वयं प्रकाश भाषा के सहजता और संप्रेषणीयता के साथ कथा साहित्य से लेकर निबंधों तक में प्रस्तुत होते हैं। उनके भाषा का चुटीलापन उनके साहित्य की विशेषता रही है जो पाठक को जोड़ने की कार्य करता है, ‘‘चश्मित घरुटित थुलथुला किसी साहित्यिक संस्था का सचिव था। उसके पास बैठा धोतित- कुर्तित किसी साहित्यिक संस्था का सचिव था। उसके बगल में बैठा बंडित-झोलित किसी साहित्यिक संस्था का सचिव था।’’[5]

इस प्रकार भाषा का यह नया प्रयोग जहाँ पाठक को जोड़ता है वहीं कथ्य की गंभीरता को कम नहीं होने देता। उनके निबंधों में गंभीर चिंतन के साथ चुटीली भाषा उसी प्रकार महत्व रखती है जैसे गाँधीजी के लिए देश की आजादी और मूंगफली से होने वाले फायदे। यथा- ‘‘भद्र पुरुष भौंहो को उनकी सीमा तक उचकाकर फ्रीजप्राय हो जाते हैं।’’[6] इस वाक्य में ‘भद्र-पुरुष’ निराला के उस ‘श्रेष्ठ-मानव’ की व्यंजनापूर्ण अर्थ को घोषित करता है जहाँ बुद्धिजीवी होने की पहली शर्त है मनहूस होना। इसी उपरी लबादे को उतार फेकने के हिमायती हैं स्वयं प्रकाश। यही कारण है कि वे अपने समाज, देश और लोक से गहरे स्तर पर जुड़े हैं- ‘‘लोक एक संपूर्ण जीवनशैली है। अपने देश काल से संपृक्त और एक विशेष प्रकार की सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी हुयी- जो कि एक विशेष प्रकार की उत्पादन पद्धति की उपज है। यह न मानने की जिद आज के कलाकार के तमाम परिश्रम को लगभग व्यर्थ कर देती है।’’[7]

इस प्रकार स्वयं प्रकाश अपने देश और लोक से गहरे स्तर पर जुड़ाव रखते हैं। उनका मानना है कि भारत में ऐसी बहुत-सी मूल्यवान संकल्पनाएँ हैं जिसे पुनः स्थापित कर हम एक ‘नये-भारत’ का निर्माण कर सकते हैं। यह भारत उदासीनता, गरीबी, बेरोजगारी, प्रदूषण, अराजकता से मुक्त होगा। उदात्त मूल्यों के सृजन, संरक्षण और मानवता के लिए विषाक्त तत्वों को अपने समाज और संस्कृति से अलग करके ही हम एक मजबूत राष्ट्र बना सकते हैं। उनके अनुसार- ‘‘इस समय हमारे देश को जिन मूल्यों की सबसे अधिक आवश्यकता है। वे हैं- समता, सादगी और स्वदेशी। हम इसे जीवन में अंगीकार कर और रचना में चरितार्थ करें, यही आज हमारे सामने बड़ी चुनौती है।’’[8]  इन चुनौतियों का सामना करके ही हम एक सभ्य समाज, सफल राष्ट्र और समन्वयकारी भारत का निर्माण कर सकते हैं। ये युनौतियाँ कहीं सांस्कृतिक संकट के रूप में हैं, तो कहीं कृत्रिम विभेदों से उपजी मानवता की त्रासद स्थिति के रूप में। कहीं बाजार और उपभोक्तावादी संस्कृति के रूप में हमारे सामने है, तो कहीं पर्यावरण और विकास के टकराव के रूप में। इन सबसे निपटने के लिए हमें सामूहिक प्रयास करना होगा। इसलिए स्वयं प्रकाश साहित्यकारों को एक संवेदनशील और जिम्मेदार समाज-वैज्ञानिक की भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करते हैं- ‘‘साहित्य को मनुष्य का नया मन बनाना होगा। हमें समतावादी जीवन मूल्यों का प्रचार-प्रसार अनथक रूप से करते जाना है। केवल आर्थिक संघर्षों का जोशीला चित्रण पर्याप्त नहीं है। शिक्षा, रोजगार, विवाह, प्रेम, दांपत्य, वात्सल्य, न्याय, प्रशासन, पर्यावरण, प्रकृति आदि जीवन के विविध पक्षों पर जबतक हमारा विजन रचना में नहीं उतरेगा, काम पूरा नहीं होगा।’’[9]

यह काम देश के सांस्कृतिक कायाकल्प की माँग नहीं करता बल्कि मूल्यों के परिष्करण और समय सापेक्ष मूल्यांकन से उपजे विमर्शों की जरूरत है। इसी कारण स्वयं प्रकाश भारतीय परंपरा में वर्णित सत्यनारायण कथा की उपयोगिता को भी रेखांकित करते हैं- ‘‘मसलन यदि कहा जाता कि सच बोलो, तो शायद ही कोई सुनता, लेकिन जब एक सत्यनारायण बना दिए गए और एक कलावती-लीलावती की कहानी तो यह संदेश सर्वसुलभ हो गया।”[10]  इस प्रकार स्वयं प्रकाश अपने निबंधों के माध्यम से भारत के लोक में वर्णित तत्वों से उर्जा और दिशा दोनों ग्रहण कर एक नवीन भारत की ओर बढ़ने की संकल्पना को ही प्रस्तुत कर रहे हैं। उनका मत है कि- ‘‘एक रचनाकार के रूप में मेरा दार्शनिक लक्ष्य मनुष्य की राष्ट्र निर्माती शक्ति को निरन्तर व्यक्त करते रहना और अन्ततः स्थापित करना है।’’[11]

इस प्रकार अपनी भूमिका के प्रति सजकता ही स्वयं प्रकाश को भारत की सांस्कृतिक बहुलता से लेकर स्त्री के सैनिटरी पैड की जरूरत तक, टेलीविजन के प्रभाव से लेकर पर्यावरण की समस्याओं तक उनके ध्यान आकृष्ट करते हैं। दूरदर्शन ने उपभोक्ता बनाकर किस प्रकार हमें मानसिक बौनेपन का शिकार बनाया है- ‘‘दूरदर्शन के विज्ञापन तकनीकी दृष्टि से इतने उत्तम, चुस्त और चालाक होते हैं कि उनसे होने वाली हानि से बचाव करने की हमें फुर्सत ही नहीं देते।’’ [12]

स्वयं प्रकाश दूरदर्शन के सिर्फ आलोचक ही नहीं बल्कि उसके अविवेकपूर्ण स्वीकरण और देश की संचार व्यवस्था द्वारा अनावश्यक प्रसारणों के प्रति चिंतित हैं। देश के युवा, क्या देखें, क्या सुनें यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय हो सकता है परन्तु सूचनाओं के हिसांत्मक प्रसारण और समय की नाजुक स्थिति को भाँपे बिना बच्चों के सामने परोसे जाने वाले कामुक, नग्न और असंवेदनशील प्रसारण मानसिक विकृति को जन्म देने में उत्तरदायी हो सकते हैं। हालाँकि स्वयं प्रकाश ने टेलीविजन पर अपना वह लेख तब लिखा जब देश में इंटरनेट क्रांति का प्रसार नहीं था। सन् 1990 के आस-पास की उनकी यह चिंता इन्टरनेट ने बढ़ायी ही है, घटायी नहीं है। इसलिए वर्तमान चिंता ‘नेट’ के चयनात्मक प्रयोगों, बच्चों के मानसिक विकास में उसकी उपयोगी भूमिका और आभासी जगत के ख्याली ‘लाइम-लाइट’ की जगह जीवन की वास्तविकता की स्थापना आज अत्यन्त आवश्यक हो गयी है। संचार के माध्यम से मिनटों में घटना का प्रचारित होना कहीं जागरूकता का पर्याय बन रहा तो कहीं समुदायों के टकराव का कारण। बिना इससे निपटे भारत के सौहादपूर्ण चरित्र को बचाया नहीं जा सकता।

स्वयं प्रकाश औद्योगीकरण के न विरोधी हैं और न ही साम्यवाद के ‘रैडिकल’ पैरोकार। पर्यावरण और औद्योगीकरण की बढ़ती टकराहट के मध्य स्वयं प्रकाश ‘मध्यम मार्ग’ अपनाने की कोशिश को प्रस्तुत करते हैं- ‘‘आवश्यकता है ऐसे उद्योगों की जो प्रदूषण न फैलाएँ, ऐसे उद्योगों की जो पर्यावरण को बिगाड़े नहीं और ऐसे प्रबंध की जो संरक्षणवादियों की कुटिलताओं को भांप सके और सही, समयबद्ध और योजनाबद्ध विकास सुनिश्चित कर सके।’’[13]  इस प्रकार स्वयं प्रकाश अपने एक ही कथन में भारत की आवश्यकता और विकसित- पूँजीवादी राष्ट्रों की शोषणकारी मानसिकता को भी उद्घटित करते हैं। यहीं कारण है कि स्वयं प्रकाश का चिंतन किसी दायरे में नहीं हैं। उनमें अर्थव्यवस्था, राजनीति, अन्तर्राष्ट्रीय संबंध, सामाजिक समस्या सबके प्रति एक ‘विजन’ है। यही विजन उनके साहित्य को दिशा देता है।

दुनिया के ‘प्र्रैगमेटिक नीति’ की समझ साहित्य के उपयोगितावाद के दायरे में नकारी जा सकती है, परन्तु स्वयं प्रकाश मानवता के लिए हितैषी, भारत के लिए जरूरी नीति के पक्ष में खड़े दिखते हैं। यहीं कारण है वे साहित्य को किसी खांचे में रखकर उसे राजनीति की लाठी बनाने के विरोधी है- ‘‘साहित्य के संदर्भ में राजनीति के शब्दों को बरतते समय सावधानी से काम लेना चाहिए। साहित्य यदि ‘वामपंथी’ होगा तो ‘दक्षिणपंथी’ भी होगा, मध्यमार्गी भी, मध्य से कुछ वाम, मध्य से कुछ दक्षिण, धुरदक्षिण, अतिवाम, परावाम और बीच के बीसियों प्रकार? बेहतर है हम उसे प्रगतिशील और प्रतिक्रियावादी जैसे विशेषणों से ही अभिहित करें।’’[14]  जहाँ भी जो प्रगतिशील है उसे आत्मसात करके ही भारत की सम्पन्नता को सुनिश्चित किया जा सकता है।

अपने देश की उन्नति के लिए, समाज को सही दिशा देने के लिए हमें अपने परम्परा को आधार के तौर पर स्वीकार करना होगा। इसी आधार पर ही आधुनिक प्रगतिशील मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में एक समृद्ध भारत का निर्माण संभव होगा। परन्तु यह समृद्ध भारत बिना महिलाओं की भागीदारी के संभव नहीं है। भारतीय परंपरा में स्त्री को चाहे देवी बनाया गया हो या दासी। दोनों ही स्थितियों में उसकी स्वतंत्र छवि और प्रतिभा को एक मनुष्य के रूप में स्थापित नहीं किया गया। कहीं उसे उदात्तता ने तो कहीं निरीहता ने बेबस बना दिया। स्वयं प्रकाश लिखते हैं- ‘‘इस बात से कौन इंकार करेगा कि महिलाएँ विश्व की पचास प्रतिशत आबादी हैं, लेकिन क्या वे सिर्फ आबादी हैं? आँकड़ों की तरह बेचेहरा और आर्थिक विश्लेषण की तरह बेजान! क्या पुरुष अपने आपको विश्व की पचास प्रतिशत आबादी और सिर्फ आबादी मानने को तैयार है?’’[15]  इस प्रकार स्वयं प्रकाश महिलाओं की रचनात्मकता और प्रतिभा को वर्षों से दमित करने वाले समाज से प्रश्न करते हैं।

वस्तुतः आजादी के आंदोलन और भारतीय संविधान के निर्मिति में भी स्त्रियों का योगदान तो रहा परन्तु हमेशा पृष्ठभूमि में। या तो उन्हें सामने आने का मौका नहीं दिया गया या स्वयं सामाजिक संस्कारों ने उसे इतनी बुरी तरह जकड़ रखा था कि वे सामने आने से बचती रहीं। इसी संस्कार का परिणाम रहा कि वे सभ्यता, शालीनता, उदारता, मातृव और समर्पण की प्रतिमा मात्र बनकर रह गईं। इस मनुष्य से प्रतिमा में बदलने की प्रक्रिया बड़ी आसानी से आप अपने समाज में देख सकते हैं। एक अदद औरत का जिक्र आते ही हमारे मानस मंदिर में जो छवि उभरती है वह माँ, पत्नी, बहन, प्रेमिका की होती है, मनुष्य की नहीं। अपने स्वत्व और अधिकार की बात न करने के पीछे उसके वे संस्कार व निर्मितियाँ हैं जो भर्तहरि से लेकर आजतक की कई संस्थाओं ने बनाएँ है। जो स्त्री को दोयम दर्जे का बताते हुए समाज के लिए इसकी उपयोगिता सिद्ध करते हैं। चाहे वो स्कन्दपुराण हो या फिर शरीयत। धर्म के ध्वजाधारियों ने स्त्री स्वतंत्रता को स्वयं के सामने चुनौती के रूप में देखा है-

पिता रक्षति कौमार्रे, भर्ता रक्षति यौवने।

रक्षति स्थविरे पुत्रा, न स्त्री स्वतंत्र मर्हति।।

उपर्युक्त जैसे अनेक सूक्ति, सूत्र, नियम, परंपरा बनाकर स्त्री की पराधीनता को संस्थागत स्वरूप देने का प्रयास किया गया।

लज्जा, शील, शालीनता को आभूषण बताकर स्त्री को एक ‘फ्रेमवर्क’ में रहने के लिए तैयार किया गया। चाहे युद्ध का हवाला देकर सती प्रथा हो, विधवा को अपशकुन मानना हो या माहवारी के दौरान अछूत मानना अनेक स्वरूपों में स्त्री के ‘मानवाधिकारों’ का उल्लंघन होता रहा।

यह तो रही स्त्री के पराधीनता के कुछ धार्मिक पहलू। परंतु आपने कभी स्त्री के पारंपरिक पहनावे पर गौर किया? यदि किया है तो कहीं भी एक ‘पॉकेट’ नहीं मिलेगी। इसका मतलब है कि समाज उसे बताता है कि तुम्हारे पास रखने के लिए कुछ नहीं है। तुम्हारी पूँजी सिर्फ ‘शरीर’ तक सीमित है, उसे ही ढ़ककर रखो। इस प्रकार स्त्री को किसी भी प्रकार की वस्तु या संपत्ति के अधिकार से वंचित करने की रणनीति भी स्त्री को मनुष्य से स्त्री बनाने में शामिल रही।

स्त्री को स्त्री बनाने की पाठशाला घर में शुरू कर दी जाती है। कैसे कपड़े पहनने हैं, कैसे बोलना है, कैसे चलना है; यहाँ तक की आवाज का ‘वॉल्यूम’ कितना होना चाहिए। बेटी प्रारंभ से ही इस साँचे में ढाली जाती है कि इसको आगे विवाह के पश्चात किस तरह से रचना चाहिए। मानों उसका जन्म सिर्फ विवाह के लिए हुआ हो। स्वयं प्रकाश स्त्रियों को उनके अन्तःवस्त्रों के प्रति संकोच को मिटाकर उन्हें समाज के हिस्से के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। स्वयं प्रकाश लिखते हैं कि गर्भवती महिला लज्जावश अपने पेट को छुपाती है क्या नये जीवन का सृजन करना भी शर्म की बात है? स्वयं प्रकाश का यह कथन स्त्री के निर्माणकारी वातावरण और द्वन्द्वों के बीच निर्मित उसके व्यक्तित्व के सच का उद्घाटन करता है- ‘‘लड़कियों को दिन में बीस बार यह सुनना पड़ता है कि वह काम उन्हें करना है क्योंकि अब वे बड़ी हो गयी हैं और बीस बार यह भी सुनना पड़ता है कि यह काम उन्हें नहीं करना है क्योंकि अभी वे बच्ची है।’’[16]  इस प्रकार महिलाओं की स्थिति, उनके मानसिक बनावट आदि को स्वयं प्रकाश बड़े ही सरल स्वरूप में सामने लाते हैं। जिस सेनिटरी पैड और महिला स्वास्थ और स्वच्छता की आज मुहिम चल रही है, उस पर स्वयं प्रकाश सन् नब्बे के दशक में ही अपनी कलम से चिंता व्यक्त कर चुके थे। ‘‘महिलाएँ इस बात को भी छिपाना आवश्यक समझती है कि उनका ‘पीरियड’ चल रहा है।… रेलों, स्टेशनों, महाविद्यालयों यहाँ तक कि कार्यालयों में भी ऐसी कोई साफ जगह नहीं होती जहाँ सेनेटरी नैपकीन महिलाएँ बदल सके और फेंक सके।’’[17]

इस प्रकार नये भारत में महिलाएँ अपने नागरिक अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सचेत होकर सामने आकर अपनी राष्ट्रनिर्माण भूमिका निभाएँ, यही स्वयं प्रकाश जी का उद्देश्य है। जिससे दुनिया के पटल पर भारत अंधभक्ति, अंधश्रद्धा और अंधानुकरण के अपने पहचान को छोड़ एक सतर्क और जागरूक राष्ट्र के रूप में उभर सके। विवेकवान होकर जो हितकारी है, शुभ है, उचित है; उसे स्वीकारें तथा जो रूढ़ि है, कुरीति है, उसे नकारने और त्यागने में संकोच न करें। अपनी परंपराओं, संस्कृतियों और व्यवस्था का परिष्कार करके ही हम एक नया भारत बना सकते हैं; जहाँ न गरीबी होगी न ही अशिक्षा, बेरोजगारी, शोषण, अत्याचार और भूखमरी। जहाँ सबके अधिकार और कर्तव्य सुनिश्चित होंगे तथा जबावदेही तय होगी। ऐसे नए भारत के निर्माण की इस मुहिम में शामिल होने का ही स्वयं प्रकाश आहवान करते हुए ‘रंगशाला में एक दोपहर’ में कहते हैं कि एक बहुत बड़े सांस्कृतिक जागरण की आवश्यकता है देश को। क्योंकि एक बहुत बड़ा राजनीतिक जागरण करवट ले रहा है। बुर्जवा राजनीति यह काम नहीं करेगी। चाहे वे पीली, हरे रंग की हो या लाल रंग की। यह हमारे गावों, शहरों, कस्बों, नगरों, जनपदों में बसने वाले नयी सोच के सिपाही करेंगे। वे ही चरितार्थ करेंगे हमारी अस्मिता, इयत्ता, स्वायत्तता और सम्पन्नता का तीसरा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण मंत्र- समता।

तो क्या भारत के नई सोच वाले युवाओं के साथ एक नये भारत के निर्माण की इस मुहिम में शामिल होने के लिए हम तैयार है?

                   -बीरज पाण्डेय
शोध छात्र, दिल्ली विश्वविद्यालय

संदर्भ-

1) दूसरा पहलू, स्वयं प्रकाश, परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद, 1990, (भूमिका से)

2) वही, भूमिका

3) वही, भूमिका

4) वही, भूमिका

5) रंगशाला में एक दोपहर, स्वयं प्रकाश, सामयिक प्रकाशन, 2002, पृष्ठ 7

6) वही, पृष्ठ 8

7) वही, पृष्ठ 126

8)  वही, पृष्ठ 106

9) वही, पृष्ठ 106

10) एक कहानीकार की नोटबुक, स्वयं प्रकाश, अंतिका प्रकाशन, 2010, पृष्ठ 7

11) वही, पृष्ठ 84

12) दूसरा पहलू, स्वयं प्रकाश, परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद, 1990, पृष्ठ 10

13) वही, पृष्ठ 82

14) एक कहानीकार की नोटबुक, स्वयं प्रकाश, अंतिका प्रकाशन, 2010, पृष्ठ 122

15) दूसरा पहलू, स्वयं प्रकाश, परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद, 1990, पृष्ठ 29

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