डॉ.अंजु  की दो लघुकथाएँ

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दोषी

“बच्ची को आज फिर नीचे गिरा दिया तूने। चल उठ, नीचे ही सो। सुन नहीं रही क्या?” नर्स की तेज आवाज ने रात के एक बजे बच्चा वार्ड में सो रही बच्चों की माँओं को जगा दिया। सब हड़बड़ा कर अपने-अपने बच्चों को सँभालने लगीं। एक महिला बोली, “कोई बात नहीं बहनजी, पलंग  पर ही सो जाने दो बेचारी को।”

“नहीं! अब यह नीचे ही सोएगी। इसने कल भी बच्ची को नीचे गिरा दिया था। लापरवाही  करते हैं खुद और माथे आते हैं हमारे।” नर्स का गुस्सा अब भी बरकरार था- “आपको  पता नहीं है अगर हमसे थोड़ी-सी गलती हो जाए तो पूरा अस्पताल सिर पर उठा लेते हैं। लेकिन खुद की गलती नहीं मानते। सिर फूट जाता बच्ची का तो? कौन जिम्मेदारी लेता? हम पर ड्यूटी के समय सोने का आरोप लगाकर हुड़दंग मचाते।” तभी पास के बेड पर बैठी  महिला बोली, “सही कह रहे हो, मैं तो खुद भुक्तभोगी हूँ। पूरे दो साल अजमेर और अहमदाबाद के बीच रेल बन गई मेरी।”

“हाँ, सही कह रही हैं सिस्टरजी। नीचे सो!” अब तक चुप बच्ची की माँ बोलने को हुई तो एक स्वर में चिल्ला  सबने उसे चुप करा दिया।  “उठती है या सुबह डॉक्टर से तेरी शिकायत करूँ।”, नर्स की इस धमकी के आगे पस्त माँ बच्ची को गोद में उठा घर से लाया फटा चद्दर बिछा दुनियाभर की गंदगी के बीच अपनी बीमार बच्ची को मिले हुए खाली पलंग को देखते हुए बिना इंफेक्शन के डर के जमीन पर सो गई।

“सुबह छह बजे उठूँ तब तू जमीन पर ही मिलनी चाहिए।” मासूमियत से सहमति में सिर हिला सबकी नजरों में दोषी, कई दिनों की थकी निर्दोष माँ  बच्ची को सीने से चिपका सो गई। उसकी अनमोल दौलत उसके पास सुरक्षित थी।

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स्वीकृति

 “सुनो, ममा!  शादी का कार्ड आया है।” मेरी प्यारी बिटिया यशी ने मुझे शादी का कार्ड देते हुए कहा।  “किसका है?” सहज उत्सुकतावश  मैंनें पूछा। “लो, आप ही देख लो।” मेरे हाथ में कार्ड थमा खेलने के लिए जाते हुए मुड़कर देखे बिना ही जवाब देकर  बिटिया रानी तो फुर्र हो गई।

कार्ड पर नाम  देखा तो श्वेता के विवाह का निमंत्रण–पत्र था। श्वेता का नाम पढ़ते ही स्मृतियाँ पाँच वर्ष पीछे ले गईं। राजकीय  सेवा में विद्यालयी शिक्षा में व्याख्याता पद पर चयन होने के पश्चात मुझे पहला पदस्थापना चुरु जिले के हसनपुरा गाँव में मिला था। नई जगह, नए लोग, नया माहौल। पर उस गाँव में मेरे दूर के रिश्तेदार और एक अच्छी मकान मालकिन मिल जाने से थोड़े ही दिनों में मैं सहज हो अपने कार्य में व्यस्त हो गई। सहज आत्मीयता से पूर्ण ग्रामीण  परिवेश धीरे- धीरे अच्छा लगने लगा। मेरी दूर के रिश्ते की मौसी की बेटी श्वेता का भी  इसमें सहयोग रहा।

मौसी के घर जाती तो उनकी सासू माँ के साथ कभी-कभी एक और बुजुर्ग महिला से भी मिलना हो जाता। जिन्हें सारा गाँव दादी कहकर बुलाता था, तो मैं भी दादी कहने लग गई। मिची-मिची सी आँखों और झुर्रियों भरे चेहरेवाली दादी मुझे बहुत स्नेह करतीं। धीरे-धीरे पता चला कि दादी तो मौसी की सास, जिन्हें मैं भाभा कहती थी के साथ दहेज में आई हुई हैं। दादी का विवाह किसी के साथ न हुआ था। मौसी के ससुर ने ही उन्हें दूसरी पत्नी के रूप में रख लिया था।

जब उस परिवार से स्नेह जुड़ा तो दादी के बेटे  के साथ भाई का स्नेह-सूत्र बंधा जो आज भी  बाकायदा कायम है। उस परिवार के हर छोटे-बड़े काम में दादी और उनके बेटे विनय भैया पूरे प्राणोपण से लगे रहते थे। मुझे कभी भी उस परिवार से अलग न लगे। और आज जब श्वेता के विवाह के निमंत्रण-पत्र में मौसी के सभी परिजनों के साथ विनय भैया का नाम देखा तो मैं खुशी से उछल पड़ी। विवाह के निमंत्रण-पत्र में छपे उनके नाम के साथ विनय भैया को सामाजिक स्वीकृति जो मिल गई थी।

 

                                                                                                 -डॉ.अंजु
सहायक आचार्य हिंदी
राजकीय कन्या महाविद्यालय, अजमेर(राज.)

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