वर्तमान परिदृश्य में युवाओं की ग्रामीण विकास में सक्रिय भूमिका |  सिम्मी चौहान

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‘युवा’ समाज का वह हिस्सा है, जिसके द्वारा किसी देश का भविष्य निर्मित होता है। उसकी उम्र के साथ-साथ उसकी आँखों में बड़े-बड़े सपनों की संख्या भी बढ़ती जाती है। इन्हीं सपनों की पूर्ति हेतु उसे जीवन में कई बार बड़े-बड़े जोखिम भी उठाने पड़ते हैं। संभव-असंभव के संशय त्यागने पड़ते हैं। स्वामी विवेकानंद जी का सुविचार है कि संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है, असंभव से भी आगे निकल जाना। उन्होंने देश के युवाओं को सम्बोधित करते हुए कहा था –युवाओं उठो, जागो और उदेश्य प्राप्ति के पहले मत रुको। विवेकानन्द जी के ये विचार देश की युवा पीढ़ी के लिए ही नहीं, अपितु राष्ट्र निर्माण में भूमिका निभाने वाले महापुरुषों के लिए भी प्रेरणास्रोत रहे हैं। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, आजाद, मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी, कल्पना चावला, सानिया मिर्जा, पी.वी सिन्धु, गीता फोगाट तथा मानुषी छिल्लर आदि ने समाज को बेहतर बनाने और उसे नए शिखरों पर ले जाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

वर्तमान भारत को ‘युवा भारत’ कहा जाता है, क्योंकि हमारे देश की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा युवा पीढ़ी ही है। जिसमें आधे से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। गाँव में रहने वाले युवाओं तथा शहरी युवा-वर्ग के बीच रहन-सहन, शिक्षा, परिवेश, क्षमता आदि सभी स्तरों पर बड़ा भारी अंतर दिखाई देता है। 13 से 35 वर्ष की उम्र वाली पीढ़ी यदि सुंदर चारित्रिक दृढ़ता, नैतिक मूल्यों, मानसिक, धार्मिक व आध्यात्मिक शक्तियों से परिपूर्ण होगी, तो नि:संदेह ही एक सुंदर-स्वस्थ तथा विकसित राष्ट्र की कल्पना की जा सकती है। लेकिन ग्रामीण और शहरी वर्गों में बंटा यह समाज असमानता की एक ऐसी धुरी पर टिका है। जहाँ गाँवों की स्थिति शहरों की तुलना में अधिक दयनीय है। ग्रामीण युवाओं को मूल्यरहित शिक्षा, बेरोजगारी, उचित मार्गदर्शन का अभाव, टेलीविजन/इंटरनेट की ग्लैमरस दुनिया के शार्टकट्स आदि ने भटकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। साथ ही गाँवों और शहरों के बीच पसरी खाई ने युवाओं में एक दुराव की स्थिति बना दी है। गांवों में बसने वाला जब शहरी वातावरण के रंग-ढंग जान लेता है तो वह वापिस गाँव लौटना नहीं चाहता। ऐसे में शहर में पला-बड़ा युवा गाँवों के विकास की सुध क्यूँ लेगा? शिक्षा की बुनियादी और व्यावहारिक उपयोगिता की स्थिति गाँवों के साथ-साथ शहरों में भी त्रस्त दिखाई देती है। इन युवाओं में नकारात्मकता का स्तर तेजी से बढ़ता जा रहा हैं, जिससे वे शीघ्र ही अपना संयम खो देते हैं। जल्दी से जल्दी उच्च पद, पैसा-शोहरत पाने के लिए गलत काम और शोर्टकट्स लेते हुए भी नहीं कतराते। ऐसी विपरीत परिस्थितियों के बीच फंसी युवाओं की बड़ी  संख्या गुमराह हो हिंसात्मक कार्यों, उपद्रवों, हड़तालों, अपराधों, नक्सलवाद, आतंकवाद आदि रास्तों पर निकल पड़ती है। जो किसी भी देश-समाज के लिए एक बड़े खतरे का कारण हैं। इस दिशाहीन विशेषकर गांवों में बसने वाली तथा पलायन से हताश युवा पीढ़ी को सही मार्ग पर लाने के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं? उन्हें बुनियादी व रोजगार युक्त शिक्षा देने के लिए कौन-सी योजनाएं बनाई गई हैं? गाँवों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए सरकार द्वारा क्या-क्या योजनाएं उपलब्ध कराई गई हैं, और किन योजनाओं का युवाओं ने सफलतापूवर्क उपयोग करके गांवों की स्थिति में सुधार किया है? गाँवों में स्वच्छता एवं पर्यावरण संरक्षण हेतु युवाओं ने क्या बड़े बदलाव किए हैं? किसानों की फसल से जुड़ी सरकारी सुविधा तथा नई तकनीकों के इस्तेमाल की जानकारी में युवा कैसे भूमिका निभा रहे हैं?  ‘न्यू मीडिया’ के माध्यम से युवा कैसे ग्राम विकास की स्थिति में सुधार कर रहे हैं? साथ ही गाँवों की समस्याओं को लेकर युवाओं की सजग भागीदारी कितनी सफल रही है? गांवों में युवाओं का एक बड़ा तबका बेशक असुविधाओं एवं आर्थिक कमजोरी के कारण पीछे रह जाता हो, लेकिन उन्हीं में से कुछ होनहार ऐसे भी निकलते हैं जो अपने समाज ही नहीं, देश को भी गौरवान्वित करते हैं । युवा-युवा के बीच की खाई को पाटकर उन्हें जागरूक कर कैसे अपने संगठनों का हिस्सा बनाकर रोजगार के अवसर दे रहे हैं? आदि इन सभी प्रश्नों के माध्यम से मैनें ग्रामीण विकास में युवाओं की भूमिका आंकने का प्रयास किया है।

‘विकास’ सही मायनों में तभी पूर्णता पाता है, जब सभी स्तरों पर एक सकारात्मक बदलाव लक्षित किया जा सके। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास से तात्पर्य है- उस ग्राम विशेष के वासियों का आर्थिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर सुधार होना। ग्रामीण विकास के लिए सरकार की ओर से लगातार कई कार्यक्रम व योजनाओं का भी गठन किया जाता रहा है। लेकिन सुधार-विकास से जुड़ी इन योजनाओं के बनने या लागू होने मात्र से ही विकास हो जाए, यह संभव नहीं है। उन योजनाओं-कार्यक्रमों में गाँव के व्यक्ति की भागीदारी, सुधार-सम्बन्धी नई तकनीकों के उपयोग को लेकर उसकी जागरूकता होना अतिआवश्यक है। देश की लगभग 70% जनसंख्या का विकास करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों को मजबूत करना होगा। यातायात एवं संचार की सुविधाओं ने देश में शहरीकरण को बहुत प्रभावित किया है। प्रत्येक व्यक्ति किसी-न-किसी बड़े नामी-गिरामी शहर में बसना चाहता है, चाहे इसके लिए उसे कितने भी कष्ट क्यूँ न उठाने पड़े। ऐसे में शहरों की स्थिति भी दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है। गाँवों में बसने वाली जनसंख्या को वह सब सुविधाएँ मुहैयाँ करानी होगी, जिसे पाने के लिए गाँव के गाँव खाली होते जा रहे हैं। ग्रामीण विकास के सन्दर्भ में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी का एक महत्त्वपूर्ण कथन था –  ‘बिना सहकार नहीं उद्धार’। अर्थात् गाँवों की स्थिति में सुधार सहकारिता के माध्यम से ही संभव किया जा सकता है। लेकिन वास्तविकता के स्तर पर यह आन्दोलन मात्र सरकारी नीतियों तथा कारवाहियों का ही परिणाम बनकर रह गया है। यूँ तो सहकारिता एक लोकतान्त्रिक आन्दोलन है, जो मात्र अपने सदस्यों द्वारा एक सुयोग्य नेतृत्व में ही कारगर साबित हो सकता है। इस आन्दोलन का मुख्य उदेश्य कृषकों, ग्रामीण कारीगरों, भूमिहीन मजदूरों एवं समुदाय के कमज़ोर तथा पिछड़े वर्गों को रोजगार, साख तथा उपयुक्त प्रोद्यौगिकी प्रदान कर एक अच्छा उत्पादक बनाना है। लेकिन ग्रामीण विकास का लक्ष्य न केवल उत्पादक बढ़ाना है बल्कि, सभी वर्गों को पूर्ण रोजगार तथा उनमें विकास प्रक्रियाओं का न्यायसंगत आबंटन करना भी है। योजनाओं की गतिविधियों में जब न्यायसंगतता घटती दिखाई पड़ती है, तब समाज के बीच उथल-पुथल होना लाजमी है। जिसके चलते विकास के प्रत्येक स्तर पर व्यक्ति असमानता-शोषण आदि का पात्र बनता है। स्थिति चाहे गाँवों की हो या शहरों की – दोनों में जिस व्यक्ति की भागीदारी महत्त्वपूर्ण है, वह है- उस समाज विशेष का युवा-जनसमूह। किसी राष्ट्र, देश व समाज का प्रगति-चिह्न उसकी युवा-पीढ़ी ही होती है। वह जितनी सक्षम और मजबूत होगी, वह प्रदेश उतना ही विकसित मोड़ की ओर गतिशील दिखाई देगा। लेकिन सच्चाई बहुत हद तक विपरीत है, क्योंकि गाँवों – शहरों के बीच पटती खाई ने सरकारी योजनाओं पर ही नहीं, अपितु उनके उपयोग पर भी प्रश्नचिह्न लगाया है।

सरकार लगातार विकास के लिए नए-नए सकारात्मक कदम उठाती जा रही है। किन्तु कुछ योजनाओं का लक्ष्य अभी तक रास्ते में ही भटक रहा है, तो कुछ फाइलों के नीच दबी हुई हैं। इस भटकाव का महत्त्वपूर्ण कारण है – सही नेतृत्व की कमी। इस नेतृत्व का कार्यभार जब तक किसी सक्षम व्यक्ति के हाथों में नहीं सौंपा जाएगा, तब तक यह असमानता की खाई ओर गहराती जाएगी। जिनके लिए सुधार-योजनाएं लागू की गई हैं उन तक उसका लाभ पहुँच भी रहा है या नहीं, इस पर कड़ी निगरानी की जरूरत है। सही नेतृत्व की परिपक्वता के लिए सहकारी शिक्षा को अनिवार्य करना अतिआवश्यक है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली मात्र डिग्री लेकर बेरोजगारों की संख्या दुगनी कर रही है। इस शिक्षा-व्यवस्था में ऐसा कोई स्कोप नहीं है, जिससे युवा वर्ग अपने पैरों पर खड़ा होने का साहस कर पाए। इसलिए यह आवश्यक है कि स्कूलों और कॉलेजों में प्रारम्भ से ही सहकारी शिक्षा अनिवार्य की जाए, ताकि छोटी उम्र में ही सहकारी नेतृत्व की क्षमता व्यावहारिकता में दिखाई दे सके। शिक्षा के स्तर पर गाँव-शहरों में बड़ा अंतर व्याप्त है, जिससे गाँव का युवा शहरों की आबोहवा में आकर अक्सर भटक जाता है। क्योंकि उसकी जड़ें उसे इस शहरी वातावरण का अंग बनने ही नहीं देतीं। दिल्ली, कोलकाता, बनारस जैसे प्रतिष्ठित शिक्षा-संस्थानों के अधिकांशत: युवा भी देश-विदेशों में अपनी जड़ें जमाने में पीछे रह जाते हैं। इन नई तकनीकों-सुविधाओं की चकाचौंध देख गाँव का व्यक्ति भारी संख्या में प्रवास करता है। यह प्रवास उस समाज विशेष के विकास पर सवालिया निशान खड़ा करता है कि वहां सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ किस स्तर पर कायम होंगी।

देश का भविष्य उसके नौजवानों पर ही टिका है। उनका अपने राष्ट्र-समाज के कर्तव्यों के प्रति सचेत होना अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान परिदृश्य में भ्रष्टाचार, आतंकवाद आदि का चौतरफा बोलबाला है, जो घुन बनकर देश को अंदर-ही-अंदर खोखला करता जा रहा है। इसी परिदृश्य में युवा-पीढ़ी का एक वर्ग जहाँ अपने कर्त्तव्यों से मुँह मोड़ रहा है, तो वही कुछ युवा समूह बनाकर पूरे जोश के साथ अपने समाज के सुधार में जुटे हुए हैं। भारत सरकार ने भी युवा शक्ति के उत्थान के लिए कदम उठाए हैं। प्रथम पंचवर्षीय योजना 1952 में कहा गया था कि युवा देश के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1985 को युवा वर्ष घोषित करने के बाद भारत सरकार ने राष्ट्रीय युवा नीति भी बनाई। जिसे 1988 में लागू किया गया और 2003 में इस नीति में कुछ संशोधन भी किए गए, लेकिन नीतियाँ बना देने भर से यह जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। उनके क्रियान्वयन के लिए भी ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। वर्तमान सरकार ने युवाओं के लिए इस दिशा में कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। वर्ष 2014 से सरकार रोजगार के लिए विशेषकर युवाओं के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिए लगातार प्रयत्नशील दिखाई दे रही हैं। किसी संस्था विशेष की बजाए अपना काम शुरू करने वाले युवाओं के लिए Start up India’ योजना शुरू की गई। इस योजना के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ी रकम उभरते उन उद्यमियों को देने का प्रस्ताव रखा, जो नवप्रवर्तनशील उत्पादों और सेवाओं को बढ़ावा दे रहे हैं। ‘प्रधानमन्त्री युवा योजना’, ‘कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय’ द्वारा युवाओं के लिए शुरू की जाने वाली ऐसी योजनाएं हैं, जिनमें युवाओं के लिए उद्यमिता शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की भी व्यवस्था की गई है। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम बड़े पैमाने पर संस्थाओं द्वारा खुले ऑनलाइन पाठ्यक्रम के माध्यम से किया जाएगा। इस योजना के माध्यम से गाँवों के साक्षर युवा को जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भटक गए हैं या उनके पास उचित-पर्याप्त कौशल ज्ञान नहीं है। PMYY के तहत् प्रशिक्षण पाकर वे अपनी एवं अपने समाज को विकास की राह पर ला सकते हैं।

आज भारत के छोटे-छोटे राज्यों में विशेषकर गाँवों के परिवेश को नजदीक से देखने-समझने की जरूरत है। ग्लैमर दुनिया की चकाचौंध ने शहरों को ही नहीं, गाँवों को भी प्रभावित किया है। यह प्रभाव मात्र नकारात्मक स्तर पर ही अधिक लक्षित होता हो, ऐसा कदापि नहीं है। इस जगमगाहट व भटकाव के बीच एक युवा जन समूह ऐसा भी लगातार उभरता आ रहा है, जिसने अपने जीवन-रोजगार के साथ-साथ अपने आस-पास के परिवेश को सुकून भरा जीवन देने की कोशिश की है। यूँ तो युवा पीढ़ी शिक्षा, राजनीति, रोजगार, देशभक्ति आदि सभी क्षेत्रों में शार्टकट खोजती दिखाई देती है। लेकिन इस जमीनी सच्चाई के बीच जरूरत है ऐसे सकारात्मक पहलुओं को उठाने की, जिन्होंने वास्तव में अपने ‘युवा’ होने के दायित्व का निर्वाह किया है। मैनें अपने इस लेख में कुछ छिटपुट आकड़ों के द्वारा युवाओं की इस सकारात्मक भूमिका को उभारने का प्रयास किया है। गाँवों के विकास से जुड़ी जितनी भी योजनाएं सरकार द्वारा बनाई जा रही हैं। उनके क्रियान्वयन में युवा पीढ़ी कैसे-कैसे अपनी भूमिका निभा रही है, इसके लिए कुछ तथ्य उल्लेखनीय हैं।

मध्यप्रदेश (ग्वालियर) में युवाओं को इन योजनाओं व कार्यक्रमों को करीब से जनाने तथा प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारम्भ किए गए ग्रामोदय से भारत उदय अभियान से जुड़ने का अवसर प्रदान किया जा रहा है। इस अभियान से जुड़ने के लिए इच्छुक स्नातक व स्नातकोत्तर युवाओं से ऑनलाइन आवेदन कराए गए। साथ ही इस अभियान का उदेश्य युवाओं को ग्रामीण विकास में 2 महीने की इंटर्नशिप भी दी गई। जिससे वे गाँवों के विकास से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन में आ रही कठिनाइयों और उनके व्यावहारिक पहलुओं के बारे में गहराई से सोच-समझ विकसित कर सकें। इस इंटर्नशिप में युवाओं को ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत और जिला पंचायत के साथ काम करने का मौका भी दिया गया। साथ ही ऐसे युवाओं को विशेष अवसर दिया जाएगा जो स्वच्छ भारत मिशन, जल संवर्धन, कृषि विकास, सत्ता के विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को समझ सकते हैं। इसी तरह बडकोट गाँव के जिला युवक समिति के अध्यक्ष आजाद डिमरी ने युवकों, महिला मंगल दल से जुड़े युवाओं व ग्राम सभा प्रधान व सदस्यों को आज के दौर में देश के विकास की रीढ़ मानकर उनके हित के लिए कुछ जरूरी कदम उठाए। उन्होंने गांवों से पलायन को रोकने तथा आजीविका व रोजगार के साधन बढ़ाने के लिए गांवों के खाली चकों में फलदार पौधे लगाने की पहल की है।

हमारा देश नदियों का देश भी कहा जाता है। यहाँ नदियाँ साक्षात् भगवान की तरह पूजी जाती हैं। लेकिन इन नदियों के किनारे बसे छोटे-छोटे गाँवों की हालत बीमारियों का घर बनती जा रही हैं। इसमें सरकार की योजनाएं भी तभी सफल हो सकती हैं, जब आस-पास बसा ग्राम समूह उसमें अपनी सक्रिय भागीदारी निभाए। इस सफाई अभियान में युवा समाजसेवी बढ़-चढ़ कर अपने दायित्त्व निभा रहे हैं। साथ ही नदियों व समुद्र किनारे बसे छोटे क्षेत्रों में फैली गंदगी को साफ़ करने के लिए इन्होनें नए-नए तरीके भी अपनाए हैं। इस परिपेक्ष्य में क्वारी का उदाहरण लिया जा सकता है। त्यौहारों के बाद क्वारी नदी में भगवानों की मूर्तियाँ विसर्जित होने से नदी का पानी न केवल प्रदूषित होता है बल्कि, नदी में कचरा-गंदगी का स्तर भी बढ़ने लगता है। इस स्थिति में नदी का पानी गाँव वालों के साथ-साथ उनके मवेशियों के लिए भी हानिकारक बन जाता है। इस अभियान को 42 दिन में युवा समाजसेवियों द्वारा पूरा किया गया। साथ ही नदी के अंदर व किनारे जमा कचरे के ढेर को जलाकर नष्ट किया गया। इसी तरह मुबंई के समुद्र किनारे फैले कचरे तथा आस-पास बसे छोटे-छोटे कस्बों की स्थिति में भी युवाओं की टीम लगातार सफाई अभियान में जुटी हुई है। साथ ही ये समाजसेवी उन क्षेत्रों की जनता में इस मिशन को लेकर जागरूकता भी फैला रहे हैं।

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने देश को स्वच्छ रखने तथा खुले में शौच न जाने के मुद्दों पर अपने भाषणों में देशवासियों से कई दफ़ा अपील की है। इस अपील के लक्ष्य संधान में सरकार के साथ-साथ युवाओं ने भी कई दूर-दराज के गाँवों में जाकर शौचालय की महत्ता से रु-ब-रु कराया है। ‘संग्रामपुर’ के एसडीएम विजय कुमार पाण्डेय ने अपने प्रखंड के सभी जन प्रतिनिधियों, कर्मियों व प्रबुद्ध लोगों के साथ स्वच्छता को लेकर बैठकें की, जिसमें उन्होंने खुले में शौच मुक्त समाज के निर्माण में सबकी भागीदारी की अपील की। इस तरह अन्य कई गांवों के प्रधान कर्मियों ने मिलकर फैसला लिया कि जब तक शौचालय नहीं बन जाता, तब तक लोगों को घर में अस्थायी शौच की व्यवस्था, अगल-बगल के सगे-सम्बन्धियों के शौचालय का उपयोग, अन्यथा शौच के बाद खुरपी का उपयोग आदि ऐसे उपायों के साथ शीघ्र से शीघ्र स्थायी शौचालयों की व्यवस्था करनी होगी। गाँव के युवाओं ने मिलकर खुले में शौच से होने वाली बीमारियों तथा महिलाओं की महावारी से जुड़ी स्वच्छता एवं समस्याओं के विषय में भी जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए हैं। कई जगहों पर ‘लोटा छीनो अभियान’ तथा ‘गड्ढा खोदो अभियान’ की भी शुरुआत की गई। फ़िल्मी जगत के सितारों ने भी इस दिशा में लगातार विज्ञापन एवं फिल्मों के माध्यम से संदेश दिया है। ‘Toilet-एक प्रेम कथा’ फिल्म इसका सशक्त उदाहरण है, जिसमें गाँव की आन-बान स्त्री के घूंघट संस्कारों से नहीं अपितु, शौचालय के होने से है। साथ ही इस फिल्म के माध्यम से यह भी लक्षित किया गया कि कैसे सरकारी योजनाएं फाइलों में ही बंद पड़ी हुई हैं और गाँव वाले अपनी झूठी संस्कृति-प्रतिष्ठा के नाम पर इन आधारभूत सुविधाओं से मुंह मोड़े हुए हैं।

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के एक गाँव बागपत (बिज्वाडा) में ‘सर्वसमाज पंचायत’ ने यह फरमान जारी किया है कि कोई भी गाँव वासी अपने बच्चों का विवाह ऐसे घर-गाँव में नहीं करेगा, जहाँ शौचालय नही है। इस फैसले के खिलाफ यदि कोई गाँव-परिवार जाएगा तो उसे दंड स्वरूप जुर्माना देना पड़ेगा। साथ इस पंचायत के अध्यक्ष आत्माराम तोमर का कहना है कि पूरे गाँव के साथ-साथ हर घर में शौचालय की व्यवस्था की जाएगी। इसके साथ ही इस जिले के अन्य गाँवों के 10 प्रधान पंचायत सेवकों ने भी इस मिशन में अपना सहयोग दिया है। ऐसे ही छत्तीसगढ़ में धमतरी जिले का ‘डोमा गाँव’ युवाओं की भागीदारी से पहला नशा-मुक्त और खुले में शौच से मुक्त गाँव बना है। कुछ सालों पहले यह गाँव सामाजिक-आर्थिक रूप से बेहद खराब स्थिति में था। 2007 में गाँव के कुछ युवा ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के युवा नेतृत्व प्रशिक्षण शिविर में शामिल हुए थे। उन्होंने गाँव में रोज प्रभात फेरियों एवं कीर्तनों का आयोजन किया। जिससे गाँव के लोगों में सकारात्मक ऊर्जा और सेवा कार्यो के भाव जागृत हुए। धीरे-धीरे इस समूह में 400 से भी ज्यादा परिवारों ने सहयोग किया। युवाओं के इस प्रयास में सरकारी योजनाओं के तहत् सभी घरों में शौचालय भी बनवाए गए। साथ ही डोमा गाँव को नशा-मुक्त गाँव की उपाधि भी प्राप्त हुई।

गाँव की पढ़ी-लिखी युवा-पीढ़ी अधिकतर सरकारी विभागों की ओर ही भागती दिखाई पड़ती है। उनकी शिक्षा-प्रणाली उनमें यह चेतना जागृत कर ही नहीं पाती कि वे पढ़ लिखकर किसी भी संस्थान में नौकरी करने की क्षमता रखते हैं। इसी परिपेक्ष्य में राजस्थान के ‘चुरु’ जिले में कुछ युवाओं द्वारा ‘Youth Leadership Development Program’ शुरू किया गया है। इस कार्यक्रम का मूलमंत्र है –‘सशक्त युवा, सक्षम गाँव’। इस कार्यक्रम में राजस्थान के 5 गाँव के 22 युवक-युवतियों के साथ एक दिवसीय लीडरशिप वर्कशाप का आयोजन किया गया। जिसमें उन्हें सामुदायिक विकास में योगदान के लिए प्रोत्साहित करने तथा उनके शैक्षणिक क्षेत्रों को लेकर गहन चर्चा की गई। इन युवाओं ने 2016 में इस जिले के 12 गांवों में 700 से ज्यादा युवाओं का सर्वेक्षण किया। जिसकी रिपोर्ट में यह ज्ञात हुआ कि गाँव के ये युवा जहाज उड़ाने, सेना में कर्नल बनने तक के सपने देखते हैं। युवाओं की टीम ने इस कार्यक्रम को बड़े स्तर पर लाने के लिए एक युवा सम्मेलन भी आयोजित किया गया। जिसमें टीचिंग, डिफेन्स, फैशन, डिजाइनिंग, वकालत, खेल आदि से जुड़े 15 स्टाल लगाए गए। ‘राजगढ़’ जैसे छोटे गाँव में इन सेवाकर्मी युवाओं ने गाँव के उन सभी युवाओं को दिशानिर्देश दिए, जो अपने गाँव विशेष की सामाजिक-आर्थिक दशा सुधारने में सक्षम हो सकते हैं। ‘सशक्त युवा, सक्षम गाँव’ का मूलमंत्र लेकर ये सेवक यूथ क्लब बनाकर गाँव की हर तरह की सामाजिक समस्या का समाधान करते हैं। ग्रामीण युवाओं के जीवन कौशल में सुधार कर उनमें ऐसी कुशलता का निर्माण करने का प्रयास लगातार कर रहे हैं, जिससे वे स्वयं नए-नए समूह बनाकर कुछ नवप्रवर्तनशील विचारों के साथ अपने विकास की राह सुनिश्चित कर सकें।

‘डिजिटल इण्डिया’ मुहीम ने भी विकास को नए पंख दिए हैं। भूमंडलीकरण के दौर में सब कुछ बड़ी तेजी से बदल रहा है। ‘न्यू मीडिया’ भी इसी दौड़ का हिस्सा है, जिसने ना केवल शहरों अपितु, गाँवों की भी दुनिया बदली है। इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क की सुविधा ने किसान, मजदूर, महिला तथा स्कूली छात्रों के लिए कई अवसर मुहैया कराए है। इंटरनेट की सुविधा से गाँव में बसने वाला जागरूक युवा अपने देश-विदेश से जुड़ी घटनाओं-कार्यक्रमों के साथ-साथ कई महत्त्वपूर्ण विषयों की जानकारी भी हासिल कर सकता है। ‘पॉडकास्ट’ तकनीक के द्वारा किसी भी देश के विशेषज्ञ व्यक्ति एवं विषय के ऑडियो-विडियो लेक्चर देख-सुन सकते हैं। इन तकनीकों के माध्यम से यूथ क्लब कर्मियों ने गाँव-गाँव जाकर किसानों, मजदूरों, महिलाओं को इनके उपयोग तथा फायदों से भी अवगत कराया है। दिन-प्रतिदिन उभरती तकनीकी सुविधाओं के उपयोग से एक गाँव का युवा किसानों को नई फसलों से जुड़ी तकनीकें तथा तरीकों की जानकारी दे रहा है। झारखंड (रांची) के राजीव बिट्टू इसके सशक्त प्रमाण हैं। छोटे से जिले का यह युवा पढ़-लिखकर CA की नौकरी पाता है, लेकिन यह आज पार्ट टाइम CA और फुल टाइम एक किसान है। राजीव बिट्टू ने अपने आस-पास के ही नहीं बल्कि, सभी जरुरतमंदों को भी अपने साथ शामिल किया है। एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से विशेषज्ञ प्रोफेसरों को बुलाकर किसानों को नई-नई तकनीकों को लेकर शिक्षित किया। साथ ही आर्गेनिक खेती से जुड़ी महत्त्वपूर्ण योजनाओं की शुरुआत भी की। किसान की फसल को सीधे ग्राहक तक पहुँचाने की दिशा में भी कदम उठाए। फसल का जो मूल्य बिचौलियों द्वारा हड़प लिया जाता था, उसे अब सीधे गरीब किसान की बचत का हिस्सा बनाया गया। इस तरह के अभियानों से प्रभावित होकर आस-पास के गाँवों से साथ-साथ उत्तर प्रदेश के मेरठ, बागपत, आदि गाँवों के युवाओं ने भी आर्गेनिक फार्म वाली फसलें उगाने का काम शुरू किया है।
वर्तमान परिदृश्य में यूँ तो ओर भी कई पहलुओं से युवाओं की स्थिति व विचारों के अध्ययन से गाँवों के विकास पर चर्चा की जा सकती है। लेकिन मुझे ये कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण बिंदू लगते हैं, जिनके माध्यम से युवाओं की सक्रिय भूमिका स्पष्ट लक्षित की जा सकती है।  युवा पीढ़ी कम साधनों के बावजूद भी सरकार द्वारा प्रदत्त सेवाओं का लाभ उठाते हुए ऐसे अभियानों की पहल लगातार करती जा रही है। इस तरह ‘युवा-समाज’ का एक ऐसा वर्ग जो अधिक-से अधिक पैसा व नाम कमाने की होड़ से कटता हुआ, इन विकास कार्यों में जमीनी स्तर से सुधार करके अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

अंततः युवाओं को प्रेरित करता हुआ शाहिद लतीफ़ का एक शेर  ……..

“अपने मंसूबों को नाकाम नहीं करना है,
मुझको इस उम्र में आराम नहीं करना हैं ।”

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