विश्वम्भर पाण्डेय ‘व्यग्र’ की ग़ज़ल

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1). उस कीर की पीर कोई समझेगा
पिंजरे में है अधीर कोई समझेगा

आकुल पिंजरे से निकलने को वो
जिन्दा है गर ज़मीर कोई समझेगा

उड़ना चाहता वो भी आसमां कितना
उसकी आँखों का नीर कोई समझेगा

दाना-पानी हमेशा साथ रहता जिसके
चुभते दासता के तीर कोई समझेगा

क्या गुऩाह किया व्यग्र कुछ तो बोलो
उसकी क्या तक़दीर कोई समझेगा।

2) . काग़ज की कश्ती तैराने का मन करता है
आज फिर बरसात में नहाने का मन करता है
क्यूँ लगने लगा गंदा राह का पानी मुझको,
वो बचपना फिर से जगाने का मन करता है

क्या कहेंगे लोग मत कर परवाह उसकी
बरसात में फिर से गाँव जाने का मन करता है

वो समय फिर से ना आ सकता है दुबारा
बार-बार फिर क्यूँ दोहराने का मन करता है

ढूँढ़ने लगी हैं आँखें अब बचपन के मित्र सारे
फिर से वो मज़मा जमाने का मन करता है

ये उम्र है कि व्यग्र हर पल बदलती रही सदा
निकल गयी उसे क्यूँ बुलाने का मन करता है।

 

 

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